पाठ्यक्रम: जीएस-2/राजव्यवस्था एवं शासन
सन्दर्भ
- चुनावी मतदाता सूचियों के प्रशासन को लेकर विवाद, विशेष रूप से यह आरोप कि गोवा में 97 योग्य मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दिया है कि क्या मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार होना चाहिए।
भारत में मतदान एवं सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के बारे में
- भारत ने गणराज्य की शुरुआत में ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाया, जबकि कई पश्चिमी लोकतंत्रों में मतदान का अधिकार संपत्ति, लिंग और नस्ल से जुड़े संघर्षों के माध्यम से क्रमिक रूप से प्राप्त किया गया।
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का अर्थ है कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को, संविधान द्वारा अधिकृत अयोग्यताओं के अधीन, जाति, धर्म, लिंग, शिक्षा या संपत्ति के आधार पर किसी भेदभाव के बिना चुनावों में भाग लेने का अधिकार है।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों का प्रावधान करता है।
- मतदान की आयु को मूल रूप से 21 वर्ष से घटाकर 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा 18 वर्ष कर दिया गया।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (आरपीए 1950) मुख्य रूप से निर्वाचक नामावलियों के निर्माण और उससे जुड़े अन्य मुद्दों का प्रावधान करता है, जबकि आरपीए 1951 चुनावों के संचालन, योग्यताओं और अयोग्यताओं, भ्रष्ट आचरण तथा चुनावी अपराधों से संबंधित है।
मतदान के अधिकार की कानूनी स्थिति
- कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में संविधान पीठ ने माना कि निर्वाचित करने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, न कि मौलिक अधिकार, जिसे मुख्य रूप से आरपीए, 1951 की धारा 62 द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में मतदान और अनुच्छेद 19(1)(a) जैसी संवैधानिक स्वतंत्रताओं तथा अनुच्छेद 21 में निहित लोकतांत्रिक सिद्धांतों के बीच संबंध पर विचार किया गया।
- इसलिए, जबकि मतदान के अधिकार को वर्तमान में वैधानिक अधिकार माना जाता है, लोकतंत्र तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को कहीं अधिक मजबूत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, जिसमें मूल संरचना सिद्धांत के माध्यम से प्राप्त संरक्षण भी शामिल है।
मौलिक अधिकार का दर्जा देने के पक्ष में तर्क
- लोकतंत्र मूल संरचना है: इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को मूल संरचना का हिस्सा माना गया था। इतना केंद्रीय अधिकार तर्कसंगत रूप से भाग III के संरक्षण का हकदार है।
- सामान्य कानून से संरक्षण: वैधानिक अधिकार होने के कारण इसे साधारण संसदीय बहुमत द्वारा सीमित किया जा सकता है। जहाँ मतदाता सूची की त्रुटियाँ अप्रत्यक्ष रूप से कल्याणकारी लाभों को प्रभावित करती हैं, वहाँ अधिक मजबूत संरक्षण आवश्यक है।
- अनुच्छेद 32 के तहत प्रत्यक्ष उपचार: मौलिक अधिकारों को सीधे सर्वोच्च न्यायालय में लागू कराया जा सकता है। वर्तमान में चुनाव संबंधी विवादों को मुख्यतः चुनाव याचिकाओं के माध्यम से उठाया जाता है (अनुच्छेद 329(ख))।
- अंतरराष्ट्रीय मानदंड: मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा (यूडीएचआर) का अनुच्छेद 21 और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध (आईसीसीपीआर) का अनुच्छेद 25 — जिसका भारत एक पक्षकार है — राजनीतिक भागीदारी को मानव अधिकार के रूप में मान्यता देते हैं।
विपक्ष में तर्क
- इससे नियमित चुनावी विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है।
- संवैधानिक संरक्षण के बावजूद मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित या अन्यथा अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाने की वैध प्रक्रिया की अनुमति बनी रहनी चाहिए।
- किसी भी विस्तारित न्यायिक उपचार को अनुच्छेद 329(ख) के साथ सामंजस्य स्थापित करना होगा, जो चल रहे चुनावों में न्यायालय के हस्तक्षेप को सीमित करता है।
सटीक मतदाता सूचियाँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- चुनाव तभी सार्थक होता है जब पात्र नागरिकों को सही रूप से शामिल किया जाए और अपात्र प्रविष्टियों को हटा दिया जाए।
- किसी व्यक्ति की आयु कम-से-कम 18 वर्ष होनी चाहिए और वह सामान्यतः किसी निर्वाचन क्षेत्र में निवास करता हो, ताकि उसका पंजीकरण किया जा सके; यह आरपीए, 1950 की धारा 19 के तहत वैधानिक ढाँचे के अधीन है।
- धारा 21 निर्वाचक नामावलियों को तैयार करने और उनमें संशोधन का प्रावधान करती है।
त्रुटियों के कारण निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं:
- गलत तरीके से नाम हटाना और मताधिकार से वंचित करना;
- दोहरी या अपात्र प्रविष्टियाँ;
- प्रतिरूपण और चुनावी कदाचार; तथा
- ‘एक व्यक्ति, एक मत’ के सिद्धांत का कमजोर होना।
- गोवा की रिपोर्ट की गई घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कथित रूप से एक तकनीकी और प्रशासनिक समस्या शामिल थी, जिसने स्थानीय अधिकारियों की गलत तरीके से हटाए गए नामों को सुधारने की क्षमता को सीमित कर दिया।
संस्थागत जवाबदेही
- अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की संवैधानिक जिम्मेदारी प्रदान करता है।
- चुनावी प्रशासन के बढ़ते डिजिटलीकरण के साथ केंद्रीकरण के साथ-साथ जवाबदेही भी आवश्यक है।
महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों में शामिल हैं:
- पारदर्शी और लेखापरीक्षण योग्य डिजिटल अभिलेख;
- स्वतंत्र प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा लेखापरीक्षण;
- गलत तरीके से हटाए गए नामों के समयबद्ध सुधार;
- वास्तविक त्रुटियों को सुधारने के लिए निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को पर्याप्त शक्तियाँ;
- सुलभ मतदाता शिकायत निवारण तंत्र; तथा
- स्वचालित या केंद्रीकृत प्रणालियों के माध्यम से लिए गए निर्णयों के लिए स्पष्ट जिम्मेदारी।
आगे की राह
- भारत की चुनावी व्यवस्था को ऐसे सिद्धांत का पालन करना चाहिए कि कोई भी अपात्र व्यक्ति चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर न कर सके, लेकिन किसी भी पात्र नागरिक को प्रशासनिक या तकनीकी विफलता के कारण भागीदारी से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
- सर्वोच्च न्यायालय के पास मतदान के अधिकार की संवैधानिक स्थिति पर पुनर्विचार करने का अवसर हो सकता है। तब तक, मतदाता सूचियों की सटीकता, संस्थागत पारदर्शिता और शिकायत निवारण को मजबूत करना आवश्यक है।
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