भारतीय रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण: एक क्रमिक एवं रणनीतिक परिवर्तन

पाठ्यक्रम: GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बुलेटिन ने जनवरी 2026 से भारत के निर्यात और आयात के रुपये में इनवॉइसिंग एवं सेटलमेंट पर आँकड़े प्रकाशित करना प्रारंभ किया है। यह रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की दीर्घकालिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कदम है।

रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण

  • परिभाषा: भारतीय रुपये (INR) का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, वित्तीय लेन-देन और अन्य देशों द्वारा आरक्षित मुद्रा के रूप में बढ़ता हुआ उपयोग।
  • इसका अर्थ है रुपये को:
    • सीमा-पार लेन-देन के लिए सुलभ बनाना।
    • वैश्विक स्तर पर व्यापार और निवेश हेतु स्वीकार्य बनाना।
    • आरक्षित या सेटलमेंट मुद्रा के रूप में मान्यता दिलाना।
  • प्रमुख घटक:
    • व्यापार इनवॉइसिंग और सेटलमेंट: निर्यातक और आयातक रुपये में व्यापार का इनवॉइस एवं सेटलमेंट करें, न कि अमेरिकी डॉलर या अन्य कठोर मुद्राओं में।
    • सीमा-पार भुगतान: अंतर्राष्ट्रीय प्रेषण और सेवाओं के भुगतान में रुपये का उपयोग।
    • वित्तीय बाजार भागीदारी: विदेशी निवेशक रुपये में भारतीय बॉन्ड और परिसंपत्तियाँ खरीदें; ऑफशोर रुपये बाजार।
    • आरक्षित मुद्रा का दर्जा (दीर्घकालिक लक्ष्य): अन्य केंद्रीय बैंक रुपये को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा बनाएँ।
  • ध्यान रहे कि इसका अर्थ स्वतः पूर्ण पूँजी खाता परिवर्तनीयता नहीं है। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है जिसमें पहले व्यापार लेन-देन को प्राथमिकता दी जाती है, तत्पश्चात पूँजी प्रवाह को उदार बनाया जाता है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

  • रूस-यूक्रेन युद्ध (2022) के बाद अमेरिकी डॉलर के विकल्प खोजने की प्रक्रिया तेज हुई।
    • अमेरिका ने रूस की डॉलर परिसंपत्तियाँ फ्रीज़ कर दीं और रूस को SWIFT प्रणाली से बाहर कर दिया।
    • डॉलर-प्रधान भुगतान प्रणाली तक पहुँच सीमित हो गई।
  • इससे डॉलर-केंद्रित वैश्विक वित्तीय संरचना पर अत्यधिक निर्भरता की कमजोरियाँ उजागर हुईं।
  • कई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, ने विकल्प खोजना प्रारंभ किया।

RBI का रुपये अंतर्राष्ट्रीयकरण हेतु रोडमैप

  • जुलाई 2023 में एक अंतर-विभागीय समूह (IDG) ने पहला आधिकारिक रोडमैप प्रस्तुत किया।
  • इसमें 10 अल्पकालिक, 5 मध्यमकालिक और 1 दीर्घकालिक लक्ष्य शामिल हैं।
  • भारत के प्रधानमंत्री ने 2024 में कहा कि रुपया “विश्वभर में सुलभ और स्वीकार्य” होना चाहिए, जिससे इस प्रयास को नीति दिशा मिली।

स्थानीय मुद्रा व्यवस्था ( LCAs)

  • ये केंद्रीय बैंकों के बीच समझौते हैं, जिनमें व्यापार का सेटलमेंट स्थानीय मुद्राओं में किया जाता है, न कि अमेरिकी डॉलर जैसी कठोर मुद्राओं में।
  • MoUs वाले देश (जुलाई 2023 से): UAE, इंडोनेशिया, मालदीव, मॉरीशस, और अन्य देशों के साथ चर्चा जारी।
  • संचालन तंत्र: व्यापार भुगतान विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते (SRVA) के माध्यम से।
    • 35 देशों के 83 बैंकों ने भारतीय बैंकों के साथ SRVA खोले हैं।
  • लाभ:
  • निर्यातकों के लिए विनिमय दर जोखिम कम होता है।
  • कठोर मुद्राओं पर निर्भरता घटती है।
  • वित्तीय संप्रभुता को सुदृढ़ करता है।

प्रमुख चिंताएँ एवं मुद्दे – रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण

  • विनिमय दर अस्थिरता; सीमा-पार लेन-देन में रुपये के अधिक उपयोग से सट्टा प्रवाह बढ़ सकता है।
    • ऑफशोर बाजारों में माँग और आपूर्ति में उतार-चढ़ाव रुपये को अधिक अस्थिर बना सकते हैं।
    • अस्थिरता व्यापार प्रतिस्पर्धा और मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकती है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव: संकट की स्थिति में यदि वैश्विक निवेशक तीव्रता से रुपये को विदेशी मुद्रा में परिवर्तित करते हैं, तो यह भंडार पर दबाव डाल सकता है।
    • RBI को मुद्रा बाजार में अधिक बार हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।
  • मौद्रिक नीति की स्वायत्तता: वैश्विक वित्तीय बाजारों से अधिक जुड़ाव नीति लचीलापन कम कर सकता है।
    • रुपये परिसंपत्तियों में बड़े विदेशी निवेश ब्याज दर निर्णयों को सीमित कर सकते हैं।
    • वैश्विक मौद्रिक सख्ती के प्रभाव भारत पर भी पड़ सकते हैं।
  • इम्पॉसिबल ट्रिनिटी(Impossible Trinity):मौद्रिक स्वतंत्रता, विनिमय दर स्थिरता और पूँजी गतिशीलता – तीनों को एक साथ बनाए रखना कठिन।
  • अविकसित वित्तीय बाजार: वैश्विक स्तर पर मुद्रा की स्वीकृति हेतु बेहतर और तरल बॉन्ड बाजार, मुक्त एवं कुशल पूँजी बाजार तथा पारदर्शी नियामक प्रणाली आवश्यक।
    • भारत के बाजार सुधार की दिशा में हैं, परंतु अभी प्रमुख आरक्षित मुद्रा अर्थव्यवस्थाओं के तुल्य नहीं।
  • पूँजी खाता परिवर्तनीयता जोखिम: पूर्ण अंतर्राष्ट्रीयकरण हेतु पूँजी खाता उदारीकरण आवश्यक होता है।
    • समय से पूर्व उदारीकरण सट्टा हमलों, पूँजी प्रवाह में अचानक रुकावट और वित्तीय संकट (जैसे एशियाई वित्तीय संकट 1997) का कारण बन सकता है।
    • भारत वर्तमान में संतुलित पूँजी खाता दृष्टिकोण अपनाता है।
  • रुपये की सीमित वैश्विक माँग: वर्तमान में भारत के कुल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लगभग 5% ही रुपये में निपटान होता है।
    • अंतर्राष्ट्रीयकरण हेतु विदेशी देशों को रुपये को भंडार में रखने, व्यापार इनवॉइसिंग में उपयोग करने और रुपये परिसंपत्तियों में निवेश करने की इच्छा होनी चाहिए।
  • भू-राजनीतिक जोखिम: डी-डॉलरीकरण के प्रयास भू-राजनीतिक प्रभाव ला सकते हैं।
    • रुपये सेटलमेंट का उपयोग करने वाले देशों पर कूटनीतिक दबाव पड़ सकता है।
    • SWIFT को दरकिनार कर वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों से जुड़ाव तनाव उत्पन्न कर सकता है।
  • ऑफशोर बाजार विकृति का जोखिम: ऑफशोर रुपये बाजार (जैसे NDF बाजार) घरेलू विनिमय दर को प्रभावित कर सकते हैं।
    • ऑनशोर और ऑफशोर दरों में अंतर नीति प्रबंधन को जटिल बना सकता है।
  • SDR एवं आरक्षित मुद्रा चुनौतियाँ: IMF के SDR बास्केट या CLS (कॉन्टिन्युअस लिंक्ड सेटलमेंट) में शामिल होने हेतु रुपये का पूर्ण परिवर्तनीय होना, उच्च तरलता और स्थिर मैक्रो-आर्थिक आधारभूत आवश्यक।
    • इसके लिए दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं।
  • व्यापार असंतुलन समस्या: भारत को निर्यात करने वाले देशों को प्राप्त रुपये का पुनर्निवेश भारत में करना होगा या भारतीय वस्तुएँ खरीदनी होंगी।
    • यदि व्यापार एकतरफा हो, तो रुपये का संचय आकर्षक नहीं रहेगा।

आगे की राह: रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण हेतु सक्षम परिस्थितियाँ

  • सुदृढ़ और तरल वित्तीय बाजार: सुदृढ़ बॉन्ड एवं विदेशी मुद्रा बाजार; सरल FPI मानदंड।
  • ऑफशोर रुपये पारिस्थितिकी तंत्र: ऑफशोर शाखाओं के माध्यम से रुपये बैंकिंग सेवाएँ; प्रवासी भारतीयों को विदेश में रुपये खाते खोलने की अनुमति; नेपाल, भूटान और श्रीलंका में NRIs को रुपये ऋण लेने की अनुमति।
  • भुगतान प्रणाली एकीकरण: SWIFT बहिष्कार की संवेदनशीलता कम करने हेतु भारतीय प्रणालियों (RTGS, SFMS) को अन्य देशों की भुगतान प्रणालियों से जोड़ने पर विचार।
  • दीर्घकालिक आकांक्षाएँ
  • CLS (कॉन्टिन्युअस लिंक्ड सेटलमेंट) में शामिल होना: वर्तमान में 18 प्रमुख मुद्राओं का निपटान करता है।
  • IMF के SDR बास्केट में शामिल होना: इसके लिए दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार आवश्यक।

निष्कर्ष

  • रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण कोई घटना नहीं बल्कि बहु-दशकीय प्रक्रिया है। स्थानीय मुद्रा व्यवस्था, SRVA, बॉन्ड इंडेक्स समावेशन और ऑफशोर रुपये पहुँच जैसी संस्थागत रूपरेखाएँ संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देती हैं, जबकि वर्तमान में रुपये में व्यापार निपटान सीमित है।
  • भारत जब 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है, तब रुपये को परिवर्तनीय और आरक्षित मुद्रा का दर्जा दिलाना आर्थिक लचीलापन, रणनीतिक स्वायत्तता एवं वित्तीय संप्रभुता के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप है।
मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण के पीछे तर्क पर चर्चा कीजिए। क्या यह भारत की बाह्य आर्थिक नीति में एक रणनीतिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है?

Source: BS

 

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