पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने यह जानकारी साझा की है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कॉलेजियम की बैठक में प्रस्तावित न्यायिक नियुक्तियों पर चर्चा होने से पूर्व ही केंद्र सरकार के साथ उन पर विचार-विमर्श किया हो सकता है। इस खुलासे ने कॉलेजियम प्रणाली के विकास एवं कार्यप्रणाली को लेकर एक नई परिचर्चा कर दी है।
कॉलेजियम प्रणाली क्या है?
- संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, 1980 के दशक तक न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ सरकार द्वारा न्यायपालिका से परामर्श करने के बाद की जाती थीं।
- कॉलेजियम प्रणाली वह व्यवस्था है, जिसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण का निर्णय स्वयं न्यायपालिका द्वारा लिया जाता है। इस व्यवस्था का संविधान या किसी विशिष्ट वैधानिक प्रावधान में स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
- इस प्रणाली का विकास सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की एक शृंखला के माध्यम से हुआ, जिन्हें तीन न्यायाधीश प्रकरण (Three Judges Cases) के नाम से जाना जाता है। इन निर्णयों ने न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता स्थापित की।
- सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) तथा सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- उच्च न्यायालय के स्तर पर कॉलेजियम में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उस उच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
न्यायिक नियुक्तियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 124: इसके अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से परामर्श करने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है।
- अनुच्छेद 217: इसके अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात की जाती है।
- अनुच्छेद 222: इसके अंतर्गत राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के पश्चात किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण करने की शक्ति प्रदान की गई है।
- अनुच्छेद 50: राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत यह राज्य को लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का निर्देश देता है, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ किया जा सके।
कॉलेजियम प्रणाली का विकास
- प्रथम न्यायाधीश प्रकरण (1981): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की प्रधानता होगी तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय बाध्यकारी नहीं होगी।
- द्वितीय न्यायाधीश प्रकरण (1993): सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती दृष्टिकोण को बदलते हुए निर्णय दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ सामूहिक रूप से व्यक्त की गई राय को न्यायिक नियुक्तियों में प्राथमिकता प्राप्त होगी। इसी निर्णय के माध्यम से कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना हुई।
- तृतीय न्यायाधीश प्रकरण (1998): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होंगे। इस निर्णय ने वर्तमान कॉलेजियम व्यवस्था को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया।
प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) क्या है?
- प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित नियमों और प्रक्रियाओं का संकलन है। यह सरकार एवं न्यायपालिका द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया दस्तावेज है।
- उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रस्ताव कॉलेजियम द्वारा प्रारंभ किया जाता है तथा अपनी अनुशंसा केंद्र सरकार को भेजी जाती है।
- केंद्र सरकार प्रस्तावित नामों के संबंध में किसी प्रकार की आपत्ति अथवा असहमति होने पर अनुशंसा को पुनर्विचार के लिए कॉलेजियम के पास वापस भेज सकती है।
- हालाँकि, यदि कॉलेजियम अपनी अनुशंसा को दोहराता है, तो परंपरागत प्रक्रिया के अनुसार नियुक्ति की जानी चाहिए।
- वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को असंवैधानिक घोषित किए जाने के पश्चात न्यायालय ने न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं दक्षता बढ़ाने के लिए MoP में संशोधन करने का निर्देश दिया था।
- हालाँकि, कई दौर के विचार-विमर्श एवं परामर्श के बावजूद संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की आवश्यकता
- जवाबदेही में वृद्धि: नियुक्तियों के आधार एवं कारणों का सार्वजनिक प्रकटीकरण न्यायिक नियुक्तियों की समीक्षा और निगरानी को संभव बनाता है।
- जनविश्वास में वृद्धि: पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति आम जनता के विश्वास को सुदृढ़ करती है।
- योग्यता-आधारित चयन को बढ़ावा: इससे यह सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है कि नियुक्तियाँ अभ्यर्थियों की योग्यता, सत्यनिष्ठा एवं संवैधानिक मूल्यों के आधार पर की गई हैं।
- मनमाने निर्णयों की रोकथाम: निर्णयों के पीछे के तर्कों को दर्ज करने से व्यक्तिपरक एवं अपारदर्शी निर्णय लेने की संभावनाओं को कम किया जा सकता है।
कॉलेजियम प्रणाली से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ
- स्पष्ट वैधानिक ढाँचे का अभाव।
- पात्रता एवं मूल्यांकन के लिए संहिताबद्ध मानदंडों का अभाव।
- विचार-विमर्श एवं निर्णय प्रक्रिया के संबंध में सीमित सार्वजनिक जानकारी।
- स्वतंत्र समीक्षा के लिए किसी औपचारिक तंत्र का अभाव।
- न्यायिक नियुक्तियों में विलंब, जिसके परिणामस्वरूप न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद रिक्त रहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित व्यवस्थाएँ
- न्यायिक नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम प्रणाली भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विकसित एक विशिष्ट व्यवस्था है, जिसका विश्व के किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में समानांतर उदाहरण नहीं मिलता।
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): संघीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है तथा सीनेट द्वारा उनकी नियुक्ति की पुष्टि की जाती है।
- यूनाइटेड किंगडम (UK): यहाँ एक स्वतंत्र न्यायिक नियुक्ति आयोग कार्यरत है, जिसमें न्यायपालिका, विधि व्यवसाय एवं आम जनता से नियुक्त 15 आयुक्त शामिल होते हैं।
- दक्षिण अफ्रीका: यहाँ न्यायिक सेवा आयोग कार्यरत है। इसमें कुल 23 सदस्य होते हैं, जिनमें मुख्य न्यायाधीश तथा न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका, विधि व्यवसाय एवं शैक्षणिक जगत के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
आगे की राह
- न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, वस्तुनिष्ठता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) को शीघ्र अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।
- कॉलेजियम की अनुशंसाओं के साथ उनके चयन के संक्षिप्त औचित्य एवं कारणों का उल्लेख किया जाना चाहिए, साथ ही वैध रूप से गोपनीय रखी जाने वाली सूचनाओं की गोपनीयता भी सुरक्षित रखी जानी चाहिए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 29-10-2026
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