भारत के महान्यायवादी
पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- एक उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना की आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए भारत के महान्यायवादी से वैधानिक सहमति मांगी।
- जब कोई निजी व्यक्ति या तीसरा पक्ष न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में आपराधिक अवमानना याचिका दायर करता है, तो भारत के महान्यायवादी की पूर्व सहमति अनिवार्य होती है।
भारत के महान्यायवादी
- संविधान का अनुच्छेद 76 भारत के महान्यायवादी के पद का प्रावधान करता है।
- राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त करते हैं, जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए योग्य हो।
- भारत के महान्यायवादी संघ सरकार के सर्वोच्च विधि अधिकारी तथा उसके प्रमुख विधिक सलाहकार होते हैं।
- योग्यताएँ: किसी व्यक्ति का भारत का नागरिक होना आवश्यक है तथा वह कम-से-कम 5 वर्ष तक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो, या कम-से-कम 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो, अथवा राष्ट्रपति की दृष्टि में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हो।
- कार्य एवं कर्तव्य: भारत सरकार को उन मामलों पर विधिक परामर्श देना, जो उन्हें संदर्भित किए जाएँ।
- राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए अन्य विधिक कर्तव्यों का निर्वहन करना।
- उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के समक्ष संघ सरकार का प्रतिनिधित्व करना।
- भारत के सभी न्यायालयों में उपस्थित होने का अधिकार रखना।
- संवैधानिक तथा अन्य विधिक मामलों में सरकार को परामर्श देना।
- अधिकार एवं विशेषाधिकार:
- संसद के दोनों सदनों, उनकी संयुक्त बैठकों तथा उन संसदीय समितियों की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, जिनका उन्हें सदस्य नामित किया गया हो।
- संसद में मतदान करने का अधिकार नहीं है।
- संसद सदस्य को प्राप्त विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का लाभ प्राप्त होता है।
- कार्यकाल एवं पदच्युति:
- संविधान में निश्चित कार्यकाल का प्रावधान नहीं है।
- महान्यायवादी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं।
- संविधान में पद से हटाने की कोई विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई है।
स्रोत:TH
समुद्र में क्वाड जहाज पर्यवेक्षक मिशन
पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
समाचार में
- भारतीय तटरक्षक बल का जहाज ‘शौनक’ क्वाड के समुद्र में जहाज पर्यवेक्षक मिशन के अंतर्गत चेन्नई से ऑस्ट्रेलिया के पर्थ के लिए रवाना हुआ।
समुद्र में क्वाड जहाज पर्यवेक्षक मिशन
- क्वाड देशों ने प्रथम ‘समुद्र में क्वाड जहाज पर्यवेक्षक मिशन’ शुरू किया है।
- इसका उद्देश्य भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच समुद्री अंतर-संचालनीयता तथा पेशेवर अनुभवों के आदान-प्रदान को बढ़ाना है।
- ‘समुद्री पर्यवेक्षक’ के रूप में नामित छह अधिकारियों ने इस मिशन के लिए ‘शौनक’ पर सवार होकर यात्रा शुरू की है।
- यह पहल क्वाड विदेश मंत्रियों के संयुक्त वक्तव्य के अनुरूप है, जिसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र, खुले, समावेशी और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था के प्रति समूह की प्रतिबद्धता दोहराई गई थी।
महत्त्व
- यह भारत के ‘महासागर’ अर्थात् विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास की पारस्परिक एवं समग्र उन्नति के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है। साथ ही, यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री वातावरण में योगदान देने के लिए भारतीय तटरक्षक बल द्वारा साझेदार समुद्री बलों के साथ सामूहिक सहभागिता और सहयोग पर दिए जा रहे बल को दर्शाता है।
क्वाड के बारे में जानें
- उद्भव: क्वाड की शुरुआत 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी के बाद मानवीय सहयोग से हुई। जापान ने 2007 में इस रूपरेखा का प्रस्ताव रखा, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के 2008 में निकलने के बाद यह निष्क्रिय हो गई। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सामरिक चिंताओं के बीच 2017 में इसे पुनर्जीवित किया गया।
- केंद्रबिंदु: क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा, आधारभूत संरचना और आपूर्ति शृंखला की सुदृढ़ता। यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं है।
- दृष्टिकोण: 2021 के क्वाड शिखर सम्मेलन में “क्वाड की भावना” को अपनाया गया, जिसके अंतर्गत लोकतांत्रिक मूल्यों, विधि के शासन और दबाव से मुक्ति पर आधारित स्वतंत्र, खुले एवं समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र का समर्थन किया गया।
- प्रमुख पहल:
- समुद्र में क्वाड जहाज पर्यवेक्षक मिशन: 2024 की विलमिंगटन घोषणा के अंतर्गत शुरू किया गया यह मिशन समुद्री क्षेत्र की जागरूकता, अंतर-संचालनीयता और संचालनात्मक समन्वय को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से है।
- मालाबार अभ्यास: चारों क्वाड देशों की भागीदारी वाला बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास, जिसका उद्देश्य समुद्री समन्वय, अंतर-संचालनीयता और तैयारी में सुधार करना है।
- क्वाड प्लस: दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और वियतनाम जैसे देशों के साथ भी सहयोग किया गया है, जो व्यापक सहयोग की संभावनाओं को दर्शाता है।
स्रोत: TH
द्विपक्षीय निवेश संधि
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- वित्त मंत्रालय ने भारत की 2016 की आदर्श द्विपक्षीय निवेश संधि की समीक्षा पूरी कर ली है और संशोधित रूपरेखा को मंत्रिमंडल सचिवालय की स्वीकृति के लिए भेज दिया है।
द्विपक्षीय निवेश संधि
- यह मूलतः दो देशों के बीच किया गया ऐसा समझौता है, जिसका उद्देश्य एक देश के निवेशकों द्वारा दूसरे देश में किए गए निवेश की सुरक्षा करना है।
- यह विदेशी निवेशकों को सरकार की प्रतिकूल कार्रवाई से बचाव के लिए कुछ विधिक सुरक्षा प्रदान करती है तथा निर्दिष्ट परिस्थितियों में, यदि किसी विवाद का समाधान घरेलू विधिक उपायों के माध्यम से नहीं हो पाता है, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का सहारा लेने की अनुमति देती है।
- वर्तमान रूपरेखा (2016 की आदर्श संधि) के अंतर्गत किसी विदेशी निवेशक को भारत के विरुद्ध संधि-आधारित मध्यस्थता शुरू करने से पहले पाँच वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
2016 की आदर्श संधि में संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- मध्यस्थता से पहले अत्यधिक मुकदमेबाजी: उदाहरण के लिए, कर विवाद का सामना करने वाली किसी विदेशी कंपनी को पहले कई वर्षों तक भारतीय न्यायालयों में प्रक्रिया पूरी करनी पड़ सकती है, जिसे अधिकांश वैश्विक निवेशक अव्यावहारिक और जोखिमपूर्ण मानते हैं।
- ‘निवेश’ की संकीर्ण परिभाषा: 2016 की आदर्श संधि में निवेश की परिभाषा सीमित रखी गई है। इसमें मुख्यतः वास्तविक परिसंपत्तियों और जोखिम वाले उद्यम शामिल हैं तथा अंश-पत्र निवेश या ऋण जैसी व्यवस्थाएँ बाहर रह जाती हैं। इसका अर्थ है कि विदेशी पूँजी के अनेक रूपों को संधि के अंतर्गत सुरक्षा प्राप्त नहीं होती।
- कमजोर सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र उपबंध: आदर्श संधि निवेशकों को किसी अन्य देश के साथ की गई संधि के अंतर्गत भारत द्वारा दिए गए बेहतर व्यवहार का दावा करने से प्रतिबंधित करती है। इससे अन्य देशों की द्विपक्षीय निवेश संधियों की तुलना में भारत की निवेश व्यवस्था कम अनुकूल दिखाई दे सकती है।
स्रोत: IE
नियंत्रित प्रवेश वाले उच्च गति वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के लिए दिशानिर्देश
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने द्रुतमार्गों से अलग, नियंत्रित प्रवेश वाले उच्च गति वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की योजना और निर्माण के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए हैं।
दिशानिर्देशों के बारे में
- इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य विस्तृत परियोजना प्रतिवेदनों की तैयारी में एकरूपता लाना, तकनीकी मानकों में समानता सुनिश्चित करना, सड़क सुरक्षा को सुदृढ़ करना तथा पूरे राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क की संचालनात्मक दक्षता में सुधार करना है।
- ये सभी आगामी चार और छह लेन वाले नए तथा वर्तमान मार्गों के उन्नयन से संबंधित नियंत्रित प्रवेश वाले उच्च गति वाले राष्ट्रीय राजमार्गों पर लागू होंगे।
- यह पहल विकसित भारत 2047 के अंतर्गत विश्वस्तरीय राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क विकसित करने की सरकार की दीर्घकालिक दृष्टि का हिस्सा है।

- द्रुतमार्गों, राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य राजमार्गों तथा पर्याप्त यातायात वाले महत्त्वपूर्ण मुख्य मार्गों के चौराहों पर रैंप सहित मार्ग-संधियाँ बनाई जाएँगी।
- ऐसी मार्ग-संधियाँ बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बहुविध परिवहन रसद पार्कों, औद्योगिक क्षेत्रों और प्रमुख पर्यटन स्थलों जैसे अधिक यातायात उत्पन्न करने वाले प्रमुख स्थानों से संपर्क सुनिश्चित करने के लिए भी बनाई जाएँगी।
- दिशानिर्देशों में गलियारे के बाहरी किनारे पर एक मीटर ऊँची सीमा दीवार के निर्माण का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य प्रवेश नियंत्रण को मजबूत करना तथा अतिक्रमण, अनधिकृत प्रवेश और उच्च गति वाले मार्गों पर आवारा पशुओं की आवाजाही को रोकना है।
महत्त्व
- ये व्यापक दिशानिर्देश पूर्णतः नियंत्रित प्रवेश वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की योजना और निर्माण को मानकीकृत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं।
- नए दिशानिर्देश ऐसे मार्गों के लिए तकनीकी और सड़क सुरक्षा संबंधी प्रावधानों का एक समान ढाँचा प्रदान करते हैं।
स्रोत :DD
जीआई-प्रमाणित गुलबर्गा तूर दाल
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ने कर्नाटक से मालदीव के लिए जीआई-प्रमाणित गुलबर्गा तूर दाल की एक मीट्रिक टन खेप को रवाना करने की सुविधा प्रदान की।
परिचय
- गुलबर्गा तूर दाल, जिसे कलबुर्गी तोगरी बेले के नाम से भी जाना जाता है, अरहर या तूर दाल के नाम से प्रसिद्ध अरहर की एक किस्म है, जिसकी खेती कर्नाटक के कलबुर्गी क्षेत्र में की जाती है।
- कर्नाटक भारत में तूर दाल का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है और राष्ट्रीय उत्पादन में इसका योगदान 40 प्रतिशत से अधिक है। राज्य की कुल उपज में कलबुर्गी जिले का योगदान अकेले ही बहुत अधिक है।
- गुलबर्गा तूर दाल को 2019 में भौगोलिक संकेतक पंजीकरण प्राप्त हुआ था और यह अपने विशिष्ट स्वाद एवं गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है।
तूर दाल की खेती
- तूर दाल उष्णकटिबंधीय और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में अच्छी तरह उगती है। इसके लिए लगभग 600–650 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा तथा वर्षा ऋतु में 26°C–30°C तापमान उपयुक्त होता है।
- यह काली कपास मृदा में अच्छी तरह उगती है, क्योंकि ऐसी मृदा आर्द्रता को बनाए रखती है, जिससे अल्पवर्षा की अवधि में फसल को लाभ मिलता है। यह दोमट तथा अच्छी जल-निकासी वाली जलोढ़ मृदा में भी अच्छी तरह उग सकती है।
स्रोत: AIR
केरल का संशोधित पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र प्रस्ताव
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- केरल ने केंद्र सरकार से पश्चिमी घाट क्षेत्र में प्रस्तावित पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र को 9,993.7 वर्ग किलोमीटर से घटाकर 8,590.69 वर्ग किलोमीटर करने का आग्रह किया है। इसमें केवल वन क्षेत्रों को शामिल करने तथा जनसंख्या वाले क्षेत्रों, कृषि भूमि और बागानों को बाहर रखने का प्रस्ताव है।
पृष्ठभूमि
- 2013 की कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट में केरल के 123 गाँवों को सम्मिलित करते हुए 13,108 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव दिया गया था।
- जीविका पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर विरोध और चिंताओं के बाद ओमन वी. ओमन समिति ने क्षेत्र को घटाकर 9,993.7 वर्ग किलोमीटर करने की सिफारिश की।
- इसमें 9,107 वर्ग किलोमीटर वन भूमि तथा 886.7 वर्ग किलोमीटर गैर-वन क्षेत्र शामिल था।
- अब केरल 886.7 वर्ग किलोमीटर गैर-वन क्षेत्र को बाहर रखने की मांग कर रहा है, जिससे प्रस्तावित पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र 8,590.69 वर्ग किलोमीटर और 98 गाँवों तक सीमित हो जाएगा।
- यह मुद्दा सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पश्चिमी घाट के संरक्षण तथा आजीविका एवं विकास संबंधी चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की व्यापक चुनौती को दर्शाता है।
पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों जैसे संरक्षित क्षेत्रों के आसपास स्थित क्षेत्र होते हैं। ये बफर क्षेत्र के रूप में कार्य करते हैं और जैव विविधता पर मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को कम करने में सहायता करते हैं।
- इनका विनियमन पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत किया जाता है तथा इन्हें पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना (2002–2016) में रेखांकित किया गया था।
- गाडगिल समिति और कस्तूरीरंगन समिति ने विशेष रूप से पश्चिमी घाट में पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्रों की पहचान करके उनके संरक्षण को सुदृढ़ करने की सिफारिश की थी।
पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में गतिविधियाँ
- प्रतिबंधित: वाणिज्यिक खनन, प्रदूषणकारी उद्योग, बड़े जलविद्युत परियोजनाएँ, आरा मिलें तथा लकड़ी का वाणिज्यिक उपयोग।
- विनियमित: वृक्षों की कटाई, होटल एवं रिसॉर्ट का निर्माण, जल का वाणिज्यिक उपयोग, विद्युत केबल बिछाना तथा कृषि पद्धतियों में परिवर्तन।
- अनुमत: जैविक खेती, वर्षा जल संचयन, नवीकरणीय ऊर्जा तथा वर्तमान कृषि पद्धतियाँ।
कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट
- पश्चिमी घाट के संरक्षण के संबंध में गाडगिल समिति की सिफारिशों की समीक्षा के लिए डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय कार्यदल का गठन 2012 में किया गया था।
- समिति ने पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत क्षेत्र को, जो लगभग 59,940 वर्ग किलोमीटर है, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में घोषित करने की सिफारिश की। समिति का अधिक ध्यान विकास और आर्थिक गतिविधियों के बीच संतुलन पर था।
- इसने चिह्नित संवेदनशील क्षेत्रों में विकास को विनियमित करने तथा अन्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन बनाए रखने पर बल दिया।
- समिति ने सतत आजीविका के महत्त्व को स्वीकार किया, लेकिन वन अधिकारों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया।
- इसने वर्तमान पर्यावरणीय स्वीकृति व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा अत्याधुनिक निगरानी संस्था स्थापित करने का सुझाव दिया।
स्रोत: IE
कॉफी बोर्ड द्वारा कॉफी के लिए सततता प्रमाणन की दिशा में पहल
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारतीय कॉफी बोर्ड ने सततता मानक विकसित किए हैं और भारतीय कॉफी के लिए प्रमाणन प्रक्रिया लागू करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
परिचय
- भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक और पाँचवाँ सबसे बड़ा कॉफी निर्यातक है। भारत ने 2025–26 में 2 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की कॉफी का निर्यात किया, जिसमें लगभग 39 प्रतिशत मूल्यवर्धित उत्पादों का हिस्सा था।
- भारतीय कॉफी की विशिष्ट विशेषता इसकी पारंपरिक छायादार खेती है। बोर्ड नए सततता मानकों के माध्यम से इस विशेषता का लाभ उठाने का प्रयास कर रहा है।
- प्रमाणन तीन स्तरों पर किया जाएगा। प्रथम स्तर पर उत्पादकों द्वारा किए गए स्व-प्रमाणन के आधार पर बोर्ड प्रमाणन करेगा। दूसरे स्तर पर स्वतंत्र तृतीय-पक्ष द्वारा सत्यापन किया जाएगा, जबकि तीसरे स्तर पर भारतीय मानकों की तुलना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सततता रूपरेखाओं से की जाएगी।
कॉफी उत्पादन
- ब्राजील विश्व का सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक है और वैश्विक उत्पादन में उसका योगदान लगभग 40 प्रतिशत है। इसके बाद वियतनाम का स्थान है।
- भारत में मुख्यतः कॉफी की दो प्रमुख किस्मों—अरबिका और रोबस्टा—का उत्पादन होता है।
- भारत में कॉफी उत्पादन में कर्नाटक अग्रणी है, जिसके बाद केरल और तमिलनाडु का स्थान है।
जलवायु संबंधी परिस्थितियाँ
- कॉफी के पौधों के लिए उष्ण और आर्द्र जलवायु आवश्यक होती है। इसके लिए 15°C से 28°C के बीच तापमान तथा 150–250 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा उपयुक्त होती है।
भारतीय कॉफी बोर्ड
- यह कॉफी अधिनियम, 1942 की धारा 4 के अंतर्गत गठित एक वैधानिक संगठन है और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है।
- बोर्ड में अध्यक्ष तथा सचिव एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सहित 33 सदस्य होते हैं।
- बोर्ड मुख्य रूप से अनुसंधान, विस्तार सेवाओं, विकास, बाजार संबंधी जानकारी, घरेलू एवं विदेशी प्रचार तथा कल्याणकारी उपायों पर ध्यान केंद्रित करता है।
स्रोत:TH
बायोई3 के अंतर्गत जैव-आधारित जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक
पाठ्यक्रम: GS3/जैव-प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- केंद्र सरकार ने बायोई3 रूपरेखा के अंतर्गत बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड द्वारा विकसित पॉलीलैक्टिक अम्ल आधारित जैव-आधारित जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक के वाणिज्यिक उपयोग की औपचारिक शुरुआत की है।
पॉलीलैक्टिक अम्ल क्या है?
- पॉलीलैक्टिक अम्ल एक जैव-आधारित बहुलक है, जिसे चीनी से प्राप्त पदार्थों जैसे नवीकरणीय जैविक कच्चे माल से तैयार किया जाता है।
- इस प्रक्रिया में शर्करा का किण्वन करके लैक्टिक अम्ल तैयार किया जाता है, जिसे आगे पॉलीलैक्टिक अम्ल में परिवर्तित किया जाता है।
- पॉलीलैक्टिक अम्ल का उपयोग उसकी गुणवत्ता और संरचना के आधार पर पैकेजिंग सामग्री, फिल्मों, कंटेनरों तथा अन्य प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है।
बायोई3 रूपरेखा
- बायोई3 का अर्थ है—अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव-प्रौद्योगिकी।
- इसका उद्देश्य उच्च प्रदर्शन वाले जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देना तथा जैव-प्रौद्योगिकी को प्रयोगशाला अनुसंधान से व्यावसायिक रूप से उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करना है।
- इस रूपरेखा के प्रमुख क्षेत्र हैं:
- जैव-आधारित रसायन और एंजाइम
- कार्यात्मक खाद्य पदार्थ और स्मार्ट प्रोटीन
- सटीक जैव-चिकित्सीय उपचार
- जलवायु-अनुकूल कृषि
- कार्बन का अवशोषण और उसका उपयोग
- भविष्य की समुद्री एवं अंतरिक्ष अनुसंधान गतिविधियाँ
स्रोत: PIB
कूल लीडर्स अवार्ड
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- सितंबर 2026 में सिंगापुर में आयोजित वैश्विक कूल संकल्प सभा के दौरान प्रथम कूल लीडर्स अवार्ड शुरू किया गया।
परिचय
- ‘कूल लीडर्स’ पुरस्कार संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कूल गठबंधन द्वारा शुरू की गई एक वैश्विक मान्यता पहल है।
- यह सतत कूलिंग को बढ़ावा देने तथा लोगों को अत्यधिक गर्मी से बचाने में उत्कृष्ट नेतृत्व को मान्यता देता है। प्रथम कूल लीडर्स अवार्ड निम्नलिखित को प्रदान किए गए:
- सिंगापुर: निष्क्रिय कूलिंग और गर्मी के प्रति लचीलापन बढ़ाने में नेतृत्व के लिए।
- संयुक्त अरब अमीरात: जिला कूलिंग तथा वैश्विक जलवायु एवं विकास नीतियों में कूलिंग को आगे बढ़ाने में नेतृत्व के लिए।
- डोंग मिंगझू: ग्रि इलेक्ट्रिक एप्लायंसेज की अध्यक्ष, जिन्होंने शून्य-कार्बन स्रोत वातानुकूलन प्रणाली सहित अत्यधिक दक्ष और कम-कार्बन कूलिंग प्रौद्योगिकियों के विकास में नेतृत्व किया।
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का कूल गठबंधन सतत कूलिंग के लिए व्यवस्था-स्तरीय परिवर्तन को आगे बढ़ाने वाला एक वैश्विक मंच है।
- इसे 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव के जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन की प्रमुख पहल के रूप में शुरू किया गया था।
- यह 250 से अधिक संस्थाओं और हितधारकों को एक साथ लाता है, ताकि पेरिस समझौते, किगाली संशोधन और 2030 एजेंडा के अनुरूप दक्ष एवं पर्यावरण-अनुकूल कूलिंग समाधान उपलब्ध कराए जा सकें।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के बारे में
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम पर्यावरण के क्षेत्र में अग्रणी वैश्विक संस्था है, जिसकी स्थापना 1972 में हुई थी।
- यह पर्यावरण संरक्षण के लिए नेतृत्व प्रदान करता है और साझेदारी को प्रोत्साहित करता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रों और लोगों को वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के जीवन स्तर से समझौता किए बिना जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए प्रेरित, सूचित और सक्षम बनाना है।
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा की मेजबानी करता है, जो पर्यावरण के संबंध में विश्व का सर्वोच्च स्तर का निर्णय-निर्माण निकाय है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों की सार्वभौमिक सदस्यता है।
वैश्विक कूलिंग संकल्प के बारे में
- इसे 2023 में कॉप-28 के दौरान शुरू किया गया था और यह कूलिंग के जलवायु प्रभाव को कम करने तथा सतत कूलिंग तक पहुँच का विस्तार करने के लिए विश्व की प्रथम सामूहिक वैश्विक प्रतिबद्धता है।
- इसके प्रमुख लक्ष्य हैं:
- 2050 तक कूलिंग से संबंधित उत्सर्जन को 2022 के स्तर की तुलना में कम-से-कम 68 प्रतिशत तक घटाना;
- 2030 तक सतत कूलिंग तक पहुँच में उल्लेखनीय वृद्धि करना; तथा
- 2030 तक वैश्विक स्तर पर बेचे जाने वाले नए वातानुकूलन उपकरणों की औसत दक्षता को 2022 में स्थापित वैश्विक आधार स्तर की तुलना में सामूहिक रूप से 50 प्रतिशत बढ़ाना।
स्रोत: UNEP
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