पाठ्यक्रम: GS3/कृषि
संदर्भ
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-CPRI) के वैज्ञानिकों ने ‘कुफरी जामुनिया’ नामक आलू की एक नई किस्म विकसित की है, जिसमें सामान्य आलू की तुलना में एंथोसायनिन, विटामिन-C तथा कुछ सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की मात्रा अधिक है।
- केंद्र सरकार द्वारा इसे छिपी हुई भूख की समस्या के समाधान के उद्देश्य से प्रोत्साहित किया जा रहा है।
परिचय
- पर्याप्त कैलोरी सेवन के बावजूद छिपी हुई भूख एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है।
- यह स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति पर्याप्त मात्रा में भोजन तो ग्रहण करता है, लेकिन उसके आहार में आवश्यक विटामिन एवं खनिज तत्त्वों की कमी होती है।
- इस चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिक अधिक पोषण मूल्य वाली जैव-संवर्धित फसलों के विकास पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
- जैव-संवर्धन के अंतर्गत पादप प्रजनन तकनीकों के माध्यम से फसलों में पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ाई जाती है, ताकि खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से आवश्यक पोषक तत्त्वों की अधिक उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
- ICAR-CPRI ने पोषक तत्त्वों से भरपूर आलू की कई रंगीन किस्में विकसित की हैं, जिनमें कुफरी नीलकंठ, कुफरी माणिक और कुफरी जामुनिया शामिल हैं।
- कुफरी जामुनिया किस्म को वर्ष 2024 में जारी किया गया था। इस किस्म में कुफरी माणिक एवं कुफरी नीलकंठ की तुलना में एस्कॉर्बिक अम्ल (विटामिन-C), एंथोसायनिन तथा कैरोटीनॉयड की मात्रा अधिक होती है।
- इसका बैंगनी गूदा उच्च एंटीऑक्सीडेंट मात्रा एवं बेहतर पोषण गुणवत्ता का संकेत देता है। इसमें जिंक और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की मात्रा भी अधिक होती है।

अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र–दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (CSARC)
- अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र–दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (CSARC) की स्थापना उत्तर प्रदेश के आगरा में की गई है।
- यह केंद्र न केवल उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों के किसानों की आवश्यकताओं को पूरा करेगा, बल्कि दक्षिण एशियाई देशों को भी अपनी सेवाएँ प्रदान करेगा।
- उद्देश्य: आलू एवं शकरकंद की उत्पादकता, कटाई-पश्चात प्रबंधन तथा मूल्य संवर्धन में सुधार करके खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, किसानों की आय तथा रोजगार सृजन को बढ़ावा देना।
- शासन व्यवस्था: इसका संचालन एक समन्वय समिति द्वारा किया जाता है, जिसमें भारत, नेपाल, भूटान एवं बांग्लादेश के कृषि सचिव शामिल होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP)
- अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP) की स्थापना वर्ष 1971 में एक अनुसंधान एवं विकास संगठन के रूप में की गई थी। इसका प्रमुख ध्यान आलू, शकरकंद तथा एंडीज क्षेत्र की जड़ एवं कंद वाली फसलों पर है।
- यह संगठन वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित नवाचारी समाधान विकसित करता है, ताकि किफायती एवं पौष्टिक भोजन तक पहुँच बढ़ाई जा सके, समावेशी एवं सतत व्यावसायिक गतिविधियों तथा रोजगार के अवसरों को प्रोत्साहन मिले और जड़ एवं कंद आधारित कृषि-खाद्य प्रणालियों की जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता सुदृढ़ हो।
- मुख्यालय: लीमा, पेरू।
- CIP की अफ्रीका, एशिया एवं लैटिन अमेरिका के 20 से अधिक देशों में अनुसंधान संबंधी गतिविधियाँ संचालित हैं।
जैव-संवर्धित फसलें
- जैव-संवर्धित फसलें वे फसलें हैं, जिन्हें पारंपरिक किस्मों की तुलना में विटामिन, खनिज एवं अमीनो अम्ल जैसे आवश्यक पोषक तत्त्वों की अधिक मात्रा के लिए विशेष रूप से विकसित किया जाता है।
- इसके लिए पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों, आनुवंशिक संशोधन अथवा आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी विधियों का उपयोग किया जाता है।

- उद्देश्य: फसलों के पोषण मूल्य में वृद्धि करना, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी व्यापक रूप से पाई जाती है।
- उदाहरण के लिए, गोल्डन राइस को आनुवंशिक रूप से संशोधित किया गया है, ताकि उसमें प्रो-विटामिन A (बीटा-कैरोटीन) का उत्पादन अधिक हो सके। इसका उद्देश्य विटामिन-A की कमी को कम करना है।

जैव-संवर्धन का महत्त्व
- कुपोषण उन्मूलन का सतत उपाय: इसे कुपोषण की समस्या को कम करने के लिए सबसे सतत दृष्टिकोणों में से एक माना जाता है।
- प्राकृतिक पोषक तत्त्वों की उपलब्धता: इसके माध्यम से खाद्य पदार्थों में पोषक तत्त्व प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होते हैं।
- किफायती विकल्प: जैव-संवर्धित खाद्य पदार्थ सामान्यतः उपभोक्ताओं के लिए किफायती होते हैं, क्योंकि इनके उत्पादन में अतिरिक्त प्रसंस्करण लागत आवश्यक नहीं होती।
- उच्च उत्पादकता: जैव-संवर्धित किस्में पारंपरिक किस्मों के समान उच्च उपज देने में सक्षम होती हैं। अतः किसानों को उत्पादन के स्तर पर किसी प्रकार की हानि नहीं होती।
- अतिरिक्त आधारभूत संरचना की आवश्यकता नहीं: खाद्य संवर्धन की तुलना में जैव-संवर्धन के लिए व्यापक प्रसंस्करण एवं आधारभूत संरचना की आवश्यकता नहीं होती।
- अतिरिक्त प्रसंस्करण लागत का अभाव: पोषक तत्त्वों से समृद्ध खाद्यान्न तैयार करने के लिए अलग से अतिरिक्त प्रसंस्करण की आवश्यकता नहीं होती।
- नोट: खाद्य संवर्धन (Food Fortification) वह प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत खाद्य पदार्थों के प्रसंस्करण के दौरान उनमें आवश्यक पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ाई जाती है।
चुनौतियाँ
- कृषि संबंधी एवं जलवायु संबंधी बाधाएँ: जैव-संवर्धित किस्मों का प्रदर्शन विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकता है।
- बाजार प्रोत्साहन का अभाव: पोषक तत्त्वों से समृद्ध फसलों के लिए किसानों को बेहतर मूल्य नहीं मिल पाता, जिससे उनके उत्पादन के प्रति उत्साह कम हो सकता है।
- मांग का अभाव: जन-जागरूकता अभियानों की कमी के कारण बाजार में जैव-संवर्धित फसलों की मांग सीमित बनी रहती है।
- राष्ट्रीय पोषण योजनाओं के साथ कमजोर एकीकरण: मध्याह्न भोजन योजना, समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में जैव-संवर्धित खाद्यान्नों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है।
- अनुसंधान एवं विकास में सीमित निवेश: आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों (GM Crops) अथवा संकर बीजों की तुलना में जैव-संवर्धन के क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम वित्तीय निवेश किया जाता है।
आगे की राह
- बीज वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने के साथ-साथ किसानों तक जागरूकता एवं तकनीकी सहायता की पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- जैव-संवर्धित फसलों को सरकारी खाद्य एवं पोषण योजनाओं के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए।
- उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ाने तथा किसानों को बाजार से जोड़ने के लिए प्रभावी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
- क्षेत्र-विशिष्ट अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा पोषण संबंधी प्रभावों के आकलन पर अधिक निवेश किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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