भारत के लिए अवसर: परिवर्तित वैश्विक व्यवस्था में

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • वर्तमान वैश्विक व्यवस्था अनेक समकालीन संकटों से चिह्नित है, जहाँ विरोधी और सहयोगी दोनों ही विचलित हैं। इससे भारत को एक अस्थायी रणनीतिक विराम प्राप्त हुआ है।
    • यह भारत के लिए बाहरी उकसावे पर प्रतिक्रिया देने के बजाय आंतरिक शक्ति को सुदृढ़ करने का दुर्लभ अवसर है।

बहुध्रुवीयता को समझना

  • बहुध्रुवीयता वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था है जिसमें अनेक शक्ति केंद्र (जैसे अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ, भारत, रूस) सह-अस्तित्व में रहते हैं और वैश्विक शासन को प्रभावित करते हैं।
  • भारत बहुध्रुवीयता का समर्थन करता है क्योंकि इससे रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ती है, किसी एक शक्ति का प्रभुत्व रोका जा सकता है और भारत जैसे मध्यम शक्तियों को वैश्विक परिणामों को आकार देने का अवसर मिलता है।

एकध्रुवीय विश्व से बहुध्रुवीयता की ओर परिवर्तन के कारण

  • अमेरिका का सापेक्ष पतन: आर्थिक चुनौतियाँ, आंतरिक ध्रुवीकरण, रणनीतिक अति-विस्तार (इराक, अफगानिस्तान), और वैश्विक ‘पुलिस’ की भूमिका निभाने की अनिच्छा।
  • चीन का उदय: दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, आक्रामक विदेश नीति (BRI, दक्षिण चीन सागर), सैन्य आधुनिकीकरण।
  • रूस का पुनरुत्थान: यूक्रेन संघर्ष, ऊर्जा कूटनीति और सैन्य क्षमता।
  • मध्यम शक्तियों का उदय: भारत, ब्राज़ील, तुर्की, इंडोनेशिया का प्रभाव बढ़ना; BRICS और SCO जैसे नए मंचों का गठन।
  • वैश्वीकरण का विखंडन: व्यापार युद्ध, आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, आर्थिक राष्ट्रवाद और संरक्षणवाद।

भारत की बहुध्रुवीयता की दृष्टि

  • ‘बहुध्रुवीय विश्व, बहुपक्षीय विश्व’: बहुध्रुवीयता को सुधारित बहुपक्षीय संस्थाओं (UNSC, IMF, World Bank) द्वारा समर्थित होना चाहिए।
    • भारत समावेशी वैश्विक शासन का पक्षधर है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता (गुटनिरपेक्षता 2.0): भारत कठोर गठबंधनों से बचता है और प्रतिस्पर्धी शक्तियों से संबंध बनाए रखता है।
    • अमेरिका (रणनीतिक साझेदारी)
    • रूस (रक्षा संबंध)
    • चीन (प्रतिस्पर्धा एवं सहयोग)
    • ग्लोबल साउथ (नेतृत्व भूमिका)

भारत की बहुध्रुवीय रणनीति के स्तंभ

  • मुद्दा-आधारित संरेखण:
    • QUAD → इंडो-पैसिफिक सुरक्षा
    • BRICS → ग्लोबल साउथ सहयोग
    • SCO → यूरेशियाई सहभागिता
  • प्रमुख शक्तियों का संतुलन: अमेरिका से तकनीक और रक्षा सहयोग, रूस से ऊर्जा एवं सैन्य आपूर्ति, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा का प्रबंधन।
  • ग्लोबल साउथ नेतृत्व: भारत विकासशील देशों की आवाज़ के रूप में उभर रहा है (जैसे G20 अध्यक्षता 2023, ऋण राहत और जलवायु न्याय का समर्थन)।

बहुध्रुवीय विश्व में भारत के अवसर

  • रणनीतिक विस्तार: स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की लचीलापन और बेहतर समझौते करने की क्षमता।
  • आर्थिक लाभ: चीन से हटकर आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण; वैश्विक निवेश आकर्षित करना।
  • मानक निर्माण भूमिका: जलवायु परिवर्तन, डिजिटल शासन और समुद्री सुरक्षा पर वैश्विक नियमों को आकार देने का अवसर।

भारत की प्रमुख रणनीतिक कमजोरियाँ

  • सैन्य आधुनिकीकरण की कमी: आयात पर निर्भरता, उन्नत तकनीकों की आवश्यकता।
  • चीन की आक्रामकता: LAC और इंडो-पैसिफिक में चुनौती।
  • कमज़ोर बहुपक्षीय संस्थाएँ: UNSC सुधार ठप, पश्चिमी शक्तियों का प्रभुत्व।
  • विरोधाभासों का संतुलन: अमेरिका-रूस तनाव का प्रबंधन, BRICS और SCO में चीन के साथ सहभागिता।
  • ऊर्जा निर्भरता: 80% कच्चे तेल का आयात, वैश्विक संघर्षों से संवेदनशीलता।
  • महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता: लिथियम, कोबाल्ट, रेयर अर्थ्स का आयात; घरेलू क्षमता सीमित।
  • खनन क्षेत्र की कमज़ोरियाँ: नीतिगत अनिश्चितता, निजी क्षेत्र की दक्षता सीमित।
  • उर्वरक निर्भरता: आयात पर उच्च निर्भरता, कृषि स्थिरता पर प्रभाव।
  • अंतरिक्ष एवं खुफ़िया कमियाँ: उपग्रह कवरेज सीमित, NavIC और ISR को सुदृढ़ करने की आवश्यकता।
  • आपूर्ति श्रृंखला कमजोरियाँ: चीन-केंद्रित आपूर्ति पर निर्भरता।
  • आर्थिक बाधाएँ: उच्च विकास दर की आवश्यकता; रोजगार, विनिर्माण और निर्यात प्रतिस्पर्धा की चुनौतियाँ।

आगे की राह: भारत की नीति प्राथमिकताएँ

  • अल्पकालिक (0–5 वर्ष): रक्षा सुधार, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विस्तार, अंतरिक्ष क्षमताओं को सुदृढ़ करना, खनन क्षेत्र में सुधार।
  • मध्यम अवधि: ऊर्जा विविधीकरण, आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन, तकनीकी आत्मनिर्भरता।
  • दीर्घकालिक: उच्च आर्थिक विकास बनाए रखना, रणनीतिक स्वायत्तता को संस्थागत रूप देना, व्यापक राष्ट्रीय शक्ति का विकास।

निष्कर्ष

  • संघर्ष और अनिश्चितता से घिरे विश्व में भारत के पास अपनी नींव को सुदृढ़ करने का दुर्लभ अवसर है। बाहरी विचलनों में उलझने के बजाय भारत को अपनी क्षमताओं, लचीलापन और आर्थिक विकास में निवेश करना चाहिए।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में परिवर्तन भारत के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों प्रस्तुत करता है। बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका एवं उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं का विवेचन कीजिए।

स्रोत: BS

 

Other News

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; शिक्षा संदर्भ प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक का उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को क्रियान्वित करना है। तथापि, इसके संबंध में संवैधानिक वैधता, संघीय संतुलन, संस्थागत स्वायत्तता और सामाजिक न्याय को लेकर चिंताएँ उठती हैं। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ वैधानिक...
Read More

पाठ्यक्रम: GS1/भारतीय समाज; GS2/शासन एवं सामाजिक न्याय; GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था संदर्भ विगत दशक में भारत ने महिला सशक्तिकरण को केवल कल्याणकारी उद्देश्य के रूप में देखने से आगे बढ़कर इसे आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक गहराई का प्रेरक तत्व मानना शुरू किया है। यह परिवर्तन वित्तीय समावेशन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा एवं संवैधानिक...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था; उद्योग संदर्भ भारत का वस्त्र उद्योग रोजगार, निर्यात और ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तथापि, यह जलवायु-जनित ऊष्मा तनाव जैसी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो इसकी दीर्घकालिक स्थिरता को खतरे में डालता है। भारत के वस्त्र उद्योग का अवलोकन भारतीय वस्त्र उद्योग विविध...
Read More

पाठ्यक्रम: राजव्यवस्था एवं शासन; स्थानीय स्वशासन; GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था संदर्भ 16वाँ वित्त आयोग वित्तीय विकेंद्रीकरण में एक परिवर्तनकारी बदलाव का संकेत देता है, जिसमें पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) पर अभूतपूर्व ध्यान केंद्रित किया गया है। तथापि, जवाबदेही, राज्यों की स्वायत्तता एवं संस्थागत क्षमता को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/सरकारी नीतियां एवं हस्तक्षेप संदर्भ हाल ही में हास्य कलाकार (पुलकित मणि) का वीडियो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(b) के अंतर्गत अवरुद्ध किया गया। यह घटना भारत में अपारदर्शी और मनमानी डिजिटल सेंसरशिप को लेकर बढ़ती चिंताओं को उजागर करती है। ऐसे प्रसंग भारत के डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संदर्भ संघीय बजट 2025–26 में उल्लिखित अनुसार भारत वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट (GW) तक विस्तारित करने के लिए तैयार है। इसके लिए शांति अधिनियम, 2025 की रूपांतरणकारी भावना के अनुरूप सहायक नियमों और विनियमों की आवश्यकता है। भारत के लिए परमाणु...
Read More
scroll to top