अंतरराज्यीय परिषद का पुनर्सक्रियण: संघवाद को वास्तविक अर्थों में सहकारी बनाने की दिशा में

पाठ्यक्रम: GS2/शासन

संदर्भ

  • संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को लेकर जारी परिचर्चा ने केंद्र-राज्य परामर्श से संबंधित चिंताओं को पुनः उभारा है। इसने सहकारी संघवाद के लिए एक संस्थागत मंच के रूप में अंतरराज्यीय परिषद को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।

अंतरराज्यीय परिषद (ISC) के बारे में

  • यह एक संवैधानिक तंत्र है, जिसका उद्देश्य संवाद, परामर्श और समन्वय के माध्यम से केंद्र-राज्य तथा अंतरराज्यीय संबंधों को सुदृढ़ करना है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को अंतरराज्यीय परिषद की स्थापना का प्रावधान करता है।
    • यह संघ के राज्यों के बीच समन्वय के लिए एक स्थायी संवैधानिक निकाय नहीं है।
    • यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि ऐसी परिषद की स्थापना से लोकहित की पूर्ति होगी, तो इसकी स्थापना ‘किसी भी समय’ की जा सकती है।
  • सरकारिया आयोग (1983–88) की सिफारिशों के अनुसरण में मई 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा इसकी स्थापना की गई थी।
  • प्रकृति: यह एक परामर्शदात्री एवं अनुशंसात्मक निकाय है, न कि कोई न्यायिक या विधायी संस्था।
  • अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री।
  • सदस्य: सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, विधानमंडल वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासक तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के छह मंत्री।
  • सचिवालय: अंतरराज्यीय परिषद सचिवालय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

अनुच्छेद 263 के अंतर्गत कार्य

  • राष्ट्रपति निम्नलिखित कार्यों के निर्वहन के लिए एक परिषद की स्थापना कर सकते हैं:
    • संघ और राज्यों अथवा विभिन्न राज्यों के बीच साझा हित के विषयों की जाँच करना तथा उन पर चर्चा करना।
    • नीतियों एवं कार्यों के बेहतर समन्वय के लिए सिफारिशें करना।
    • राज्यों के बीच विवादों पर विचार-विमर्श करना तथा उनके समाधान के संबंध में परामर्श देना।
  • इस प्रकार, परिषद टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से मतभेदों के समाधान के लिए एक संवैधानिक ढाँचा प्रदान करती है।

वर्तमान समय में अंतरराज्यीय परिषद का महत्त्व क्यों है?

  • परिसीमन एवं संघीय संतुलन का प्रबंधन: परिसीमन संसद में राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है।
    • जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की तुलना में अपने सापेक्ष राजनीतिक प्रभाव में कमी आने की आशंका हो सकती है।
    • अंतरराज्यीय परिषद दीर्घकालिक संघीय प्रभाव वाले निर्णय लिए जाने से पूर्व सभी राज्य सरकारों को शामिल करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर संवाद को सुगम बना सकती है।
  • सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना: कराधान, अवसंरचना, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आंतरिक सुरक्षा सहित कई राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए संघ एवं राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक है।
    • परिषद यह सुनिश्चित कर सकती है कि राष्ट्रीय नीति-निर्माण में राज्य सरकारों की सार्थक भागीदारी हो।
  • अंतरराज्यीय विवादों का समाधान: नदी जल, क्षेत्रीय सीमाओं, विद्युत वितरण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित विवाद प्रायः लंबे समय तक राजनीतिक एवं प्रशासनिक तनाव उत्पन्न करते हैं।
    • परिषद वार्ता और आम सहमति निर्माण के लिए एक मंच प्रदान कर सकती है।
  • क्षेत्रीय विविधता को ध्यान में रखना: भारत के राज्यों में आर्थिक विकास, भौगोलिक परिस्थितियों, जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों और प्रशासनिक क्षमताओं के स्तर पर पर्याप्त भिन्नताएँ हैं।
    • परिषद के माध्यम से परामर्श राष्ट्रीय नीतियों को क्षेत्रीय आवश्यकताओं के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है।
  • लोकतांत्रिक संघवाद को सुदृढ़ करना: प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के बीच नियमित संवाद राजनीतिक अविश्वास को कम कर सकता है तथा संवैधानिक सहयोग को सुदृढ़ बना सकता है।

परिषद प्रभावहीन क्यों बनी हुई है?

  • अनियमित बैठकें: परिषद की बैठकें बहुत कम आयोजित हुई हैं। इसकी 12वीं बैठक जुलाई 2016 में हुई थी, जो निरंतर परामर्श तंत्र के अभाव को दर्शाती है।
  • अत्यधिक केंद्रीकरण: इसका सचिवालय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, जिससे इसकी संस्थागत स्वायत्तता और स्वतंत्र कार्यसूची निर्धारित करने की क्षमता सीमित होती है।
  • परामर्शदात्री प्रकृति: इसकी सिफारिशें कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, जिससे प्रमुख नीतिगत निर्णयों पर इसका प्रभाव सीमित हो जाता है।
  • राजनीतिक मतभेद: केंद्र सरकार और राज्यों के बीच, विशेषकर विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के साथ, मतभेद प्रायः अंतर-सरकारी सहयोग को कमजोर करते हैं।
  • संस्थागत अतिव्यापन: नीति आयोग की शासी परिषद और GST परिषद सहित कई अन्य निकाय विशिष्ट क्षेत्रों में समन्वय का कार्य करते हैं।
    • हालाँकि, एक प्रभावी व्यापक मंच के अभाव में संघीय विषयों पर समग्र विचार-विमर्श सीमित रह जाता है।
  • संस्थागत निरंतरता का अभाव: नियमित बैठकों, सिफारिशों पर व्यवस्थित अनुवर्ती कार्रवाई तथा स्वतंत्र नीतिगत अनुसंधान पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।

संबंधित प्रयास एवं पहलें

  • सरकारिया आयोग (1983–88): अनुच्छेद 263 के अंतर्गत एक स्थायी अंतरराज्यीय परिषद की स्थापना की सिफारिश की।
  • पुंछी आयोग (2007–10): केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा की तथा अंतर-सरकारी समन्वय में सुधार के लिए सुझाव दिए।
  • क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils): क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत स्थापित की गईं।
  • GST परिषद (अनुच्छेद 279A): अप्रत्यक्ष कराधान के क्षेत्र में केंद्र-राज्य सहयोग के लिए एक संवैधानिक मंच प्रदान करती है।
  • नीति आयोग की शासी परिषद (2015): विकास संबंधी प्राथमिकताओं पर चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को एक मंच पर लाती है।
  • अंतरराज्यीय परिषद सचिवालय: अंतर-सरकारी परामर्श के लिए संस्थागत एवं प्रशासनिक सहायता प्रदान करता है।

आगे की राह: अंतरराज्यीय परिषद को प्रभावी बनाना

  • नियमित बैठकों का आयोजन सुनिश्चित करना: परिषद की बैठकें निश्चित अंतराल पर, अधिमानतः वर्ष में दो बार आयोजित की जानी चाहिए। साथ ही, तात्कालिक राष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष बैठकों का प्रावधान भी होना चाहिए।
  • संस्थागत स्वायत्तता को सुदृढ़ करना: सचिवालय को स्वतंत्र प्रशासनिक एवं अनुसंधान क्षमताओं से युक्त किया जाना चाहिए। इसके लिए जहाँ आवश्यक हो, संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपायों का भी प्रावधान किया जाना चाहिए।
  • विचार-विमर्श की भूमिका का विस्तार करना: राज्यों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत सुधारों, जैसे परिसीमन, वित्तीय हस्तांतरण, प्राकृतिक संसाधनों का वितरण और केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर परिषद के माध्यम से व्यवस्थित परामर्श किया जाना चाहिए।
  • अनुवर्ती कार्रवाई की व्यवस्था में सुधार करना: सिफारिशों के साथ उनके क्रियान्वयन की समय-सीमा, आवधिक समीक्षा तथा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कार्रवाई-रिपोर्ट भी संलग्न होनी चाहिए।
  • साक्ष्य-आधारित संवाद को बढ़ावा देना: संवैधानिक विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों, प्रशासकों और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों से युक्त विशेषज्ञ समितियों को परिषद के विचार-विमर्श में सहयोग करना चाहिए।
  • राजनीतिक आम सहमति को सुदृढ़ करना: परिषद को दलगत संबद्धताओं से ऊपर उठकर कार्य करना चाहिए। यह स्वीकार करना आवश्यक है कि संघीय सहयोग कोई राजनीतिक रियायत नहीं, बल्कि एक संवैधानिक आवश्यकता है।

निष्कर्ष

  • सहकारी संघवाद केवल एक राजनीतिक नारा बनकर नहीं रह सकता; इसके लिए सुदृढ़ एवं प्रभावी संस्थाओं की आवश्यकता है।
  • अंतरराज्यीय परिषद को पहले से ही अनुच्छेद 263 के अंतर्गत संवैधानिक आधार प्राप्त है। इसका पुनरुद्धार केंद्र-राज्य संबंधों को समय-समय पर होने वाले राजनीतिक टकराव से निरंतर संस्थागत सहयोग की दिशा में परिवर्तित कर सकता है।
  • आर्थिक विकास, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और संवैधानिक संतुलन से जुड़ी जटिल चुनौतियों के बीच भारत के लिए एक प्रभावी अंतरराज्यीय परिषद केवल वांछनीय ही नहीं, बल्कि ‘टीम इंडिया’ की भावना और लोकतांत्रिक संघवाद को सुदृढ़ करने के लिए अनिवार्य भी है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत में सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करने के लिए अंतरराज्यीय परिषद एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक तंत्र है, किंतु इसकी क्षमता का अभी तक पूर्ण उपयोग नहीं हो पाया है। इसके महत्त्व का परीक्षण कीजिए तथा इसकी प्रभावशीलता में सुधार के उपाय सुझाइए।

स्रोत: IE

 

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