भारत का ऊष्मा संकट एवं विधायी रिक्तता का मानचित्रण

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण; जलवायु परिवर्तन

संदर्भ
 

  • हीटवेव देश के 57% से अधिक जिलों को प्रभावित कर रही हैं, जिनमें तटीय एवं समशीतोष्ण क्षेत्र भी शामिल हैं, जबकि पूर्व में यह मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी एवं मध्य क्षेत्रों तक सीमित थीं। तथापि, इसका प्रभाव समान नहीं है, जिससे विद्वानों द्वारा ‘तापीय अन्याय’ (Thermal Injustice) की संकल्पना पर बल दिया जा रहा है।

भारत का ऊष्मा संकट

  • हीटवेव अब पूरे भारत में फैल चुकी हैं, जो आर्द्र तटीय क्षेत्रों एवं पहाड़ी प्रदेशों को भी प्रभावित कर रही हैं। बढ़ते तापमान एवं आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव से शुष्क ऊष्मा की तुलना में अधिक तापीय तनाव उत्पन्न हो रहा है।
    •  ऊष्मा के संपर्क की आवृत्ति एवं अवधि दोनों में वृद्धि हो रही है, जिसके गंभीर सामाजिक-आर्थिक परिणाम सामने आ रहे हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में हीटवेव की आवृत्ति, अवधि एवं भौगोलिक विस्तार में वृद्धि हो रही है।
    •  जो क्षेत्र पूर्व में कम प्रभावित थे (तटीय, पूर्वी एवं पहाड़ी क्षेत्र), वे अब आर्द्रता (हीट इंडेक्स प्रभाव) के कारण अधिक तापीय तनाव का अनुभव कर रहे हैं।
    •  अत्यधिक ऊष्मा की घटनाएँ भारत के जलवायु जोखिम प्रोफ़ाइल की एक प्रमुख विशेषता बनती जा रही हैं।
  •  ऊष्मा का संपर्क अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) से संबंधित है, और यह संकट वर्तमान जलवायु शासन ढाँचों की सीमाओं को भी दर्शाता है।

हीटवेव के बारे में

  •  ये किसी क्षेत्र में सामान्य अपेक्षित तापमान की तुलना में असामान्य रूप से अधिक तापमान की दीर्घ अवधि होती हैं।
    भारत में हीटवेव मुख्यतः मार्च से जून के बीच होती हैं तथा कुछ दुर्लभ मामलों में जुलाई तक भी बनी रह सकती हैं।
  • तापमान-आधारित मानदंड 
    • मैदानी क्षेत्र: ≥ 40°C
    • पहाड़ी क्षेत्र: ≥ 30°C
    • तटीय क्षेत्र: ≥ 37°C तथा विचलन ≥ 4.5°C
  • जब सामान्य तापमान से विचलन 6.4°C से अधिक हो जाता है, तो ‘गंभीर हीटवेव’ घोषित की जाती है।
  •  किसी क्षेत्र के कम से कम 2 स्टेशनों में यह स्थिति कम से कम 2 लगातार दिनों तक बनी रहनी चाहिए।
  • भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) अपने दैनिक बुलेटिन तथा GIS-आधारित दृश्य मंच के माध्यम से आगामी 5 दिनों के लिए रंग-कोडित हीटवेव चेतावनी प्रदान करता है।

हीटवेव के अनुकूल परिस्थितियाँ

  • किसी क्षेत्र में गर्म एवं शुष्क वायु का प्रवाह
  • ऊपरी वायुमंडल में आर्द्रता का अभाव
  • आकाश का लगभग पूर्णतः मेघहीन होना
  • क्षेत्र पर उच्च आयाम का प्रतिचक्रवाती प्रवाह

भारत के ऊष्मा संकट के प्रेरक कारक 

  • जलवायु परिवर्तन : वैश्विक ऊष्मीकरण ने अत्यधिक तापमान की घटनाओं को तीव्र किया है। विभिन्न अध्ययन मानवजनित उत्सर्जन एवं हीटवेव की तीव्रता के बीच प्रत्यक्ष संबंध दर्शाते हैं।
  • शहरीकरण एवं ऊष्मा द्वीप प्रभाव : तीव्र शहरीकरण के कारण शहरी ऊष्मा द्वीप (UHI) प्रभाव उत्पन्न होता है, जिससे शहरों का तापमान बढ़ता है।
    •  अपर्याप्त आवास एवं वेंटिलेशन की कमी से ऊष्मा का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।
  • पर्यावरणीय क्षरण : हरित आच्छादन एवं जल निकायों की हानि तथा बढ़ता वायु प्रदूषण ऊष्मा को फँसाते हैं और शीतलन क्षमता को कम करते हैं।

सामाजिक-आर्थिक आयाम: तापीय असमानता 

  • अनौपचारिक कार्यबल की संवेदनशीलता: भारत की लगभग 75–80% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है। ऊष्मा के संपर्क से उत्पादकता में कमी, आय हानि एवं स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं।
    •  तापमान वृद्धि के साथ आय में उल्लेखनीय गिरावट देखी जाती है।
  • शहरी गरीब एवं अनौपचारिक बस्तियाँ: झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपर्याप्त आवासीय इन्सुलेशन तथा जल एवं विद्युत की सीमित उपलब्धता का सामना करना पड़ता है।
    •  भीड़भाड़ एवं अनुकूलन अवसंरचना के अभाव से जोखिम और बढ़ जाता है।
  • जाति एवं व्यावसायिक जोखिम: हाशिए पर स्थित समुदाय उच्च जोखिम वाले बाहरी कार्यों में अधिक प्रतिनिधित्व रखते हैं, जिससे असमानता और गहराती है।
  • लैंगिक प्रभाव : महिला श्रमिक (जैसे निर्माण कार्यकर्ता) ऊष्मा के संपर्क एवं सामाजिक प्रतिबंधों के दोहरे भार का सामना करती हैं तथा प्रायः अनुकूलन संसाधनों से वंचित रहती हैं।

तापीय अन्याय की संकल्पना

  •  यह ऊष्मा के असमान संपर्क एवं उससे निपटने की असमान क्षमता को संदर्भित करता है। इसका आधार सामाजिक-आर्थिक असमानता, व्यावसायिक संरचना एवं शहरी नियोजन की कमियाँ हैं।
  •  यह जलवायु जोखिम, श्रम अस्थिरता एवं सामाजिक पदानुक्रम के अंतर्संबंध को उजागर करता है।

क्षेत्रीय प्रभाव 

  • श्रम एवं अर्थव्यवस्था : ऊष्मा तनाव कार्य-घंटों, श्रम आपूर्ति तथा आर्थिक उत्पादन को कम कर देता है।
    •  अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक जीविका की बाध्यता के कारण अत्यधिक गर्मी के बावजूद कार्य जारी रखते हैं।
  • उच्च जोखिम वाले व्यवसाय :
    • निर्माण श्रमिक : स्टील एवं कंक्रीट से निकलने वाली विकिरणीय ऊष्मा के संपर्क से शारीरिक तनाव बढ़ता है।
    • सड़क विक्रेता : स्वास्थ्य जोखिमों के साथ-साथ मांग में गिरावट का सामना करते हैं।
    • गिग श्रमिक : एल्गोरिदमिक दबाव के अधीन कार्य करते हैं, जिससे विश्राम अवकाश लेने में बाधा उत्पन्न होती है।
    • स्वच्छता कर्मी : सूक्ष्म-जलवायु में कार्य करते हैं, जहाँ तापमान लगभग 5% अधिक होता है; साथ ही विषाक्त अपशिष्ट धुएँ के संपर्क से जोखिम और बढ़ जाता है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य : हीटवेव के कारण हीटस्ट्रोक एवं निर्जलीकरण; साथ ही हृदय एवं गुर्दा संबंधी तनाव उत्पन्न होता है।
    •  ऊष्मा को अब एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति के रूप में तेजी से मान्यता मिल रही है।
  • प्रवासन एवं आजीविका : ऊष्मा तनाव, विशेषकर कृषि एवं निर्माण श्रमिकों के बीच, संकट-प्रेरित प्रवासन को बढ़ावा देता है।

शासन एवं नीतिगत अंतराल 

  • हीट एक्शन प्लान (HAPs): भारत इस क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी (अहमदाबाद मॉडल) है, किन्तु इसका क्रियान्वयन असमान एवं शहरी-केंद्रित है; साथ ही ध्यान प्रायः प्रवर्तन के बजाय जागरूकता तक सीमित रहता है।
  • श्रम संरक्षण में कमी : अनौपचारिक श्रमिकों के लिए विधिक सुरक्षा एवं व्यावसायिक ऊष्मा मानकों का अभाव है।
    • कारखाना अधिनियम, 1948: यह मुख्यतः आंतरिक कार्यस्थलों तक सीमित है।
    • व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-दशा संहिता, 2020 (OSHWC संहिता):इसमें ऊष्मा मानकों को अनिवार्य नहीं किया गया है तथा सुरक्षा उपायों को कार्यपालिका के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
  • आपदा प्रबंधन में अंतराल:  हीटवेव को पूर्णतः आपदा प्रतिक्रिया ढाँचों में एकीकृत नहीं किया गया है, जिससे वित्तपोषण एवं तैयारी सीमित रहती है।
    •  हीटवेव को अधिसूचित आपदा के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है; तथा राज्यों को ‘SDRF व्यय की 10% सीमा’ का सामना करना पड़ता है, जिससे राहत कार्य बाधित होते हैं।
  • नीतिगत अंध बिंदु : हीट इंडेक्स आधारित मानकों का अभाव आर्द्र क्षेत्रों के लिए प्रतिकूल सिद्ध होता है।
    •  अनौपचारिक एवं गिग श्रमिक औपचारिक संरक्षण ढाँचों से बाहर रह जाते हैं।

आगे की राह: ऊष्मा न्याय की ओर

  • विधिक मान्यता एवं आपदा वर्गीकरण: हीटवेव एवं आकाशीय विद्युत को राष्ट्रीय आपदा सूची में शामिल किया जाए (वित्त आयोग की अनुशंसा)।
    •  राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) तक पहुँच सुनिश्चित की जाए।
  • श्रम कानून सुधार :  OSHWC संहिता की धारा 23 के अंतर्गत बाध्यकारी नियम अधिसूचित किए जाएँ:
    • अनिवार्य कार्य-विश्राम चक्र
    • व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) एवं जलापूर्ति की व्यवस्था
  • हीट इंडेक्स का अपनाना : तापमान-आधारित मानकों से हटकर हीट इंडेक्स आधारित मानकों को अपनाया जाए।
    •  यह तटीय एवं आर्द्र क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से आवश्यक है।
  • ‘राईट टू कूल’ की मान्यता : अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के आधार पर सार्वजनिक शीतलन आश्रयों एवं निःशुल्क जल कियोस्क की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेप :
    • गिग अर्थव्यवस्था: हीट अलर्ट के दौरान एल्गोरिदमिक दंड पर प्रतिबंध।
    • स्वच्छता कर्मी: विषाक्त संपर्क हेतु विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल।
    • शहरी नियोजन: ऊष्मा-प्रतिरोधी अवसंरचना का विकास।
  • आय संरक्षण तंत्र : ऊष्मा-संबद्ध क्षतिपूर्ति योजनाओं की आवश्यकता; तथा SEWA के पैरामीट्रिक हीट बीमा जैसे मॉडलों का विस्तार।

निष्कर्ष

  •  भारत में अत्यधिक ऊष्मा अब केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक संवैधानिक, आर्थिक एवं नैतिक चुनौती बन चुकी है।
  •  इससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए परामर्श-आधारित शासन से आगे बढ़कर प्रवर्तनीय अधिकारों की दिशा में परिवर्तन आवश्यक है, ताकि तापीय सुरक्षा को सामाजिक अनुबंध के एक मूलभूत घटक के रूप में सुनिश्चित किया जा सके।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत के ऊष्मा संकट में विद्यमान विधायी अंतराल की सीमा का परीक्षण कीजिए तथा अधिकार-आधारित एवं प्रवर्तनीय ऊष्मा शासन व्यवस्था स्थापित करने हेतु उपाय सुझाइए।

स्रोत: TH

 

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