पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- हालिया ‘आठ सूत्रीय परिणाम एवं सहमति’ तथा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी–शी बैठक ने इस बहस को पुनर्जीवित किया है कि क्या भारत–चीन द्विपक्षीय संबंध एक टिकाऊ तनाव-शैथिल्य (Détente) के चरण में प्रवेश कर रहे हैं।
नैश संतुलन के बारे में
- खेल सिद्धांत (Game Theory) में नैश संतुलन ऐसी स्थिति है, जिसमें कोई भी पक्ष अपनी रणनीति में एकतरफा परिवर्तन करके अपने अपेक्षित परिणाम में सुधार नहीं कर सकता।
- भारत–चीन संबंधों के संदर्भ में, यह ऐसी स्थिति को दर्शाता है जिसमें कोई भी पक्ष असंगत सैन्य एवं राजनीतिक लागत वहन किए बिना अपनी क्षेत्रीय स्थिति में वास्तविक सुधार नहीं कर सकता।
- अतः वर्तमान सीमा-स्थिति को एक स्थिर किंतु अनसुलझे संतुलन के रूप में देखा जा सकता है—राजनयिक एवं सैन्य तनाव समय-समय पर पुनः उत्पन्न हो सकता है, किंतु किसी भी पक्ष द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) में निर्णायक एवं स्थायी परिवर्तन किए जाने की संभावना सीमित है।
नैश संतुलन एवं भारत–चीन सीमा संबंधी मुद्दे
- सीमा विवाद के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं:
- पश्चिमी क्षेत्र: अक्साई चिन, जो चीन के प्रशासनिक नियंत्रण में है, किंतु जिस पर भारत अपना दावा करता है।
- मध्य क्षेत्र: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड।
- पूर्वी क्षेत्र: अरुणाचल प्रदेश, जो भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में है, किंतु जिस पर चीन व्यापक रूप से अपना दावा करता है।

- भारत का अधिकतम उद्देश्य अक्साई चिन पर अपने दावे को पुनः स्थापित करना तथा अन्य क्षेत्रों में अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रखना होगा।
- चीन का अधिकतम उद्देश्य अन्य क्षेत्रों में अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रखते हुए दक्षिणी ढलानों तक अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा सुनिश्चित करना होगा।
- कठिन भू-भाग, विषम जलवायु, सैन्य रसद संबंधी चुनौतियाँ तथा लंबे समय से स्थापित सैन्य तैनाती बड़े पैमाने पर और स्थायी क्षेत्रीय लाभ प्राप्त करना अत्यंत कठिन बना देती हैं।
- फलतः, किसी बड़े रणनीतिक गलत आकलन अथवा आंतरिक राजनीतिक विघटन की स्थिति को छोड़कर, यथास्थिति में पर्याप्त दृढ़ता दिखाई देती है।
अंतिम सीमा-समझौता अभी भी कठिन क्यों है?
- भारत और चीन ने 1981 से लगभग निरंतर वार्ताएँ की हैं:
- सचिव/उप-मंत्री स्तर की वार्ताएँ (1981–1988)
- संयुक्त कार्य समूह (1989–2005)
- विशेष प्रतिनिधि तंत्र (2003–वर्तमान)
- 45 से अधिक वर्षों के दौरान दोनों पक्षों की औसतन लगभग एक बार प्रतिवर्ष बैठक हुई है, फिर भी ठोस प्रगति सीमित रही है।
- प्रमुख उपलब्धि अब भी भारत–चीन सीमा प्रश्न के समाधान के लिए राजनीतिक मानदंडों एवं मार्गदर्शक सिद्धांतों पर 2005 का समझौता है। इसमें निम्नलिखित प्रावधानों की परिकल्पना की गई थी:
- समग्र पैकेज-आधारित समाधान: जब तक पूरी सीमा का समाधान नहीं हो जाता, तब तक किसी भी हिस्से को अंतिम नहीं माना जाएगा।
- राजनीतिक समाधान: समाधान केवल मानचित्रण अथवा कानूनी प्रक्रिया तक सीमित न होकर राजनीतिक आधार पर किया जाए।
- विभिन्न रणनीतिक कारकों पर विचार: रणनीतिक हितों, इतिहास, राष्ट्रीय भावनाओं, व्यावहारिकता, भौगोलिक परिस्थितियों तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में बसे लोगों के हितों को ध्यान में रखा जाए।
- अतः अधिकतम क्षेत्रीय दावों और राजनीतिक रूप से व्यवहार्य समाधान के बीच का अंतर अब भी मूलभूत बाधा बना हुआ है।
संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ
- दलाई लामा का उत्तराधिकार: चीन द्वारा दलाई लामा के लिए अपने पसंदीदा उत्तराधिकारी की नियुक्ति किए जाने की संभावना है, जबकि तिब्बती संस्थाएँ अपना स्वयं का विकल्प प्रस्तुत कर सकती हैं।
- फलतः भारत के समक्ष एक जटिल रणनीतिक दुविधा उत्पन्न हो सकती है।
- विवादित उत्तराधिकार प्रक्रिया भारत–चीन तनाव को बढ़ा सकती है तथा तिब्बत में राजनीतिक अस्थिरता सुरक्षा संबंधी उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सकती है, जैसा कि 1962 के संघर्ष से जुड़े कारकों में भी तिब्बत की स्थिति एक महत्वपूर्ण संदर्भ रही थी।
- भारत–पाकिस्तान संघर्ष: भविष्य में भारत–पाकिस्तान के बीच टकराव उत्पन्न होने पर यदि चीन प्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल होता है, तो यह संघर्ष एक खतरनाक दो-मोर्चीय आयाम ग्रहण कर सकता है।
- ऑपरेशन सिंदूर (2025) के दौरान भारत ने पाकिस्तान को चीनी समर्थन मिलने का पता लगाया था।
- अतः भविष्य के किसी संघर्ष में चीन की अधिक प्रत्यक्ष भागीदारी वर्तमान भारत–चीन संतुलन को अस्थिर कर सकती है।
सीमा संबंधी मुद्दों के संदर्भ में दोनों देशों के प्रयास
- आठ सूत्रीय परिणाम एवं सहमति वक्तव्य: इसमें सीमा वार्ताओं में शीघ्र एवं ठोस प्रगति किए जाने का आह्वान किया गया है।
- यह आवश्यक रूप से 2005 के समग्र पैकेज-आधारित समाधान के सिद्धांत को त्यागता हुआ प्रतीत नहीं होता। इसके बजाय, यह क्रमिक अथवा ‘अर्ली हार्वेस्ट’ दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करता हुआ दिखाई देता है—अर्थात् किसी एक क्षेत्र में प्रगति करना, उसे सुदृढ़ करना और तत्पश्चात् दूसरे क्षेत्र की ओर आगे बढ़ना।
- हालाँकि, वर्तमान ढाँचे के अंतर्गत क्षेत्र-विशिष्ट प्रगति के लिए अंततः उसे समग्र सीमा-समझौते के एक हिस्से के रूप में स्वीकार करना आवश्यक होगा।
- इसी प्रकार, मोदी–शी की ब्रिक्स बैठक से संबंधित वक्तव्य भी 2005 के ढाँचे में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं करते हैं।
- अतः इसका महत्व सीमा विवाद के संबंध में किसी निर्णायक सफलता की अपेक्षा स्थिरीकरण एवं व्यावहारिक सहयोग की दिशा में प्रोत्साहन के रूप में अधिक है।
- दोनों पक्षों ने संवाद एवं सीमा-प्रबंधन के तंत्र को बनाए रखते हुए सैन्य प्रतिरोधक क्षमता और राजनयिक सहभागिता का संयोजन किया है।
- 2005 में निर्धारित राजनीतिक मानदंड, उसके बाद हुए समझौते तथा विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ताएँ इसके संस्थागत आधार प्रदान करते हैं।
- वर्तमान तनाव-शैथिल्य से व्यापार, वीज़ा, आपूर्ति शृंखला की सुदृढ़ता तथा अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करने वाली नदियों के संबंध में सहयोग को भी बढ़ावा मिल सकता है, जिससे नए सिरे से टकराव से बचने के लिए व्यापक प्रोत्साहन उत्पन्न होंगे।
आगे की राह
- भारत को द्वि-आयामी रणनीति अपनानी चाहिए:
- वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ विश्वसनीय सैन्य तैयारी एवं अवसंरचना को बनाए रखना;
- विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ताओं में तीव्रता लाना;
- अंतिम समग्र सीमा-समझौते के सिद्धांत से समझौता किए बिना क्षेत्र-विशिष्ट विश्वास-निर्माण उपायों एवं ‘अर्ली हार्वेस्ट’ को आगे बढ़ाना;
- दलाई लामा के उत्तराधिकार तथा भारत–पाकिस्तान तनाव से उत्पन्न संभावित संकटों से निपटने के लिए सुरक्षा-उपाय विकसित करना;
- बढ़ते आर्थिक एवं जन-से-जन संबंधों का उपयोग रणनीतिक सुरक्षा-कवच के निर्माण हेतु करना;
- स्थानीय घटनाओं को व्यापक संघर्ष में बदलने से रोकने के लिए संचार एवं संकट-प्रबंधन तंत्र को सुदृढ़ करना।
निष्कर्ष
- आठ सूत्रीय परिणाम एवं सहमति वक्तव्य तथा मोदी–शी की सहभागिता किसी अंतिम सीमा-समझौते के बजाय स्थिरीकरण की ओर संकेत करती है।
- भारत और चीन दोनों इस तथ्य को स्वीकार करते हुए प्रतीत होते हैं कि उनमें से कोई भी अपने अधिकतम क्षेत्रीय उद्देश्य को आसानी से प्राप्त नहीं कर सकता।
- अतः तात्कालिक आवश्यकता तनाव-शैथिल्य को समाधान समझने के बजाय वर्तमान नैश संतुलन को दीर्घकालिक रणनीतिक स्थिरता में परिवर्तित करने तथा साथ ही उन संभावित आघातों के लिए तैयार रहने की है, जो इस संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत–चीन सीमा विवाद में नैश संतुलन की स्थिति निरंतर स्पष्ट होती जा रही है, जहाँ कोई भी पक्ष स्वयं पर अत्यधिक लागत आरोपित किए बिना अपनी क्षेत्रीय स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार नहीं कर सकता। समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। |
स्रोत: IE