भारत में परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन 

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी/ ऊर्जा सुरक्षा

संदर्भ

  • भारत के विस्तारित परमाणु कार्यक्रम तथा परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से रेडियोधर्मी अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक वित्तीय और संस्थागत उत्तरदायित्वों पर पुनः ध्यान केंद्रित हुआ है।

परिचय

  • पारंपरिक एकल-उपयोग ईंधन चक्र में प्रयुक्त परमाणु ईंधन को अपशिष्ट माना जाता है और अंततः उसका स्थायी निपटान किया जाता है।
  • भारत बंद ईंधन चक्र का अनुसरण करता है, जिसके अंतर्गत प्रयुक्त ईंधन का पुनर्संसाधन करके यूरेनियम और प्लूटोनियम को पुनः उपयोग के लिए प्राप्त किया जाता है।
  • इसलिए भारत प्रयुक्त परमाणु ईंधन को केवल अपशिष्ट के रूप में नहीं, बल्कि पुनः उपयोग योग्य परमाणु पदार्थों की प्राप्ति के संभावित संसाधन के रूप में भी देखता है।
  • पुनर्संसाधन से भूगर्भीय निपटान की आवश्यकता वाले उच्च-स्तरीय अपशिष्ट की मात्रा में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है, लेकिन इससे रेडियोधर्मिता समाप्त नहीं होती।

परमाणु ईंधन का प्रबंधन

  • शीतलन एवं अंतरिम भंडारण: रिएक्टर से निकाला गया ताजा प्रयुक्त ईंधन अत्यधिक रेडियोधर्मी होता है और पर्याप्त ऊष्मा उत्पन्न करता है। इसलिए इसे शीतलन कुंडों तथा बाद में अन्य भंडारण प्रणालियों में रखा जाता है।
  • पुनर्संसाधन: प्रयुक्त ईंधन को रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से संसाधित करके पुनः उपयोग योग्य यूरेनियम और प्लूटोनियम प्राप्त किया जा सकता है।
  • अपशिष्ट स्थिरीकरण: जिन रेडियोधर्मी अवशेषों का पुनः उपयोग नहीं किया जा सकता, उन्हें दीर्घकालिक भंडारण के लिए काँचीकृत अपशिष्ट जैसे स्थिर रूपों में परिवर्तित किया जाता है।
  • अंतिम निपटान: लंबे समय तक रेडियोधर्मी रहने वाले उच्च-स्तरीय अपशिष्ट को अंततः पर्यावरण से पृथक करना आवश्यक होता है, जिसके लिए सामान्यतः गहरे भूगर्भीय भंडार की व्यवस्था की जाती है।

भूगर्भीय भंडार

  • गहरे भूगर्भीय भंडार का उद्देश्य उपयुक्त भूगर्भीय संरचनाओं तथा बहुस्तरीय अवरोध प्रणालियों का उपयोग करके लंबे समय तक रेडियोधर्मी अपशिष्ट को भूमिगत रूप से पृथक रखना है।
  • यह सुविधा अंतरिम भंडारण सुविधा से भिन्न होती है, क्योंकि इसका उद्देश्य अस्थायी भंडारण के बजाय दीर्घकालिक पृथक्करण होता है।
  • भारत भूगर्भीय निपटान की आवश्यकता का अध्ययन करता रहा है।

दीर्घकालिक अपशिष्ट प्रबंधन की आवश्यकता

  • पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व: रेडियोधर्मी अपशिष्ट अत्यंत लंबी अवधि तक खतरनाक बना रह सकता है। इसलिए इसका प्रबंधन सामान्य औद्योगिक अपशिष्ट के प्रबंधन से मूलतः भिन्न होता है।
  • वित्तीय अनिश्चितता: परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन और भूगर्भीय निपटान पर होने वाली लागत किसी रिएक्टर के संचालन शुरू होने के कई दशकों बाद भी उत्पन्न हो सकती है।
    • पर्याप्त और पृथक वित्तीय प्रावधान न होने पर इसका अंतिम भार सरकार और करदाताओं पर असमान रूप से पड़ सकता है।
  • संस्थागत निरंतरता: परमाणु संयंत्रों का संचालनकाल कई दशकों का होता है, जबकि रेडियोधर्मी अपशिष्ट का प्रबंधन इससे कहीं अधिक लंबे समय तक जारी रह सकता है।
    • इसलिए संस्थागत उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित रहना आवश्यक है, भले ही किसी संचालक का स्वामित्व बदल जाए, वह क्षेत्र से बाहर निकल जाए या संयंत्र बंद हो जाए।

चिंताएँ क्या हैं?

  • भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के कारण संपूर्ण परमाणु ईंधन चक्र में उत्तरदायित्वों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है।
  • जनस्वीकृति: स्वास्थ्य, पर्यावरणीय सुरक्षा और दीर्घकालिक भूमि उपयोग संबंधी चिंताओं के कारण लोग रेडियोधर्मी अपशिष्ट सुविधाओं की स्थापना का विरोध कर सकते हैं।
  • संस्थागत क्षमता: रेडियोधर्मी अपशिष्ट से जुड़े दीर्घकालिक समय-मान को देखते हुए निरंतर निगरानी, नियामकीय पर्यवेक्षण और सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने में सक्षम संस्थागत तंत्र की आवश्यकता है।
  • परमाणु ऊर्जा संयंत्र के संचालन बंद होने के कई दशकों बाद उत्पन्न होने वाली अपशिष्ट प्रबंधन और निपटान लागत को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधान आवश्यक हैं।

आगे की राह

  • समर्पित परमाणु अपशिष्ट कोष का गठन: परमाणु विद्युत उत्पादन से संबंधित शुल्क के माध्यम से एक पृथक अपशिष्ट प्रबंधन कोष बनाया जा सकता है।
    • परमाणु संयंत्र के संचालन की पूरी अवधि में इसमें धनराशि जमा की जा सकती है और इसका उपयोग भविष्य में भंडारण, परिवहन, संयंत्र-विसंक्रमण तथा निपटान संबंधी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए किया जा सकता है।
  • परमाणु विनियमों में प्रयुक्त ईंधन और रेडियोधर्मी अपशिष्ट के संबंध में निजी संचालकों की वित्तीय तथा संचालनात्मक जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाना चाहिए।
  • भूगर्भीय भंडार की प्रारंभिक योजना: भारत को तत्काल भूगर्भीय भंडार का निर्माण करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे समय रहते संभावित स्थलों की पहचान, भूगर्भीय मूल्यांकन और जन-परामर्श की व्यवस्थित प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: रेडियोधर्मी अपशिष्ट से संबंधित लागत को परमाणु ऊर्जा की आर्थिक लागत में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि इसका पूरा भार भविष्य के करदाताओं पर न पड़े।

भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम

  • स्थापना: भारत ने 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की।
    • 1956 में एशिया के प्रथम अनुसंधान रिएक्टर ‘अप्सरा’ को ट्रॉम्बे स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में चालू किया गया।
    • भारत ने 1969 में तारापुर में अपना प्रथम परमाणु विद्युत संयंत्र स्थापित किया और जापान के बाद एशिया का दूसरा ऐसा देश बना। यह चीन से काफी पहले की उपलब्धि थी।
  • भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने परमाणु ऊर्जा के विकास के लिए तीन-चरणीय कार्यक्रम की परिकल्पना की थी।
  • प्रथम चरण — दाबित भारी जल रिएक्टर: भारत के परमाणु कार्यक्रम का प्रारंभिक ध्यान दाबित भारी जल रिएक्टरों के समूह के विकास पर केंद्रित था।
    • इन रिएक्टरों में प्राकृतिक यूरेनियम (यू-238) का उपयोग किया जाता है, जिसमें विखंडनीय यूरेनियम-235 की मात्रा अत्यंत कम होती है।
    • भारी जल (ड्यूटेरियम ऑक्साइड) का उपयोग मंदक और शीतलक दोनों के रूप में किया जाता है।
    • इस चरण का प्रमुख उद्देश्य यूरेनियम ईंधन से उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम-239 का उत्पादन करना था।
    • प्लूटोनियम-239 एक विखंडनीय पदार्थ है, जिसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के रूप में किया जाता है।
  • द्वितीय चरण — तीव्र प्रजनक रिएक्टर: कार्यक्रम के दूसरे चरण में तीव्र प्रजनक रिएक्टरों की स्थापना की परिकल्पना की गई है।
    • तीव्र प्रजनक रिएक्टरों को इस प्रकार विकसित किया जाता है कि वे तीव्र न्यूट्रॉन प्रवाह का उपयोग करके जितनी मात्रा में विखंडनीय पदार्थ का उपभोग करते हैं, उससे अधिक मात्रा में विखंडनीय पदार्थ का उत्पादन कर सकें।
    • इस चरण में प्रथम चरण से प्राप्त प्लूटोनियम-239 का उपयोग यूरेनियम-238 के साथ ईंधन के रूप में किया जाता है, जिससे ऊर्जा, यूरेनियम-233 तथा अतिरिक्त प्लूटोनियम-239 का उत्पादन होता है।
    • यूरेनियम-233 भी एक विखंडनीय पदार्थ है, जिसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
  • तृतीय चरण — उन्नत भारी जल रिएक्टर: कार्यक्रम के अंतिम चरण में उन्नत भारी जल रिएक्टरों की स्थापना की परिकल्पना की गई है।
    • इन रिएक्टरों में प्लूटोनियम-239 को थोरियम-232 के साथ संयोजित करके ऊर्जा और यूरेनियम-233 का उत्पादन किया जाएगा।
    • भारत में थोरियम के पर्याप्त भंडार उपलब्ध हैं और इस चरण का उद्देश्य परमाणु ईंधन के रूप में इसकी क्षमता का उपयोग करना है।

स्रोत: IE

 

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