पाठ्यक्रम: GS3/आंतरिक सुरक्षा
संदर्भ
- केंद्र सरकार ने नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के निर्दिष्ट क्षेत्रों में सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम, 1958 को अगले छह महीनों के लिए बढ़ा दिया है।
सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम क्या है?
- सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम, 1958 सशस्त्र बलों को उन क्षेत्रों में कार्य करने का अधिकार देता है, जिन्हें “अशांत क्षेत्र” घोषित किया गया हो।
- यह कानून सुरक्षा बलों को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और उग्रवाद से निपटने के लिए विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है।
- प्रमुख प्रावधान:
- किसी राज्य का राज्यपाल, किसी संघ राज्य क्षेत्र का प्रशासक अथवा केंद्र सरकार किसी क्षेत्र को “अशांत क्षेत्र” घोषित कर सकती है।
- यह अधिनियम सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है, जिनमें बल का प्रयोग करना (निर्दिष्ट परिस्थितियों में मृत्यु कारित करने तक), बिना वारंट गिरफ्तारी करना, बिना वारंट तलाशी लेना तथा हथियारों के भंडार या उग्रवादियों के ठिकानों को नष्ट करना शामिल है।
- केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना सशस्त्र बलों के किसी कर्मी के विरुद्ध अधिनियम के अंतर्गत की गई कार्रवाई के संबंध में अभियोजन, वाद या अन्य कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।
- वर्तमान में यह अधिनियम मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और असम के कुछ हिस्सों के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर संघ राज्य क्षेत्र के कुछ क्षेत्रों में लागू है।
भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद क्यों रहा है?
- ऐतिहासिक कारक: पूर्वोत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक और भौगोलिक दोनों दृष्टियों से भारत के अन्य हिस्सों से विशिष्ट रहा है तथा अनेक जनजातीय समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से एक निश्चित स्तर की स्वायत्तता बनाए रखी है।
- इस क्षेत्र के भारतीय राज्य के साथ एकीकरण ने स्थानीय आकांक्षाओं को संबोधित करने से संबंधित कई चुनौतियाँ उत्पन्न कीं।
- आर्थिक हाशियाकरण: पूर्वोत्तर के कुछ उग्रवादी समूहों ने आर्थिक हाशियाकरण को अपनी प्रमुख शिकायतों में शामिल किया है।
- सीमाएँ और संपर्क: यह क्षेत्र म्यांमार, भूटान, बांग्लादेश और चीन जैसे देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ साझा करता है। इससे सीमा-पार आवागमन, तस्करी तथा पड़ोसी देशों से संचालित होने वाले उग्रवादी समूहों की उपस्थिति जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं।
- राजनीतिक अलगाव: राजनीतिक रूप से हाशिए पर होने तथा निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने की भावना ने असंतोष को बढ़ावा दिया है।
- प्रवास और जनसांख्यिकीय परिवर्तन: अन्य क्षेत्रों से लोगों के आगमन सहित प्रवास की प्रवृत्तियों ने जनसांख्यिकीय बदलावों को जन्म दिया है तथा भूमि, संसाधनों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर तनाव उत्पन्न किया है।
- सरकारी प्रतिक्रियाएँ: उग्रवाद-रोधी अभियानों के कारण कई बार मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं और स्थानीय आबादी में असंतोष बढ़ा है।
सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम के पक्ष में तर्क
- संचालनात्मक लचीलापन: यह अधिनियम “अशांत” घोषित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है, जिससे वे सशस्त्र उग्रवाद और गंभीर सुरक्षा खतरों पर शीघ्र प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
- कर्मियों की सुरक्षा: यह कानून कठिन उग्रवाद-रोधी परिस्थितियों में कार्यरत सुरक्षा कर्मियों के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है।
- स्थिति को खराब होने से रोकना: बिना वारंट गिरफ्तारी और तलाशी जैसी शक्तियाँ सुरक्षा बलों को संदिग्ध उग्रवादियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई करने तथा स्थिति को और बिगड़ने से रोकने में सक्षम बनाती हैं।
- कठिन संचालनात्मक परिस्थितियाँ: संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य पुलिस व्यवस्था की अपनी सीमाएँ हो सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में यह अधिनियम सशस्त्र बलों को नागरिक प्रशासन की सहायता करने में सक्षम बनाता है।
- अस्थायी सुरक्षा उपाय: यह अधिनियम किसी क्षेत्र को “अशांत” घोषित किए जाने से जुड़ा है। इसलिए सुरक्षा स्थिति में सुधार होने पर इसकी निरंतरता की पुनः समीक्षा की जा सकती है।
विरोध में तर्क
- मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ: आलोचकों का तर्क है कि अधिनियम के व्यापक संचालनात्मक अधिकार बल के अत्यधिक या असंगत प्रयोग तथा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
- सीमित जवाबदेही: धारा 7 के अनुसार अधिनियम के अंतर्गत की गई कार्रवाई के संबंध में सुरक्षा कर्मियों के अभियोजन के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। आलोचकों का तर्क है कि इससे कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है।
- स्थानीय जनसंख्या का अलगाव: लंबे समय तक सुरक्षा बलों की तैनाती स्थानीय समुदायों और सुरक्षा बलों के बीच अविश्वास उत्पन्न कर सकती है, जिससे उग्रवाद-रोधी प्रयास प्रभावित हो सकते हैं।
- दुरुपयोग की संभावना: तलाशी, गिरफ्तारी और बल प्रयोग की व्यापक शक्तियों का दुरुपयोग हो सकता है, यदि पर्याप्त संचालनात्मक निगरानी और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित न किए जाएँ।
- संघवाद पर प्रभाव: संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत विधि-व्यवस्था मुख्यतः राज्य का विषय है। इसलिए सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम का निरंतर प्रयोग कई बार संघ और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलन को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम पर प्रमुख समितियों की सिफारिशें
- न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी समिति (2005): समिति ने सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम को निरस्त करने तथा इसके आवश्यक प्रावधानों को विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 में शामिल करने की सिफारिश की। इसके साथ ही शिकायत निवारण और जवाबदेही की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने का सुझाव दिया गया।
- संतोष हेगड़े आयोग (2013): आयोग ने सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम के प्रावधानों के दुरुपयोग को रेखांकित किया तथा अधिक जवाबदेही और अधिनियम की समय-समय पर समीक्षा की सिफारिश की।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007): आयोग ने सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम को निरस्त करने की सिफारिश की और तर्क दिया कि यह प्रभावित क्षेत्रों में भेदभाव तथा अलगाव का प्रतीक बन गया है।
स्रोत: AIR
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