पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी; सुरक्षा
संदर्भ
- भारत में उपग्रह इंटरनेट सेवाएँ उस समय चर्चा में आईं, जब स्टारलिंक ने नियामकीय स्वीकृतियों, मूल्य निर्धारण और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं पर अपनी टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीं। इससे उपग्रह इंटरनेट की क्षमता, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल समावेशन से जुड़े मुद्दों पर परिचर्चा तीव्र हुई।
उपग्रह इंटरनेट एवं इसकी कार्यप्रणाली
- उपग्रह इंटरनेट, उपग्रहों के माध्यम से इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रदान करता है। इसमें उपग्रह, भू-आधारित टर्मिनलों और गेटवे स्टेशनों के साथ संचार करते हैं, जो स्थलीय नेटवर्क से जुड़े होते हैं।
- निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रह: ये सामान्यतः पृथ्वी से कुछ सौ किलोमीटर की ऊँचाई पर संचालित होते हैं और भूस्थिर कक्षा (GEO) के उपग्रहों की तुलना में कम विलंबता प्रदान करते हैं।
- भूस्थिर कक्षा के उपग्रह: ये भूमध्य रेखा से लगभग 35,786 किलोमीटर की ऊँचाई पर परिक्रमा करते हैं।
- हालाँकि, उपग्रहों की संचार क्षमता उपलब्ध स्पेक्ट्रम, एंटीना की बनावट, आवृत्तियों के पुनः उपयोग तथा एक ही बीम के माध्यम से इंटरनेट का उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या पर निर्भर करती है।
- यह कैसे कार्य करता है?
- उपयोगकर्ता टर्मिनल : एक डिश या एंटीना संकेतों को प्रेषित और प्राप्त करता है।
- उपग्रह समूह : उपग्रह उपयोगकर्ताओं और भू-आधारित स्टेशनों के बीच डेटा का संचार करते हैं।
- गेटवे स्टेशन : ये उपग्रह नेटवर्क को व्यापक इंटरनेट नेटवर्क से जोड़ते हैं।


अक्टूबर 2026 तक वर्तमान स्थिति: वैश्विक परिदृश्य एवं भारत
- वैश्विक परिदृश्य: स्पेसएक्स की स्टारलिंक, यूटेलसैट वनवेब और अमेज़न की प्रोजेक्ट कुइपर जैसी कंपनियाँ उपग्रह-आधारित ब्रॉडबैंड नेटवर्क विकसित कर रही हैं।
- इनके अनुप्रयोग दूरस्थ क्षेत्रों के घरों को इंटरनेट उपलब्ध कराने से लेकर समुद्री संचार, विमानन, आपदा प्रतिक्रिया और रक्षा तक विस्तृत हैं।
- निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में उपग्रह समूह विशेष रूप से उपयोगी हैं, क्योंकि ये संचार में विलंब को कम करते हैं और उन क्षेत्रों तक पहुँच सकते हैं जहाँ स्थलीय बुनियादी ढाँचा स्थापित करना कठिन है।
- भारत की स्थिति: भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत में ब्रॉडबैंड ग्राहकों की संख्या 1,101.21 मिलियन थी तथा समग्र टेली-घनत्व 95.07% था।
- भारत के उपग्रह संचार बाजार में ह्यूजेस कम्युनिकेशंस इंडिया और नेल्को जैसे स्थापित सेवा प्रदाताओं के साथ-साथ निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) आधारित सेवाएँ प्रदान करने वाले नए सेवा प्रदाता भी शामिल हैं।
भारत में उपग्रह इंटरनेट के पक्ष में तर्क
- डिजिटल विभाजन को कम करना: उपग्रह ब्रॉडबैंड हिमालयी क्षेत्रों की दूरस्थ बस्तियों, द्वीपों, वनवासी समुदायों तथा विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रों को इंटरनेट से जोड़ सकता है, जहाँ ऑप्टिकल फाइबर बिछाना महँगा या अव्यावहारिक है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट ग्राहकों का घनत्व अभी भी प्रति 100 व्यक्तियों पर केवल 48.31 था।
- आपदा प्रबंधन: चक्रवात, बाढ़ और भूकंप स्थलीय संचार नेटवर्क को हानि पहुँचा सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में उपग्रह संपर्क बचाव दलों, अस्पतालों और आपदा प्रतिक्रिया एजेंसियों को आपातकालीन संचार सुविधा प्रदान कर सकता है।
- रणनीतिक एवं आर्थिक लाभ: सीमावर्ती चौकियों, जहाजों, विमानों, खदानों और अपतटीय प्रतिष्ठानों को पारंपरिक नेटवर्क की पहुँच से बाहर भी विश्वसनीय संचार की आवश्यकता होती है।
- उपग्रह सेवाएँ रक्षा संचार, लॉजिस्टिक्स, टेलीमेडिसिन, शिक्षा और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे सकती हैं।
- तकनीकी प्रतिस्पर्धा: अतिरिक्त सेवा प्रदाताओं के प्रवेश से उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिल सकते हैं, नवाचार को प्रोत्साहन मिल सकता है और वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी सुदृढ़ हो सकती है।

भारत में उपग्रह इंटरनेट के विरोध में तर्क
- सीमित क्षमता एवं स्पेक्ट्रम संबंधी बाधाएँ: रेडियो स्पेक्ट्रम एक सीमित संसाधन है, जिसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वय किया जाता है।
- उपग्रह नेटवर्क, सघन स्थलीय मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से संभव व्यापक स्थानिक आवृत्ति पुनः उपयोग की क्षमता की पूरी तरह बराबरी नहीं कर सकते।
- वहनीयता एवं असमानता: उपग्रह टर्मिनल और उनकी सदस्यता का व्यय कम आय वाले परिवारों के लिए अधिक हो सकता है। जहाँ माँग उपलब्ध क्षमता से अधिक होती है, वहाँ कीमतें और सेवा की गुणवत्ता इंटरनेट तक पहुँच को सीमित कर सकती हैं।
- सुरक्षा एवं डिजिटल संप्रभुता: विदेशी नियंत्रण वाले उपग्रह बुनियादी ढाँचे से डेटा संरक्षण, कानूनसम्मत निगरानी एवं अवरोधन, साइबर सुरक्षा, नेटवर्क की सुदृढ़ता और विदेशी सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता से संबंधित चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- स्पेक्ट्रम आवंटन एवं निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा: प्रशासनिक आवंटन उन उपग्रह सेवाओं को सुगम बना सकता है, जिन्हें समन्वित स्पेक्ट्रम उपयोग की आवश्यकता होती है।
- पर्यावरणीय एवं कक्षीय चिंताएँ: बड़े उपग्रह समूहों के विस्तार से अंतरिक्ष मलबे, कक्षीय भीड़, खगोलीय अवलोकनों में व्यवधान तथा बाह्य अंतरिक्ष की दीर्घकालिक सततता को लेकर चिंताएँ बढ़ती हैं।
भारत के संबंधित प्रयास एवं पहल
- भारतनेट : ऑप्टिकल फाइबर और संबंधित कनेक्टिविटी समाधानों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड बुनियादी ढाँचे का विस्तार करता है।
- डिजिटल भारत निधि : पात्र कनेक्टिविटी परियोजनाओं के माध्यम से अपर्याप्त दूरसंचार सुविधाओं वाले क्षेत्रों में सेवाओं की पहुँच बढ़ाने में सहायता करती है।
- डिजिटल इंडिया : डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं, डिजिटल साक्षरता और व्यापक इंटरनेट पहुँच को बढ़ावा देता है।
- IN-SPACe: भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को सुगम बनाता है।
- दूरसंचार अधिनियम, 2023 : दूरसंचार सेवाओं और स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- TRAI: उपग्रह संचार सेवाओं की शर्तों सहित नियामकीय और आर्थिक मुद्दों पर परामर्श देता है।
- इन पहलों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए। उपग्रह नेटवर्क कनेक्टिविटी का विस्तार कर सकते हैं, जबकि बड़े पैमाने पर उच्च क्षमता वाली ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए स्थलीय ऑप्टिकल फाइबर अब भी आवश्यक है।
आगे की राह
- पूरक कनेक्टिविटी रणनीति अपनाना: उपग्रह इंटरनेट का उपयोग उन क्षेत्रों में किया जाना चाहिए, जहाँ स्थलीय नेटवर्क स्थापित करना अव्यावहारिक है। इसे ऑप्टिकल फाइबर के विस्तार के विकल्प के बजाय उसके पूरक के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
- साझा पहुँच के माध्यम से वहनीयता बढ़ाना: सार्वजनिक सहायता का प्राथमिक लक्ष्य प्रत्येक घर को अलग-अलग टर्मिनल उपलब्ध कराने के लिए अंधाधुंध सब्सिडी देने के बजाय सामुदायिक वाई-फाई हॉटस्पॉट, साझा टर्मिनल, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र और मोबाइल टावर होने चाहिए।
- पारदर्शी स्पेक्ट्रम प्रशासन सुनिश्चित करना: स्पेक्ट्रम आवंटन और मूल्य निर्धारण में संसाधनों के कुशल उपयोग, प्रतिस्पर्धा, सेवाओं की वहनीयता तथा भारत के अंतरराष्ट्रीय समन्वय संबंधी दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।
- सुरक्षा एवं जवाबदेही को सुदृढ़ करना: लाइसेंस संबंधी शर्तों में डेटा संरक्षण, कानूनसम्मत पहुँच, साइबर सुरक्षा, सेवा निरंतरता और घरेलू नियामकीय अनुपालन के स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए।
- डिजिटल समावेशन सुनिश्चित करना: सर्वोच्च न्यायालय ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) मामले में माना कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति एवं विचार की स्वतंत्रता और पेशा अपनाने की स्वतंत्रता को क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) तथा 19(1)(g) के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है।
- इस निर्णय में इंटरनेट तक पहुँच को स्वयं में एक स्वतंत्र मौलिक अधिकार घोषित नहीं किया गया था। फिर भी, संवैधानिक स्वतंत्रताओं को वास्तविक रूप से सुनिश्चित करने के लिए समानतापूर्ण और सार्थक कनेक्टिविटी आवश्यक है।
निष्कर्ष
- उपग्रह इंटरनेट भारत के डिजिटल बुनियादी ढाँचे का एक रणनीतिक पूरक है, उसका विकल्प नहीं। उद्देश्य उपग्रहों की व्यापक भौगोलिक पहुँच को ऑप्टिकल फाइबर की क्षमता, वहनीयता और विस्तारशीलता के साथ जोड़ना होना चाहिए।
- भारत का डिजिटल भविष्य केवल अधिक लोगों को इंटरनेट से जोड़ने पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सभी के लिए विश्वसनीय, सुरक्षित और किफायती डिजिटल पहुँच सुनिश्चित करने पर भी निर्भर करता है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत में डिजिटल विभाजन को कम करने में उपग्रह इंटरनेट की संभावनाओं एवं सीमाओं की चर्चा कीजिए। |
स्रोत: BL
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