NVS-03 मिशन: भारत की स्वदेशी नौवहन प्रणाली का सुदृढ़ीकरण

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ 

  • भारत की स्वदेशी उपग्रह आधारित नौवहन प्रणाली (NavIC) की कार्यक्षमता को पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा NVS-03 उपग्रह का प्रक्षेपण किया जा रहा है।

भारतीय नक्षत्र के साथ नौवहन प्रणाली (NavIC)

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा विकसित NavIC भारत की स्वायत्त क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली है, जिसे नागरिक एवं सैन्य दोनों प्रकार की नौवहन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार किया गया है। इसे वर्ष 2013 में प्रारंभ किया गया था।
    • NavIC को पहले भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) के नाम से जाना जाता था।
  • यह भारत के अंदर तथा देश की सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक सटीक स्थिति, वेग एवं समय (PVT) संबंधी सेवाएँ प्रदान करती है। यह इसका प्राथमिक सेवा क्षेत्र है।

भारतीय नक्षत्र के साथ नौवहन प्रणाली

  • इस प्रणाली का विकास वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के बाद प्रारंभ हुआ था। उस समय कथित तौर पर भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा GPS संबंधी सूचनाओं तक पहुँच प्रदान करने पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा था।
  • NavIC को 7 उपग्रहों के समूह तथा 24×7 कार्यरत भू-आधारित केंद्रों के नेटवर्क के साथ विकसित किया गया है।
    • इस उपग्रह समूह के तीन उपग्रह भूस्थिर कक्षा में तथा चार उपग्रह झुकी हुई भू-समकालिक कक्षा में स्थापित किए गए हैं।
  • NavIC दो प्रकार की सेवाएँ प्रदान करता है:
    • मानक स्थिति सेवा (SPS): नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए।
    • प्रतिबंधित सेवा (RS): सामरिक एवं रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए।
    • यह अपने मुख्य सेवा क्षेत्र में 20 मीटर से बेहतर स्थान-निर्धारण सटीकता तथा 40 नैनोसेकंड से बेहतर समय-निर्धारण सटीकता प्रदान करता है।
  • नौवहन आवृत्तियाँ: प्रथम पीढ़ी के उपग्रह L5 तथा S-बैंड आवृत्तियों का उपयोग करते हैं।

NVS शृंखला 

  • इसमें NavIC की दूसरी पीढ़ी के पाँच उपग्रह शामिल हैं, जिन्हें NVS-01 से NVS-05 तक नामित किया गया है। इनका उद्देश्य मौजूदा उपग्रह समूह की क्षमताओं को बढ़ाना है।
    • इन उपग्रहों में L1-बैंड संचार सुविधा शामिल की गई है, जिससे विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए NavIC की अनुकूलता एवं उपयोगिता में वृद्धि होती है।
  • दूसरी पीढ़ी के पहले उपग्रह NVS-01 का प्रक्षेपण वर्ष 2023 में किया गया था।
  • NVS-01 में पहली बार स्वदेशी परमाणु घड़ी को अंतरिक्ष में भेजा गया था।
  • NVS-02 का प्रक्षेपण जनवरी 2025 में किया गया था।
  • दूसरी पीढ़ी के NVS उपग्रहों में कम-से-कम एक स्वदेशी रूप से विकसित रुबिडियम परमाणु घड़ी स्थापित की गई है।
    • इन परमाणु घड़ियों का विकास ISRO के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) द्वारा किया गया है। इनका उद्देश्य IRNSS की प्रथम पीढ़ी के उपग्रहों में उपयोग की जाने वाली आयातित रुबिडियम परमाणु घड़ियों का स्थान लेना है।

परमाणु घड़ी के बारे में 

  • परमाणु घड़ी एक अत्यंत सटीक समय-निर्धारण उपकरण है, जो परमाणुओं, विशेषकर सीज़ियम या रुबिडियम परमाणुओं की प्राकृतिक कंपन आवृत्ति के आधार पर समय को मापता है।
  • इसे समय मापन की सबसे सटीक तकनीकों में से एक माना जाता है। यह नैनोसेकंड (एक सेकंड का एक अरबवाँ भाग) तक की सटीकता बनाए रखने में सक्षम है।
  • कार्य सिद्धांत :
    • जब परमाणु ऊर्जा की विभिन्न अवस्थाओं के बीच संक्रमण करते हैं, तो वे अत्यंत स्थिर एवं पूर्वानुमेय आवृत्तियों पर दोलन करते हैं।
    • परमाणु घड़ी इन आवृत्तियों को मापती है तथा उन्हें मानक समय संकेतों में परिवर्तित करती है।

वर्तमान में NavIC अपेक्षित रूप से कार्य क्यों नहीं कर रहा है?

  • परमाणु घड़ियों की विफलता: प्रथम पीढ़ी के कई उपग्रहों में स्थापित परमाणु घड़ियों ने कार्य करना बंद कर दिया, जिससे स्थिति-निर्धारण सेवाएँ प्रदान करने के लिए उपलब्ध उपग्रहों की संख्या में कमी आई।
    • मार्च 2026 में IRNSS-1F उपग्रह में कार्यरत अंतिम परमाणु घड़ी ने भी उपग्रह की निर्धारित 10 वर्ष की मिशन अवधि पूरी होने के बाद काम करना बंद कर दिया।
  • NVS-02 की विफलता: NVS-02 को सफलतापूर्वक भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में स्थापित किया गया था, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण इसकी प्रणोदन प्रणाली आवश्यक कक्षा-उन्नयन प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकी।
  • परिचालनरत उपग्रहों की अपर्याप्त संख्या: जुलाई 2026 तक केवल तीन उपग्रह (IRNSS-1B, IRNSS-1I तथा NVS-01) स्थिति-निर्धारण, नौवहन एवं समय संबंधी सेवाएँ प्रदान कर रहे थे।
    • बुनियादी स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण सेवाओं के लिए कम-से-कम चार परिचालनरत उपग्रहों की आवश्यकता होती है। परिणामस्वरूप, वर्तमान में NavIC की स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण क्षमता उपलब्ध नहीं है, हालाँकि इसकी समय-निर्धारण सेवा अभी भी कार्यरत है।

NVS-03 भारत की नौवहन क्षमताओं को किस प्रकार सुदृढ़ करेगा?

  • स्थिति-निर्धारण सेवाओं की पुनर्स्थापना: NVS-03 के सफलतापूर्वक परिचालन में आने से कार्यरत उपग्रहों की संख्या बढ़कर चार हो जाएगी, जो बुनियादी स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण सेवाओं के लिए आवश्यक न्यूनतम संख्या है।
  • अनुकूलता में सुधार: L1 आवृत्ति के उपयोग से उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में NavIC को अपनाने एवं इसके उपयोग की संभावनाएँ बढ़ेंगी।

अन्य उपग्रह नौवहन प्रणालियाँ

  • GPS : इसे संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा विकसित एवं संचालित किया जाता है। यह मुख्यतः मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO) में स्थित उपग्रहों के समूह का उपयोग करता है।
  • GLONASS: यह रूस की वैश्विक उपग्रह नौवहन प्रणाली है।
  • Galileo: यह यूरोपीय संघ की स्वतंत्र वैश्विक उपग्रह नौवहन प्रणाली है।
  • BeiDou: यह चीन की वैश्विक उपग्रह नौवहन प्रणाली है, जो मध्यम पृथ्वी कक्षा, भूस्थिर कक्षा तथा भू-समकालिक कक्षा में स्थित उपग्रहों के संयोजन का उपयोग करती है।
  • QZSS : यह जापान की क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली है, जिसे जापान तथा एशिया-ओशिनिया क्षेत्र में GPS की पूरक प्रणाली के रूप में विकसित किया गया है।

स्रोत: TH

 

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