भारत–दक्षिण कोरिया आर्थिक संबंध सुदृढ़ होने की ओर अग्रसर

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • भारत–दक्षिण कोरिया संबंध पिछले तीन दशकों में उल्लेखनीय रूप से विकसित हुए हैं, जो अब रणनीतिक अभिसरण, साझा विकास पथ और वैश्विक भू-राजनीति में सामंजस्य द्वारा परिभाषित होते जा रहे हैं।

भारत–दक्षिण कोरिया (कोरिया गणराज्य) संबंधों के बारे में

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
    • 1973 में राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
    • 1991 के बाद भारत में आर्थिक सुधारों के पश्चात संबंध सुदृढ़ हुए।
    • ‘लुक ईस्ट’ से ‘एक्ट ईस्ट नीति’ तक ने सहभागिता को बढ़ाया।
  • संस्थागत ढाँचा:
  • व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA), 2010
  • विशेष रणनीतिक साझेदारी, 2015
  • नियमित शिखर-स्तरीय बैठकें और संयुक्त आयोग
  • साझेदारी राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, सांस्कृतिक और तकनीकी क्षेत्रों को आच्छादित करती है।

‘रणनीतिक दर्पण’ का उद्भव (रणनीतिक अभिसरण)

  • भारत–दक्षिण कोरिया संबंध आर्थिक पूरकता से रणनीतिक सामंजस्य की ओर बढ़े हैं, विशेषकर 2015 में विशेष रणनीतिक साझेदारी बनने के बाद।
  • विकासात्मक अभिसरण: प्रौद्योगिकी-आधारित विकास मॉडल; अवसंरचना और विनिर्माण पर बल; मानव पूंजी में बड़े निवेश।
    • कोरिया की पूर्व औद्योगिक सफलता भारत की वर्तमान विकास यात्रा का प्रतिबिंब है।
  • साझा मूल्य और वैश्विक दृष्टिकोण: लोकतांत्रिक प्रणाली; नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता; मुक्त, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक का समर्थन।
    • यह वैश्विक शासन मुद्दों में स्वाभाविक सामंजस्य उत्पन्न करता है।

आर्थिक सहयोग

  • व्यापार और निवेश:
    • द्विपक्षीय व्यापार: $28 अरब से अधिक
    • दक्षिण कोरिया: भारत में शीर्ष FDI निवेशक (5वाँ सबसे बड़ा; लगभग $6–7 अरब)
  • प्रमुख क्षेत्र: ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, भारी उद्योग और शिपबिल्डिंग

रक्षा और सुरक्षा सहयोग

  • इंडो-पैसिफिक सहयोग: इंडो-पैसिफिक रणनीति के अंतर्गत सामंजस्य; नौवहन की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान।
  • दोनों राष्ट्र परमाणु खतरों का सामना करते हैं (उत्तर कोरिया; चीन–पाकिस्तान धुरी)।
  • रक्षा उत्पादन, समुद्री सुरक्षा और साइबर सुरक्षा में बढ़ता सहयोग।

प्रौद्योगिकी और उभरते क्षेत्र

  • मुख्य सहयोग क्षेत्र: सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रिक वाहन एवं बैटरियाँ, स्वच्छ ऊर्जा।
    • उन्नत विनिर्माण में कोरिया की ताकत भारत के बाज़ार आकार और प्रतिभा पूल को पूरक करती है।
  • नीतिगत पहलें: भारत का सेमीकंडक्टर मिशन और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ; कोरिया की चिप निर्माण एवं इलेक्ट्रॉनिक्स में अग्रणी भूमिका।

भारत–दक्षिण कोरिया संबंधों में प्रमुख चुनौतियाँ

  • लगातार व्यापार असंतुलन: भारत को दक्षिण कोरिया के साथ बढ़ते व्यापार घाटे का सामना करना पड़ता है।
    • CEPA (2010) का असमान लाभ: CEPA ने कोरियाई निर्यात को अधिक लाभ पहुँचाया, जिससे भारत में गहन व्यापार उदारीकरण के विरुद्ध दबाव उत्पन्न हुआ।
  • CEPA का अपर्याप्त उपयोग: सीमित उत्पाद कवरेज, सेवाओं का अपर्याप्त एकीकरण और MSMEs द्वारा कम उपयोग के कारण CEPA अपनी पूर्ण क्षमता तक नहीं पहुँच पाया।
    • CEPA 2.0 का उन्नयन आवश्यक है।
  • गैर-शुल्क बाधाएँ (NTBs) और बाज़ार पहुँच समस्याएँ: भारतीय निर्यातकों को कठोर मानकों, प्रमाणन आवश्यकताओं और जटिल नियामक प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है।
    • कोरियाई कंपनियों को भारत में नौकरशाही विलंब और नीतिगत अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।
  • सीमित उच्च-प्रौद्योगिकी सहयोग: संभावनाओं के बावजूद सेमीकंडक्टर, उन्नत R&D और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में सहयोग अपेक्षा से कम है।
  • औद्योगिक क्षमता में संरचनात्मक अंतर: कोरिया की उन्नत विनिर्माण अर्थव्यवस्था और भारत का विकासशील औद्योगिक आधार असमान प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करता है।
  • नियामक और नौकरशाही बाधाएँ: जटिल कर और अनुपालन प्रणाली; भूमि और श्रम संबंधी बाधाएँ; वीज़ा एवं गतिशीलता प्रतिबंध।
  • सीमित जन-से-जन और सांस्कृतिक संबंध: शैक्षणिक आदान-प्रदान, पर्यटन और सांस्कृतिक परिचय अपेक्षाकृत कम हैं।
  • भू-राजनीतिक बाधाएँ: कोरिया के चीन के साथ सुदृढ़ आर्थिक संबंध और भारत–चीन तनाव।
  • आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण चुनौतियाँ: संस्थागत तंत्र की कमी और उद्योगों में समन्वय अंतराल।
  • समर्पित प्रौद्योगिकी ढाँचे का अभाव: संयुक्त R&D, सह-निर्माण और नवाचार साझेदारी हेतु कोई व्यापक संस्थागत संरचना नहीं है।

आगे की राह: भारत–दक्षिण कोरिया संबंधों को सुदृढ़ करना

  • आर्थिक भागीदारी का उन्नयन: CEPA 2.0: व्यापार असंतुलन, गैर-शुल्क बाधाओं और सीमित सेवाओं के व्यापार को संबोधित करने हेतु CEPA 2.0 का उन्नयन आवश्यक है।
    • MSME भागीदारी और डिजिटल व्यापार सुविधा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • समर्पित प्रौद्योगिकी साझेदारी ढाँचा निर्माण: सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियाँ और स्वच्छ ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में भारत-कोरिया प्रौद्योगिकी गठबंधन (iCET प्रकार के ढाँचे जैसा) स्थापित किया जाए।
    • सरकार, उद्योग और अकादमिक जगत की भागीदारी से संस्थागत सह-नवाचार और R&D सहयोग की आवश्यकता है।
  • आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन का सुदृढीकरण: इलेक्ट्रॉनिक्स, महत्वपूर्ण खनिज और औषधियों जैसे क्षेत्रों में विश्वसनीय और विविधीकृत आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकास किया जाए।
    • भारत का पैमाना और कोरिया की तकनीकी गहराई मिलकर पूरक वैश्विक मूल्य श्रृंखलाएँ बना सकते हैं।
  • रक्षा और समुद्री सहयोग को बढ़ाना: रक्षा निर्माण (मेक इन इंडिया), नौसैनिक अभ्यास और समुद्री सुरक्षा में सहयोग का विस्तार किया जाए।
    • इंडो-पैसिफिक में रणनीतियों का सामंजस्य स्थापित किया जाए।
  • निवेश और औद्योगिक सहयोग को प्रोत्साहन: भारत में ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में सुधार किया जाए।
    • विनिर्माण क्लस्टर, स्मार्ट सिटी और अवसंरचना में कोरियाई निवेश को प्रोत्साहित किया जाए।
    • उच्च मूल्य FDI और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण आकर्षित करने हेतु नियामक बाधाओं को कम करना आवश्यक है।
  • जन-से-जन और सांस्कृतिक संबंधों को बेहतर करना: शैक्षणिक आदान-प्रदान, पर्यटन और सांस्कृतिक कूटनीति का विस्तार किया जाए।
    • सुदृढ़ सामाजिक जुड़ाव दीर्घकालिक साझेदारी की स्थिरता सुनिश्चित करेगा।
  • रणनीतिक संवाद तंत्र का संस्थानीकरण: नियमित 2+2 संवाद (विदेश एवं रक्षा मंत्री स्तर) आयोजित किए जाएँ।
    • Track 1.5 और Track 2 कूटनीति को सुदृढ़ किया जाए।
    • इससे क्षेत्रीय सुरक्षा, उभरती प्रौद्योगिकियों और वैश्विक शासन पर समन्वय संभव होगा।
  • बहुपक्षीय और इंडो-पैसिफिक ढाँचों में सहयोग: इंडो-पैसिफिक पहलों, आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन ढाँचों और ग्लोबल साउथ सहयोग में मिलकर कार्य किया जाए।
    • दोनों राष्ट्र मिडल पावर के रूप में क्षेत्रीय व्यवस्था को आकार दे सकते हैं।
  • उभरते क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना: हरित हाइड्रोजन और जलवायु सहयोग, डिजिटल अर्थव्यवस्था एवं साइबर सुरक्षा, तथा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी।
  • दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि का निर्माण: परियोजना-आधारित सहयोग से संस्थागत साझेदारी की ओर बढ़ना।
    • आगामी दशकों के लिए साझा रोडमैप विकसित करना।

निष्कर्ष

  • भारत–दक्षिण कोरिया संबंध लेन-देन आधारित आर्थिक संबंधों से आगे बढ़कर साझा दृष्टि और संरचनात्मक अभिसरण पर आधारित रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हो रहे हैं।
  • भू-राजनीतिक परिवर्तनों और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के युग में यह साझेदारी इंडो-पैसिफिक स्थिरता एवं वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन का एक प्रमुख स्तंभ बन सकती है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत–दक्षिण कोरिया आर्थिक संबंधों को आकार देने में व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। इसके पूर्ण संभावित लाभों को प्राप्त करने के लिए किन सुधारों की आवश्यकता है?

स्रोत: BL

 

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