संक्षिप्त समाचार 21-09-2026

तुलु भाषा

पाठ्यक्रम: GS1/संस्कृति

संदर्भ

  • कर्नाटक मंत्रिमंडल ने दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का निर्णय लिया है।

तुलु के बारे में

  • कर्नाटक तुलु साहित्य अकादमी के अनुसार, तुलु एक स्वतंत्र द्रविड़ भाषा है, जिसका इतिहास 2,000 वर्षों से अधिक पुराना है।
    • यह मुख्य रूप से दक्षिण कन्नड़, उडुपी तथा केरल के कासरगोड के कुछ हिस्सों में बोली जाती है।
  • ऐतिहासिक साक्ष्य: दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास के एक यूनानी ग्रंथ चारिटियन पैपिरस में कर्नाटक के पश्चिमी तट के लोगों का उल्लेख मिलता है, जो एक विशिष्ट भाषा बोलते थे। वर्तमान में यह प्रमाणित हो चुका है कि यह भाषा तुलु थी।
    • दूसरी शताब्दी के तमिल संगम साहित्य में भी तुलु भाषी लोगों का उल्लेख मिलता है।
  • भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त तुलु को एक स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता देते हैं तथा जनगणना रिपोर्टों में इसके वक्ताओं के अलग-अलग आँकड़े उपलब्ध कराए जाते हैं।
    • तुलु एक अनुसूचित भाषा नहीं है, अर्थात इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है।
  • ऐतिहासिक रूप से तुलु की अपनी लिपि थी, जिसका उपयोग कई प्राचीन साहित्यिक कृतियों में किया जाता था। हालांकि, वर्तमान में आधुनिक तुलु लिखने के लिए मुख्य रूप से कन्नड़ लिपि का प्रयोग किया जाता है।
  • प्रथम तुलु शब्दकोश, मैनर्स तुलु-इंग्लिश डिक्शनरी,1886 में प्रकाशित हुआ था।

स्रोत: TH

स्वच्छ भारत मिशन (SBM)

पाठ्यक्रम: GS2/सरकारी पहल

संदर्भ

  • स्वच्छ भारत मिशन (SBM) अब केवल शौचालय निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में सतत स्वच्छता व्यवहार तथा व्यवहारगत परिवर्तन पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है।

स्वच्छ भारत मिशन (SBM) के बारे में

  • स्वच्छ भारत मिशन का शुभारंभ 2 अक्टूबर 2014 को सार्वभौमिक स्वच्छता कवरेज प्राप्त करने तथा 2 अक्टूबर 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त (ODF) बनाने के उद्देश्य से किया गया था। यह महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में शुरू किया गया था।
  • शौचालय अवसंरचना: घरेलू शौचालयों के निर्माण के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करने के साथ-साथ झुग्गी बस्तियों तथा प्रवासी जनसंख्या के लिए सामुदायिक शौचालयों के निर्माण को भी बढ़ावा दिया गया।
  • व्यवहारगत परिवर्तन: घर में शौचालय को अस्वच्छ मानने की पुरानी धारणा में परिवर्तन लाने के लिए सरकार ने निजी क्षेत्र तथा गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भागीदारी से विभिन्न कार्यक्रम चलाए और लोगों को खुले में शौच से मुक्ति (ODF) के लाभों के बारे में जागरूक किया।
  • इसके दो उप-मिशन हैं—स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) – SBM(G) तथा स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) – SBM(U)। इनका क्रियान्वयन क्रमशः जल शक्ति मंत्रालय तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
  • SBM(G): इसका उद्देश्य ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन गतिविधियों के माध्यम से स्वच्छता के स्तर में सुधार करना तथा ग्राम पंचायतों को खुले में शौच से मुक्त (ODF), स्वच्छ एवं सैनिटाइज्ड बनाना था।
    • 2019 में SBM(G) के प्रथम चरण का समापन हुआ। इसका दूसरा चरण 2020–21 में शुरू हुआ, जिसमें ठोस एवं तरल अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन तथा ODF की स्थिति को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • SBM (Urban) 2.0: इसे 2021 में शुरू किया गया और इसके 2026 तक जारी रहने की अपेक्षा है।
  • लक्ष्य: प्रथम चरण (2014–2021) की उपलब्धियों को बनाए रखना तथा प्रौद्योगिकी और निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से ठोस एवं तरल दोनों प्रकार के अपशिष्टों का उपचार सुनिश्चित करना।

स्रोत: DD News

एजेंटिक कॉमर्स (Agentic Commerce)

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

समाचार में

  • भुगतान उद्योग अपनी सेवाओं में एजेंटिक AI को एकीकृत कर रहा है।

एजेंटिक कॉमर्स

  • यह एक डिजिटल व्यापार मॉडल है, जिसमें AI एजेंट ग्राहकों की ओर से खरीदारी की प्रक्रिया को सरल बनाते हैं। ये एजेंट उत्पादों की खोज करने, वार्ता करने तथा लेन-देन को पूरा करने जैसे कार्य कर सकते हैं।
    • इसका अर्थ प्राधिकरण या अनुमति की आवश्यकता को समाप्त करना नहीं है।
  • यह केवल ग्राहक की ई-कॉमर्स यात्रा में शामिल विभिन्न चरणों, जिसमें भुगतान का चरण भी शामिल है, को कम करता है।

महत्त्व

  • एजेंटिक AI नकदी प्रवाह में संभावित कमी का पूर्वानुमान लगाने, चेकआउट संबंधी त्रुटियों की पहचान करने, बिलों का मिलान करने, खरीद आदेशों का मिलान करने, भुगतानों को निर्धारित समय पर करने तथा कार्यशील पूंजी प्रबंधन को बेहतर बनाने के माध्यम से B2B भुगतानों में व्यापक परिवर्तन ला सकता है।
  • EY के अनुसार, अच्छी गुणवत्ता वाले डेटा और प्रभावी शासन व्यवस्था के साथ एजेंटिक AI नियमित ट्रेजरी समन्वय के 80% तक कार्यों को स्वचालित कर सकता है तथा नकदी प्रवाह के पूर्वानुमान की सटीकता को लगभग 90% तक बढ़ा सकता है।
  • इसी समय, भारतपे और रेजरपे जैसी कंपनियाँ AI-सक्षम मर्चेंट, चेकआउट तथा भुगतान समाधान विकसित कर रही हैं। इससे उन लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs) को भी लाभ मिल सकता है, जिनके पास उन्नत ERP प्रणालियाँ उपलब्ध नहीं हैं

स्रोत: IE

सल्फर लागत में वृद्धि: उर्वरक क्षेत्र की नई समस्या

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

समाचार में

  • यूरिया और LNG की पर्याप्त उपलब्धता के कारण भारत संभावित उर्वरक संकट से बच गया है, लेकिन सल्फर की बढ़ती कीमतें अब DAP, SSP तथा अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों की उपलब्धता को प्रभावित कर रही हैं।

सल्फर

  • सल्फर एक महत्त्वपूर्ण अधात्विक तत्व तथा मूल्यवान वस्तु है, जिसका उपयोग उर्वरकों, रसायनों, औषधियों, कीटनाशकों, रबर, जल उपचार तथा धातु प्रसंस्करण में किया जाता है।
  • यह पृथ्वी की भूपर्पटी का एक प्राकृतिक घटक है। इसका खनन किया जाता है तथा तेल और प्राकृतिक गैस के प्रसंस्करण एवं धातु प्रगलन के दौरान उप-उत्पाद के रूप में भी इसकी बढ़ती मात्रा में प्राप्ति होती है।
  • सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन के लिए सल्फर सुदृढ़ कच्चा माल है। सल्फ्यूरिक अम्ल फॉस्फेट तथा अन्य उर्वरकों के उत्पादन में एक महत्त्वपूर्ण घटक है।
  • यह फसलों, पशुओं और मनुष्यों के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण पोषक तत्व है। यह पौधों के विकास को बढ़ावा देता है, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की दक्षता को बढ़ाता है तथा कुछ विशिष्ट प्रकार की मिट्टियों के सुधार में सहायता करता है।
  • इसका उपयोग डामर, सिंथेटिक रबर, रसायनों, औषधियों तथा विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं में भी किया जाता है।

खपत और आयात

  • भारत में प्रतिवर्ष लगभग 3.8–3.9 मिलियन टन सल्फर की खपत होती है। इसमें से उर्वरक क्षेत्र की अधिकांश आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी की जाती है।
  • इंडोनेशिया में इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बैटरियों के लिए निकेल के प्रसंस्करण हेतु सल्फ्यूरिक अम्ल की बढ़ती मांग ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। वहीं, रूस एवं चीन द्वारा कुछ निर्यातों पर प्रतिबंध लगाए जाने से भी आपूर्ति प्रभावित हुई है।
  • भूराजनीतिक संघर्षों, आपूर्ति संबंधी बाधाओं तथा औद्योगिक मांग में वृद्धि के कारण भारत का उर्वरक क्षेत्र आपूर्ति और कीमत—दोहरी समस्या का सामना कर रहा है।
  • आयातित सल्फर की कीमतें लगभग दोगुनी होकर 1,050–1,100 डॉलर प्रति टन तक पहुँच गई हैं। इसका एक कारण रूस-यूक्रेन तथा पश्चिम एशिया के संघर्षों के कारण उत्पन्न आपूर्ति संबंधी कठिनाइयाँ भी हैं।

स्रोत: IE

सैन्य ड्रोन की सुरक्षा के लिए AASHVAST लैब्स

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, रक्षा

संदर्भ

  • भारतीय सेना छह AASHVAST लैब्स स्थापित कर रही है, जिनका उद्देश्य ड्रोन तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की फर्मवेयर-स्तरीय कमजोरियों, छिपे हुए कोड तथा विदेशी मूल के घटकों की जाँच करना है। ऐसे तत्व सैन्य अभियानों के दौरान इन प्रणालियों के संचालन से समझौता कर सकते हैं।

AASHVAST लैब्स के बारे में

  • AASHVAST का पूर्ण रूपइलेक्ट्रॉनिक सिस्टम हार्डवेयर की सुभेद्यता और सुरक्षा खतरों का आकलन एवं विश्लेषण है।
  • यह एक फर्मवेयर विश्लेषण एवं सत्यापन प्रणाली है, जिसे क्विकपे प्राइवेट लिमिटेड द्वारा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं मैकेनिकल इंजीनियर्स महानिदेशालय (DG EME) के लिए विकसित किया गया है।
  • प्रारंभ में इन लैब्स का ध्यान सैन्य ड्रोन और UAV के घटकों पर रहेगा। भविष्य में सेना द्वारा खरीदे गए CCTV कैमरों की भी इसी प्रकार की सुरक्षा जाँच किए जाने की संभावना है।

फर्मवेयर सुरक्षा का महत्त्व

  • फर्मवेयर इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर में अंतर्निहित निम्न-स्तरीय सॉफ्टवेयर होता है, जो उसके मूलभूत कार्यों को नियंत्रित करता है।
  • विनिर्माण, विभिन्न घटकों के एकीकरण अथवा सॉफ्टवेयर अपग्रेड के दौरान इसमें सुरक्षा कमजोरियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • किसी संक्रमित या छेड़छाड़ किए गए घटक के कारण ड्रोन संभावित रूप से अपने निर्धारित मिशन से भटक सकता है, काम करना बंद कर सकता है, समय से पहले अपना संचालन समाप्त कर सकता है अथवा विशिष्ट परिस्थितियों में असामान्य व्यवहार कर सकता है।

स्रोत: IT

SLINEX-26

पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा

संदर्भ

  • श्रीलंका-भारत द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास SLINEX-26 का 13वाँ संस्करण विशाखापट्टनम में आयोजित किया गया।

परिचय

  • 2005 में इसकी संकल्पना की गई थी। इसके बाद SLINEX दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच समुद्री सहयोग, अंतर-संचालनीयता तथा पारस्परिक समझ को बढ़ावा देने वाला एक महत्त्वपूर्ण मंच बन गया है।
  • भारत की MAHASAGAR की परिकल्पना के अनुरूप, SLINEX-26 एक सुरक्षित, स्थिर एवं समावेशी समुद्री वातावरण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है तथा भारत और श्रीलंका के बीच दीर्घकालिक समुद्री साझेदारी को सुदृढ़ करता है।

स्रोत: PIB

 

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