पाठ्यक्रम: GS1/ इतिहास
संदर्भ
- तमिलनाडु के पूम्पुहार (कावेरीपट्टिनम) के तट से दूर हाल में किए गए जलमग्न पुरातात्त्विक उत्खननों ने इस बंदरगाह नगर की दीर्घ-दूरी वाले समुद्री व्यापार में भागीदारी के प्रमाणों को और सुदृढ़ किया है।
परिचय
- पश्चिम एशियाई टॉरपीडो-घड़े के एक खंड तथा प्राचीन ईरान से संबद्ध चमकीले मृद्भांडों की खोज पूम्पुहार के फारस की खाड़ी और पश्चिम एशिया के साथ समुद्री संपर्कों का प्रमाण प्रस्तुत करती है।
- ये निष्कर्ष संकेत देते हैं कि प्राचीन तमिलकम व्यापक हिंद महासागर व्यापारिक तंत्र में एकीकृत था, जिसके माध्यम से इसका संपर्क पश्चिम एशिया, भूमध्यसागरीय क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया से था।
पूम्पुहार के बारे में
- पूम्पुहार एक महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक चोल बंदरगाह नगर था, जो कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित था, जहाँ यह बंगाल की खाड़ी में मिलती है।
- नगर को परंपरागत रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया था—समुद्र तट के निकट मरुवूरपक्कम, पश्चिम की ओर पट्टिनपक्कम तथा इन दोनों के बीच नालंगाडी।
- पुरातात्त्विक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि यह बस्ती कम-से-कम 5वीं–4वीं शताब्दी ईसा पूर्व से अस्तित्व में थी।
- संगम एवं उत्तर-संगम साहित्य में इसे एक प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है, जहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापारी आते थे।
- यह बंदरगाह तम्रलिप्ति और पालूर जैसे अन्य भारतीय समुद्री व्यापारिक केंद्रों से भी जुड़ा हुआ था।
अन्य प्रमुख राजवंशों का समुद्री व्यापार
- मौर्य साम्राज्य: मौर्य साम्राज्य ने व्यापक व्यापारिक तंत्र विकसित किए और पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों तटों के बंदरगाहों के साथ संपर्क बनाए रखा।
- अर्थशास्त्र में नवाध्यक्ष का उल्लेख मिलता है, जो जलमार्गों और नौवहन से संबंधित अधिकारी था।
- सातवाहन: सातवाहनों ने दक्कन और पश्चिमी तट के बीच व्यापार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कल्याण, सोपारा और भरुकच्छ (भरूच) जैसे बंदरगाहों के माध्यम से रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक गतिविधियाँ संचालित होती थीं।
- चेर: मालाबार तट पर स्थित मुज़िरिस क्षेत्र रोमन तथा पश्चिम एशियाई व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया था। एरिथ्रियन सागर का पेरिप्लस तथा संगम साहित्य चेर राज्य से संबंधित समुद्री वाणिज्य के प्रमाण प्रदान करते हैं।
- पांड्य: पांड्य राज्य ने कोरकई जैसे बंदरगाहों के माध्यम से हिंद महासागर के व्यापार में भागीदारी की। कोरकई विशेष रूप से मन्नार की खाड़ी में होने वाले मोती के व्यापार और मत्स्यन से संबंधित था।
- पश्चिमी क्षत्रप: पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों पर इनके नियंत्रण ने उन्हें अरब सागर के व्यापार में भागीदारी का अवसर प्रदान किया, विशेषकर गुजरात और पश्चिमी दक्कन के बंदरगाहों के माध्यम से।
- पल्लव: पूर्वी तट से पल्लवों ने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समुद्री तथा सांस्कृतिक संबंध बनाए रखे। ये संबंध विशेष रूप से वर्तमान कंबोडिया और मुख्यभूमि दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों से जुड़े थे।
प्राचीन भारत की समृद्धि के प्रेरक के रूप में समुद्री व्यापार
- आर्थिक विकास: विदेशी व्यापार से संपदा और सीमा-शुल्क राजस्व में वृद्धि हुई तथा भारतीय वस्तुओं के लिए बाजारों का विस्तार हुआ।
- नगरीकरण: पूम्पुहार, मुज़िरिस और भरूच जैसे बंदरगाह समृद्ध वाणिज्यिक केंद्रों के रूप में विकसित हुए।
- शिल्प उत्पादन: विदेशी मांग ने वस्त्रों, मसालों, मनकों, मृद्भांडों तथा धातु निर्मित वस्तुओं के विशिष्ट एवं बड़े पैमाने पर उत्पादन को प्रोत्साहित किया।
- राजस्व: शासकों को बंदरगाह कर, सीमा-शुल्क तथा व्यापार के नियमन के माध्यम से राजस्व प्राप्त होता था।
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान: व्यापार के माध्यम से हिंद महासागर क्षेत्र में धर्मों, कला, भाषाओं, विचारों तथा प्रौद्योगिकियों का प्रसार हुआ।
- तकनीकी प्रगति: समुद्री वाणिज्य ने जहाज निर्माण, नौवहन तथा मानसूनी पवनों के ज्ञान में सुधार को प्रोत्साहित किया।
अन्य प्राचीन भारतीय बंदरगाह
- मुज़िरिस: मालाबार तट पर स्थित मुज़िरिस अरब सागर के पार होने वाले व्यापार तथा रोमन साम्राज्य के साथ संपर्कों से संबंधित था।
- अरिकामेडु: पुदुच्चेरी के निकट स्थित अरिकामेडु से भारत-रोमन वाणिज्यिक संबंधों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- तम्रलिप्ति: वर्तमान पश्चिम बंगाल में स्थित तम्रलिप्ति एक महत्त्वपूर्ण पूर्वी समुद्री व्यापारिक केंद्र था।
- भरूच: गुजरात में स्थित भरूच ने पश्चिमी भारत को अरब सागर के व्यापारिक तंत्र से जोड़ा।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 25-09-2026