भारत की शहरी एवं ग्रामीण स्थानीय निकाय 

पाठ्यक्रम: GS2/शासन 

संदर्भ

  • भारत के तीव्र शहरीकरण ने शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) की कमजोर स्थिति को उजागर किया है।

वर्तमान स्थिति

  • पंचायती राज प्रणाली: इसे 1993 में 73वें संविधान संशोधन द्वारा लागू किया गया, जिसने स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक दर्जा दिया (भाग IX)। पंचायतें अनुच्छेद 243 के अंतर्गत राज्य विषय हैं और प्रत्येक राज्य इन्हें अपने कानूनों के माध्यम से संचालित करता है।
  • शहरी स्थानीय निकाय: 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 (नगरपालिका अधिनियम) ने संविधान में भाग IXA (अनुच्छेद 243P से 243ZG) जोड़ा, जिससे शहरी स्थानीय निकायों (नगरपालिकाओं) को संवैधानिक दर्जा मिला।
    • यह 1 जून 1993 को लागू हुआ और राज्यों के लिए संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार नगरपालिकाओं की स्थापना और संगठन करना अनिवार्य बना दिया।

महत्व

  • लोकतांत्रिक गहराई: स्थानीय सरकारें शासन को नागरिकों के निकट लाती हैं और निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।
    • स्थानीय निकाय विकेन्द्रीकृत शासन में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आवश्यकताओं को संबोधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • सेवा प्रदाय: ग्रामीण विकास में स्थानीय निकाय कल्याणकारी गतिविधियों, आधारभूत संरचना के रखरखाव और प्रशासनिक कार्यों का समर्थन करते हैं, जबकि शहरी स्थानीय निकाय स्वच्छता, जलापूर्ति, शिक्षा और शहरी आधारभूत संरचना जैसी आवश्यक सेवाओं का प्रबंधन करते हैं।
  • समावेशी विकास: स्थानीय सरकारें असमानताओं को कम करके, बुनियादी स्तर पर लोकतंत्र सुनिश्चित करके और नागरिकों को उच्च स्तर की सरकार से जोड़कर सामाजिक समावेशन, आर्थिक विकास एवं जनभागीदारी को बढ़ावा देती हैं।
  • यह महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण के माध्यम से हाशिये पर रहने वाले समूहों को सशक्त बनाती है।
  • आर्थिक भूमिका: स्थानीय सरकारें MGNREGA, AMRUT, स्मार्ट सिटी मिशन और स्वच्छ भारत अभियान जैसी योजनाओं को लागू करने में महत्वपूर्ण हैं।

प्रमुख समस्याएँ

  • प्रशासनिक कमजोरी और राज्य नियंत्रण: स्थानीय सरकारें राज्य सरकारों के अधीन रहती हैं, जिससे उनकी स्वायत्तता सीमित होती है और वे निर्भर बनी रहती हैं।
    • नगरपालिका निकायों के पास कर्मचारियों पर वास्तविक नियंत्रण नहीं होता क्योंकि राज्य सरकारें कार्मिक प्रबंधन करती हैं।
  • कमज़ोर स्टाफिंग और क्षमता: भारत में केवल लगभग 10% सरकारी कर्मचारी स्थानीय निकायों में कार्यरत हैं।
    • इसके विपरीत, अमेरिका और चीन जैसे देशों में लगभग दो-तिहाई सार्वजनिक कर्मचारी स्थानीय सरकारों में कार्यरत हैं।
  • वित्तीय निर्भरता: पंचायत राज संस्थाएँ और शहरी स्थानीय निकाय राज्य हस्तांतरण पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं; स्वयं का राजस्व सृजन कमजोर है।
  • शहरी स्थानीय निकाय GDP का केवल लगभग 0.3% कर के रूप में एकत्र करते हैं और GDP का 1% से भी कम खर्च करते हैं।
  • भूमि और संपत्ति कराधान की विफलता: भारत में भूमि और संपत्ति से राजस्व (~1% GDP) प्रतिबंधात्मक कानूनों, विखंडित स्वामित्व, अप्रभावी नीतियों एवं सार्वजनिक भूमि के खराब उपयोग के कारण कम है।
  • विकृत भूमि और किराया बाज़ार काले धन को बढ़ावा देते हैं और कर संग्रह व रियल एस्टेट में पारदर्शिता को कम करते हैं।

निष्कर्ष और आगे की राह

  • भारत में स्थानीय सरकारें लोकतंत्र को सुदृढ़ करने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक हैं।
  • स्थानीय सरकारें नागरिकों की निकट भागीदारी के माध्यम से स्थानीय मुद्दों की पहचान कर राष्ट्रीय विकास नीतियों को लागू करने में महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करती हैं।
  • यह आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण जैसी आवश्यक सेवाओं पर निर्णय-प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाती हैं, जिससे विकास में जनभागीदारी बढ़ती है।
  • हालाँकि, पर्याप्त वित्तीय विकेंद्रीकरण के बिना इसकी प्रभावशीलता सीमित रहती है।
  • स्थानीय निकायों को पर्याप्त धन, कार्य और प्रशिक्षित कार्मिकों के साथ सशक्त बनाना आवश्यक है ताकि वे सामाजिक-आर्थिक विकास के अधिक प्रभावी साधन बन सकें।

स्रोत :IE

 

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