पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक, 2026 को संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है। इनमें लोकसभा की सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान है।
- यह इस बात को रेखांकित करता है कि केवल सांसदों की संख्या बढ़ाने से प्रतिनिधित्व में सुधार नहीं होगा, जब तक संसद की कार्यक्षमता को भी सुदृढ़ न किया जाए।
संसद की कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
- प्रतिनिधियों पर बढ़ता भार: निर्वाचन आयोग के वर्ष 2024 के एटलस के अनुसार, भारत में 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में 97.98 करोड़ मतदाताओं की निर्वाचक नामावली का प्रबंधन किया जाता है। इस प्रकार, प्रति निर्वाचन क्षेत्र औसतन लगभग 18 लाख मतदाता हैं।
- निर्वाचन क्षेत्रों के आकार में असमानता: तेलंगाना के मल्काजगिरि निर्वाचन क्षेत्र में 37.8 लाख मतदाता हैं, जबकि लक्षद्वीप में केवल 57,953 मतदाता हैं। यह निर्वाचन प्रतिनिधित्व के असमान वितरण को दर्शाता है।
- संख्या से परे प्रतिनिधित्व: लोकसभा में अतिरिक्त सदस्य जोड़ने से विद्यमान समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि संसद की कार्यवाही का समय-सारणी अपरिवर्तित रहती है, तो अधिक सांसदों के शामिल होने से विधायी कार्यों में प्रत्येक सदस्य की भागीदारी की क्षमता सीमित हो सकती है।
संसदीय कार्यप्रणाली से संबंधित समस्याएँ
- संसद के कार्य करने के लिए अपर्याप्त समय: भारत में ऐसा कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है, जो संसद के लिए प्रतिवर्ष कार्य-दिवसों की न्यूनतम संख्या निर्धारित करता हो।
- प्रश्नकाल सांसदों को मंत्रियों से जानकारी प्राप्त करने का अवसर देता है। इसके अंतर्गत तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर दिए जाते हैं, जबकि अतारांकित प्रश्नों के उत्तर लिखित रूप में दिए जाते हैं।
- लोकसभा के नियमों के अनुसार, किसी बैठक के दिन अधिकतम 20 तारांकित और 230 अतारांकित प्रश्न सूचीबद्ध किए जाते हैं। इससे मौखिक उत्तर प्राप्त करने वाले प्रश्नों की संख्या सीमित हो जाती है।
- 17वीं लोकसभा के दौरान प्रश्नकाल निर्धारित समय के केवल 60 प्रतिशत हिस्से में ही संचालित हो सका।
- शून्यकाल सांसदों को जनहित से जुड़े अत्यावश्यक मुद्दे उठाने का अवसर देता है।
यदि शून्यकाल के लिए पर्याप्त और संरक्षित समय निर्धारित नहीं किया जाता है, तो सदन की सदस्य संख्या बढ़ने से सांसदों की अपने निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित विशिष्ट समस्याएँ उठाने की क्षमता कमजोर हो सकती है।
- विधायी जाँच की सीमित व्यवस्था: संसदीय परिचर्चाओं के माध्यम से सांसद प्रस्तावित कानूनों की संवैधानिक वैधता और उनके अन्य प्रभावों की जाँच करते हैं।
- संसदीय समितियाँ विधेयकों की विस्तृत तथा विभिन्न दलों की भागीदारी वाली समीक्षा करती हैं। हालाँकि, उनकी प्रभावशीलता पर्याप्त सदस्य संख्या, परामर्श के अवसरों और जटिल कानूनों की जाँच के लिए उपलब्ध पर्याप्त समय पर निर्भर करती है।
- सार्वजनिक व्यय की सीमित जाँच: 17वीं लोकसभा के दौरान 35 प्रतिशत विधेयक एक घंटे से भी कम समय की चर्चा के बाद पारित किए गए। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय बजट का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा गिलोटिन प्रक्रिया अपनाकर पारित किया गया।
- गिलोटिन प्रक्रिया के अंतर्गत, निर्धारित समय समाप्त होने पर शेष अनुदान माँगों को विस्तृत चर्चा के बिना मतदान के लिए प्रस्तुत कर दिया जाता है।
- गैर-सरकारी सदस्यों के कार्यों के लिए सीमित अवसर: गैर-सरकारी सदस्यों के कार्य के अंतर्गत ऐसे सांसदों को विधेयक और संकल्प प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है, जो मंत्री नहीं हैं।
गैर-सरकारी सदस्यों की पहलों के लिए अपर्याप्त समय मिलने से उभरती सामाजिक समस्याओं पर चर्चा के अवसर कम हो जाते हैं।
संसद को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक उपाय
- वार्षिक बैठकों की न्यूनतम संख्या निर्धारित करना: संविधान का अनुच्छेद 85(1) यह प्रावधान करता है कि संसद के एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए। हालाँकि, इसमें प्रतिवर्ष बैठकों के दिनों की न्यूनतम संख्या निर्धारित नहीं की गई है।
- इस प्रावधान में संशोधन करके कार्य-दिवसों की अनिवार्य न्यूनतम संख्या निर्धारित करने वाला उपबंध शामिल किया जाना चाहिए।
- न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाले संविधान के कार्यकरण की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने वर्ष 2002 में सिफारिश की थी कि लोकसभा और राज्यसभा की बैठकें प्रतिवर्ष क्रमशः कम-से-कम 120 और 100 दिनों तक होनी चाहिए।
- महत्त्वपूर्ण संसदीय कार्यों के लिए समय सुरक्षित करना: संसद को प्रश्नकाल, शून्यकाल, गैर-सरकारी सदस्यों के कार्यों और विस्तृत विधायी बहसों के लिए न्यूनतम समय निर्धारित करना चाहिए। इसमें केवल स्पष्ट रूप से परिभाषित प्रक्रियागत अपवादों की अनुमति होनी चाहिए।
- संसदीय समितियों को विधेयकों की जाँच करने, हितधारकों से परामर्श करने और व्यय की समीक्षा करने के लिए बेहतर अनुसंधान सहायता तथा पर्याप्त समय उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
- विधायी योजना में सुधार: सरकार को विधेयकों और उनके साथ प्रस्तुत किए जाने वाले व्याख्यात्मक दस्तावेजों की पर्याप्त पूर्व सूचना देनी चाहिए, ताकि सांसद सदन में विचार-विमर्श से पहले उनके प्रावधानों का आकलन कर सकें।
- संस्थागत क्षमता में वृद्धि: लोकसभा की सदस्य संख्या में किसी भी वृद्धि के साथ पर्याप्त बैठक व्यवस्था, समिति संबंधी सुविधाएँ, अनुसंधान कर्मी, विधायी सहायता सेवाएँ और तकनीकी अवसंरचना भी विकसित की जानी चाहिए।
आगे की राह
- लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने से निर्वाचन प्रतिनिधित्व पर बढ़ते भार को कम करने में सहायता मिलेगी, लेकिन केवल संख्या में वृद्धि सार्थक लोकतांत्रिक भागीदारी की गारंटी नहीं दे सकती।
- वास्तविक प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि सांसद के पास संसद में नागरिकों की चिंताओं को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त समय और अवसर हो। अतः यह सुनिश्चित करने के लिए संसदीय सुधार आवश्यक हैं कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के नागरिकों की आवाज संसद में सुनी जाए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] संसदीय लोकतंत्र की प्रभावशीलता केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या पर ही नहीं, बल्कि विधायी कार्यवाही में सार्थक रूप से भाग लेने की उनकी क्षमता पर भी निर्भर करती है। लोकसभा के प्रस्तावित विस्तार के संदर्भ में संसदीय कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। |
स्रोत: TH
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