गुंडा-विरोधी विधेयक, 2026
पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
चर्चा में क्यों ?
- भारत के राष्ट्रपति ने पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों के नियंत्रण विधेयक, जिसे आमतौर पर ‘गुंडा-विरोधी’ विधेयक कहा जाता है, को पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार को वापस भेज दिया।
बंगाल गुंडा विरोधी विधेयक
- यह ‘गुंडों’ और ‘असामाजिक गतिविधियों’ को लक्षित करने वाला एक निवारक निरोध कानून है।
- निरोध की अवधि: यह प्राधिकरणों को किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है। साथ ही, ‘असामाजिक’ गतिविधियों को रोकने के लिए उसे निर्दिष्ट ‘क्षेत्र, जिले या जिलों’ में समान अवधि तक प्रवेश करने से रोकने या वहाँ से निष्कासित करने की अनुमति देता है।
- परिभाषाएँ: इसमें ‘गुंडा’ और ‘असामाजिक गतिविधि’ शब्दों की व्यापक परिभाषाएँ दी गई हैं।
- गुंडा वह व्यक्ति है जिसे “आम तौर पर समुदाय के लिए निराशाजनक और खतरनाक माना जाता है” या जो “आदतन अपराधी” है।
- ‘असामाजिक गतिविधि’ में ऐसा आचरण शामिल है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से “जनता में भय या असुरक्षा, जीवन या संपत्ति के लिए खतरा, सार्वजनिक व्यवस्था में अशांति, गैर-कानूनी बेदखली, या अवैध खनन, उत्खनन, रेत अथवा वन गतिविधि” उत्पन्न करता है, जिससे सरकारी राजस्व को नुकसान होता है।
- तलाशी और जब्ती: यह तलाशी और जब्ती की भी अनुमति देता है, हिरासत में लिए गए या निष्कासित व्यक्ति को आश्रय देने पर दंड का प्रावधान करता है, अधिकारियों को सद्भावना में किए गए कार्यों के लिए संरक्षण प्रदान करता है तथा अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाता है।
विवाद
- विधेयक के व्यापक प्रावधानों को चुनौती देते हुए तीन जनहित याचिकाएँ कलकत्ता उच्च न्यायालय में दायर की गईं।
- उच्च न्यायालय ने उपर्युक्त तीनों जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया और कहा कि याचिकाएँ समय से पहले दायर की गई थीं, क्योंकि विधेयक को अभी राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई थी और इसलिए यह कानून नहीं बना था।
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों के नियंत्रण (‘गुंडा-विरोधी’) विधेयक को समीक्षा के लिए राज्य विधानमंडल को वापस भेज दिया।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 200: किसी राज्य विधेयक को सामान्यतः कानून बनने के लिए राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक होती है। राज्यपाल स्वीकृति दे सकते हैं, स्वीकृति रोक सकते हैं या विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।
- यदि विधेयक उच्च न्यायालय की शक्तियों को कम करता है और उसकी संवैधानिक स्थिति को खतरे में डालता है, तो उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
- राज्यपाल किसी धन विधेयक से अलग विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भी भेज सकते हैं; यदि विधानमंडल उसे दोबारा पारित कर देता है, तो राज्यपाल स्वीकृति रोक नहीं सकते।
- अनुच्छेद 201: किसी राज्य विधेयक को राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं। राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकृति दे सकते हैं या स्वीकृति रोक सकते हैं।
- धन विधेयक से अलग विधेयक के मामले में राष्ट्रपति राज्यपाल से विधेयक को पुनर्विचार के लिए राज्य विधानमंडल के पास वापस भेजने का अनुरोध भी कर सकते हैं।
- विधानमंडल को छह महीने के भीतर विधेयक पर पुनर्विचार करना होता है और यदि उसे संशोधनों के साथ या बिना संशोधनों के दोबारा पारित किया जाता है, तो विधेयक को पुनः राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजा जाता है।
अन्य राज्यों में स्थिति
- गुंडा कानून कई राज्यों में मौजूद हैं, विशेष रूप से गुजरात में, जहाँ इन्हें असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1985 के रूप में लागू किया गया है।
- भारतीय न्याय संहिता में भी संगठित अपराध से निपटने के प्रावधान हैं।
- संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत कुछ सुरक्षा उपायों के साथ निवारक निरोध की अनुमति है। ऐसे विषयों पर कानून ‘लोक व्यवस्था’ के अंतर्गत बनाए जाते हैं, जो राज्य सूची का विषय है।
स्रोत :IE
उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन में गिरावट
पाठ्यक्रम: जीएस-3/कृषि
सन्दर्भ
- उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन 2019-20 में 126.4 लाख टन से घटकर 2025-26 में 89.5 लाख टन हो गया है। इसका कारण व्यापक रूप से उगाई जाने वाली सीओ-0238 गन्ने की किस्म में लाल सड़न रोग का फैलाव है।
गन्ने में लाल सड़न रोग
- लाल सड़न एक कवकीय रोग है, जो कोलेटोट्राइकम फाल्केटम के कारण होता है। यह गन्ने की संवहनी प्रणाली को प्रभावित करता है और पानी तथा पोषक तत्वों के परिवहन को बाधित करता है।
- इस रोग के कारण पत्तियाँ पीली पड़ना, मुरझाना, गन्ने के अंदर लाल रंग का होना और अंततः तनों का सूखना तथा खोखला होना जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप उपज में काफी कमी आती है।
भारत में चीनी उत्पादन
- भारत विश्व में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता और दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक रहा है।
- भारत में 2025-26 के चीनी मौसम में चीनी उत्पादन लगभग 279 लाख टन रहने का अनुमान है।
- उत्पादन प्रक्रिया: गन्ने को पेराई करके चीनी का उत्पादन किया जाता है। इसमें गन्ने से रस निकाला जाता है, उसे उबालकर चाशनी बनाई जाती है, फिर उसका क्रिस्टलीकरण किया जाता है और अपकेंद्रण द्वारा कच्चे चीनी के क्रिस्टल प्राप्त किए जाते हैं।
- भारत में चीनी उद्योग का स्थान भारत में चीनी उद्योग मुख्य रूप से दो प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में व्यापक रूप से वितरित है:
- उत्तर भारत: उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब।
- दक्षिण भारत: महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश।
गन्ने की वृद्धि के लिए भौगोलिक परिस्थितियाँ
- जलवायु: गन्ने के लिए गर्म (21°–27°C) और आर्द्र (75–150 सेमी वर्षा) परिस्थितियाँ आवश्यक हैं।
- अत्यधिक वर्षा से चीनी की मात्रा कम हो जाती है, जबकि अपर्याप्त वर्षा से रेशेदार फसल पैदा होती है। ठंडी और शुष्क सर्दियाँ गन्ने के पकने में सहायक होती हैं।
- दक्षिण भारत की उष्णकटिबंधीय जलवायु अधिक सुक्रोज मात्रा के लिए अनुकूल है, जिसके कारण उत्तर भारत की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र अधिक उपज प्राप्त होती है।
- मृदा: गन्ना नमी बनाए रखने वाली मिट्टी को पसंद करता है, लेकिन समय के साथ मिट्टी की उर्वरता को कम कर देता है।
- भारत में गन्ना एक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय नकदी फसल है, जिसका मुख्य उपयोग चीनी, गुड़, इथेनॉल और जैव-ऊर्जा उत्पादन में किया जाता है।
भारत में गन्ने की खेती के दो प्रमुख क्षेत्र हैं:
- उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (प्रायद्वीपीय भारत): अधिक उपज वाला क्षेत्र।
- उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (उत्तरी भारत): अपेक्षाकृत कम उत्पादकता वाला क्षेत्र।
- प्रमुख क्षेत्र: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात आदि।
स्रोत: IE
पशुधन बीमा पोर्टल का शुभारंभ
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
चर्चा में क्यों?
- पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) ने नई दिल्ली में पशुधन बीमा पोर्टल का शुभारंभ किया। यह देश में पशुधन बीमा सेवाओं के डिजिटल रूपांतरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पशुधन बीमा पोर्टल
- यह पशुधन बीमा के लिए एक एकीकृत डिजिटल मंच उपलब्ध कराएगा, जिससे पशुपालन एवं डेयरी विभाग की पशुधन बीमा योजना के अंतर्गत बीमित पशुओं के लिए बीमा पॉलिसी जारी करने, दावों के निपटान, निगरानी और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सकेगा।
- यह पोर्टल हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्त 11 क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध होगा, जिससे पशुपालक उन भाषाओं में जानकारी और सेवाओं तक पहुँच सकेंगे, जिनसे वे परिचित हैं।
क्या आप जानते हैं?
- पशुधन क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का एक महत्वपूर्ण उप-क्षेत्र है।
- पशुधन क्षेत्र ने 2014-15 से 12.77 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की है।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में पशुपालन एवं डेयरी विभाग के लिए 6,153.46 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
- भारत में विश्व की सबसे बड़ी पशुधन आबादी है, जिससे पशुधन कृषि और ग्रामीण आजीविका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
- भारत दूध उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है और वैश्विक उत्पादन में लगभग 24.76 प्रतिशत का योगदान देता है। भारत अंडा उत्पादन में दूसरे और मांस उत्पादन में विश्व स्तर पर पाँचवें स्थान पर है।
- पशुधन से जैविक खाद प्राप्त होती है, मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है और विशेष रूप से सूखा-प्रवण क्षेत्रों में एकीकृत फसल-पशुधन कृषि को बढ़ावा मिलता है।

स्रोत :PIB
भारत की पहली एलएनजी ट्रेन
पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण/ऊर्जा
सन्दर्भ
- देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू करने के बाद, भारत ने अब अपनी पहली एलएनजी-संचालित ट्रेन शुरू की है।
परिचय
- इस ट्रेन को गुजरात के साबरमती से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। यह ट्रेन डीजल-एलएनजी दोहरे ईंधन प्रणाली का उपयोग करती है।
- इस परियोजना के तहत साबरमती एकीकृत कोचिंग डिपो में मौजूद 1,400 एचपी क्षमता वाली दो ड्राइविंग पावर कारों (डीपीसी) को दोनों ईंधनों पर चलने के लिए परिवर्तित किया गया है।
- दोहरे ईंधन प्रणाली के तहत, एलएनजी डीजल की खपत का लगभग 40% तक प्रतिस्थापन कर सकती है। इससे ईंधन की खपत, लागत तथा कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कणिकीय पदार्थ जैसे उत्सर्जनों को कम करने में मदद मिलेगी।
द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG)
- द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) मुख्य रूप से मीथेन से बनी प्राकृतिक गैस है, जिसे लगभग -162°C तक ठंडा किया जाता है, जिससे यह द्रव में परिवर्तित हो जाती है। द्रव अवस्था में इसका आयतन गैसीय अवस्था की तुलना में लगभग 600 गुना कम हो जाता है, जिससे इसका भंडारण और परिवहन आसान हो जाता है।
- भारत अपनी प्राकृतिक गैस की आवश्यकता का लगभग आधा हिस्सा एलएनजी के रूप में आयात करता है। अकेले कतर भारत के एलएनजी आयात का लगभग आधा हिस्सा उपलब्ध कराता है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा एलएनजी निर्यातक है, जबकि चीन सबसे बड़ा आयातक है।
क्या आप जानते हैं?
- भारतीय रेल ने 2015-16 में लगभग 293 करोड़ लीटर डीजल का उपयोग किया था और वर्ष 2030 तक अपने परिचालन में डीजल के उपयोग को समाप्त करने का व्यापक लक्ष्य निर्धारित किया है।
- एलएनजी की संभावनाएँ रेलवे से आगे भी हैं। यह लंबी दूरी के ट्रकों के लिए एक वैकल्पिक ईंधन के रूप में उभर रही है, जहाँ यह डीजल की तुलना में महत्वपूर्ण लागत लाभ प्रदान कर सकती है।
स्रोत: IE
अमीबा जटिल जीवन की सीमा से परे गर्मी में जीवित रहता है
पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- नासा द्वारा समर्थित वैज्ञानिकों ने ऐसे जीव की खोज की है, जो पहले जटिल जीवन के लिए असंभव माने जाने वाले अत्यधिक तापमान में जीवित रहता है।
प्रमुख बिंदु
- अध्ययन में इन्सेंडियामोइबा कैस्काडेन्सिस (Incendiamoeba cascadensis) नामक जीव, जिसे “फायर अमीबा” कहा जाता है, को कैलिफोर्निया के लासेन ज्वालामुखीय राष्ट्रीय उद्यान के गर्म जल में 145 डिग्री फारेनहाइट (63 डिग्री सेल्सियस) तापमान पर कोशिका विभाजन द्वारा प्रजनन करते हुए पाया गया।
- इसने सभी ज्ञात यूकैरियोट्स के लिए ऊपरी तापमान सीमा का एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है।
- यूकैरियोट्स में जटिल कोशिकाएँ होती हैं, जिनमें एक केंद्रक और झिल्ली-बद्ध कोशिकांग पाए जाते हैं। ये अत्यधिक गर्मी के प्रति संवेदनशील होते हैं।
- यह खोज वैज्ञानिकों की इस समझ को व्यापक कर सकती है कि पृथ्वी और पृथ्वी के बाहर जटिल जीवन किन परिस्थितियों में जीवित रह सकता है।
प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाएँ
- कोशिका जीवन की मूल इकाई है और यह सभी जीवित जीवों के निर्माण की आधारभूत इकाई है। इसकी खोज रॉबर्ट हुक ने 1665 में की थी।
- कुछ कोशिकाओं में झिल्ली-बद्ध कोशिकांग पाए जाते हैं, जबकि कुछ में नहीं पाए जाते। कोशिका की आंतरिक संरचना के आधार पर जीवों में मुख्यतः दो प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं—
- यूकैरियोटिक कोशिकाएँ
- प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ
- प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिक सरल और आकार में छोटी होती हैं, जबकि यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिक जटिल और आकार में बड़ी होती हैं।
स्रोत: NASA
हरित ईंधन की आपूर्ति के लिए भारत की पहली बंदरगाह-आधारित ई-मेथनॉल उत्पादन सुविधा
पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण
चर्चा में क्यों?
- भारत ने हरित समुद्री ईंधन का वैश्विक आपूर्तिकर्ता बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इसके तहत गुजरात के कांडला स्थित दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण (डीपीए) में देश की पहली बंदरगाह-आधारित ई-मेथनॉल उत्पादन सुविधा की आधारशिला रखी गई है।
ई-मेथनॉल क्या है?
- मेथनॉल एक सरल तरल ईंधन है, जिसे जहाजों में जलाया जा सकता है। इसके निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर इसे “हरित” या “ई-मेथनॉल” कहा जाता है।
- नवीकरणीय विद्युत का उपयोग करके पानी को विभाजित कर हाइड्रोजन (हरित हाइड्रोजन) प्राप्त किया जाता है।
- इस हाइड्रोजन को पकड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मिलाया जाता है। यहाँ कार्बन डाइऑक्साइड जैवजनित होती है, अर्थात यह जैवभार जैसे जैविक स्रोतों से प्राप्त होती है। इसलिए ईंधन को जलाने से वायुमंडल में नया जीवाश्म कार्बन नहीं जुड़ता।
- इसका परिणाम ऐसा मेथनॉल होता है, जिसका उपयोग मेथनॉल के लिए बनाए गए जहाजों के इंजनों में किया जा सकता है।
महत्व
- समुद्री परिवहन का कार्बन-मुक्तीकरण: समुद्री परिवहन से बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) ने लगभग 2050 तक अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन से शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
- ईंधन आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत: यह परियोजना भारत को वैश्विक समुद्री परिवहन क्षेत्र के लिए हरित ईंधन के निर्यातक के रूप में स्थापित करने में सहायता करेगी।
- राष्ट्रीय लक्ष्यों से जुड़ाव: यह परियोजना 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने की भारत की प्रतिबद्धता और आत्मनिर्भर भारत मिशन को समर्थन देती है। यह राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, हरित टग संक्रमण कार्यक्रम तथा समुद्री अमृत काल विजन 2047 के अनुरूप भी है।
स्रोत:DD
डिजिटल कनेक्टिविटी रेटिंग (डीसीआर) मंच
पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
सन्दर्भ
- भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने डिजिटल कनेक्टिविटी रेटिंग (डीसीआर) मंच का शुभारंभ किया।
डीसीआर मंच का परिचय
- यह एक एकीकृत डिजिटल प्रणाली है, जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को संपत्तियों की डिजिटल कनेक्टिविटी रेटिंग देखने और पूरी रेटिंग प्रक्रिया को शुरू से अंत तक संचालित करने में सक्षम बनाना है।
- इस मंच में डिजिटल कनेक्टिविटी की जाँच के लिए एक मोबाइल अनुप्रयोग भी शामिल है।
- यह संपत्ति प्रबंधकों (पीएम), पंजीकृत डिजिटल कनेक्टिविटी रेटिंग एजेंसियों (डीसीआरए) और उपभोक्ताओं को एक साझा डिजिटल मंच पर लाता है।
- संपत्ति प्रबंधक सार्वजनिक, सरकारी, वाणिज्यिक और निजी जैसी श्रेणियों के अंतर्गत संपत्तियों का पंजीकरण कर सकते हैं, रेटिंग के लिए आवेदन जमा कर सकते हैं, निर्धारित जानकारी एवं दस्तावेज अपलोड कर सकते हैं, किसी पंजीकृत डीसीआरए का चयन कर सकते हैं और मंच के माध्यम से आवेदन की स्थिति देख सकते हैं।
- यह मंच निर्मित और निर्माणाधीन दोनों प्रकार की संपत्तियों के लिए निर्धारित मूल्यांकन प्रक्रिया का समर्थन करता है।
महत्व
- उपभोक्ताओं के लिए: यह मंच एक सार्वजनिक रेटिंग खोज पृष्ठ उपलब्ध कराता है, जहाँ संपत्तियों को नाम, प्रमाणपत्र पहचान संख्या या स्थान के आधार पर खोजा जा सकता है।
- यह मंच संपत्तियों की डिजिटल कनेक्टिविटी की तैयारी के आकलन के लिए एक पारदर्शी और मानकीकृत ढाँचा स्थापित करता है।
- रेटिंग को सार्वजनिक रूप से खोज योग्य बनाने और प्रमाणपत्रों का सत्यापन करने से यह मंच उपभोक्ताओं को विश्वसनीय और तुलनीय जानकारी उपलब्ध कराकर उन्हें सशक्त बनाएगा।
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई)
- स्थापना: 1997 में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 के तहत।
- मंत्रालय: संचार मंत्रालय।
- उद्देश्य: दूरसंचार सेवाओं का विनियमन करना, जिसमें दूरसंचार सेवाओं के शुल्क का निर्धारण/संशोधन भी शामिल है, जो पहले केंद्र सरकार के अधीन था।
- ट्राई के प्रमुख उद्देश्यों में से एक निष्पक्ष और पारदर्शी नीतिगत वातावरण उपलब्ध कराना है, जो समान अवसर को बढ़ावा दे और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को सुगम बनाए।
स्रोत: DD
समुद्र-स्तर वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा
पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण
सन्दर्भ
- भारत ने समुद्र-स्तर वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा, 2026 का स्वागत किया। इसमें समानता, जलवायु न्याय और संवेदनशील द्वीपीय एवं तटीय राज्यों के लिए कानूनी निश्चितता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया। यह घोषणा संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में सामने आई।
परिचय
- समुद्र-स्तर वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा, जिसे 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से अपनाया, समुद्र-स्तर में वृद्धि के कानूनी, मानवीय और विकासात्मक परिणामों को विशेष रूप से संबोधित करने वाला पहला संयुक्त राष्ट्र-व्यापी राजनीतिक ढाँचा है।
- पृष्ठभूमि: समुद्र-स्तर वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा की प्रक्रिया की शुरुआत 2024 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के निर्णय 78/558 से हुई। इसमें इस मुद्दे पर एक उच्च-स्तरीय बैठक आयोजित करने और सर्वसम्मति से बातचीत के माध्यम से एक कार्रवाई-उन्मुख घोषणा तैयार करने का आह्वान किया गया था।
- इसके बाद 2026 की उच्च-स्तरीय बैठक हुई, जिसके परिणामस्वरूप इस घोषणा को अपनाया गया।
- वर्तमान में लगभग 90 करोड़ लोग निम्न-स्थित तटीय क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि 2050 तक 1 अरब से अधिक लोगों के तटीय खतरों का सामना करने की संभावना है। यह चुनौती के व्यापक स्तर को दर्शाता है।
स्रोत: BL
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संक्षिप्त समाचार 28-09-2026