महिला सशक्तिकरण के साधन के रूप में स्व-सहायता समूह 

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन

संदर्भ

  • ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) ने महिलाओं द्वारा संचालित ग्रामीण उद्यमों को सशक्त बनाने, बाज़ार तक पहुँच बढ़ाने और ग्रामीण आय में वृद्धि करने के लिए पूरे देश में SHE-MARTs (स्वयं-सहायता उद्यमी – ग्रामीण परिवर्तन के लिए विपणन के अवसर) स्थापित करने का रोडमैप तैयार किया है।

SHE-MARTs के बारे में

  • SHE-MARTs विकेन्द्रीकृत, महिला-नेतृत्व वाले ग्रामीण विपणन और उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जिनका उद्देश्य स्व-सहायता समूहों (SHGs) और महिला उत्पादक संगठनों द्वारा निर्मित उत्पादों को बाज़ार तक पहुँच, ब्रांडिंग सहयोग, एकत्रीकरण सुविधाएँ और खुदरा अवसर प्रदान करना है।
  • इस पहल का लक्ष्य ग्रामीण महिलाओं को आजीविका खोजने वाली से ग्रामीण उद्यमी और बाज़ार की अग्रणी बनाने का है।
  • SHE-MARTs की घोषणा केंद्रीय बजट 2026 में महिलाओं द्वारा संचालित ग्रामीण आर्थिक परिवर्तन की रणनीति के हिस्से के रूप में की गई थी।

स्व-सहायता समूह (SHGs) क्या हैं?

  • स्व-सहायता समूह छोटे स्वैच्छिक संगठन होते हैं, जिनमें सामान्यतः 10–20 सदस्य समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से होते हैं। ये बचत, ऋण, आजीविका गतिविधियों और सामूहिक सशक्तिकरण के लिए एकत्रित होते हैं।
  • SHGs आपसी विश्वास, सामूहिक जिम्मेदारी, नियमित बचत और लोकतांत्रिक भागीदारी के सिद्धांतों पर कार्य करते हैं।

महिला सशक्तिकरण में SHGs की भूमिका

  • वित्तीय समावेशन: SHGs महिलाओं को बचत, सूक्ष्म ऋण और औपचारिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुँच प्रदान कर सशक्त बनाते हैं।
  • राजनीतिक सशक्तिकरण: SHGs ग्राम सभाओं, पंचायतों और स्थानीय निर्णय-प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाते हैं।
  • सामाजिक सशक्तिकरण: SHGs स्वास्थ्य, शिक्षा और लैंगिक समानता पर अभियानों के माध्यम से महिलाओं की जागरूकता एवं सामाजिक भागीदारी को सुदृढ़ करते हैं।
  • शैक्षिक सशक्तिकरण: SHGs ग्रामीण समुदायों में साक्षरता, डिजिटल जागरूकता और बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देते हैं।
  • निर्णय लेने की शक्ति: SHGs महिलाओं की घरेलू और सामुदायिक स्तर पर निर्णय-प्रक्रियाओं में भागीदारी को सुदृढ़ करते हैं।

महिला-नेतृत्व वाले ग्रामीण उद्यमों को समर्थन देने वाली सरकारी पहलें

  • दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): यह SHGs, महिला संगठनों और ग्रामीण आजीविकाओं को वित्तीय एवं संस्थागत सहयोग प्रदान करता है।
  • लखपति दीदी पहल: इसका उद्देश्य SHGs से जुड़ी महिलाओं को कौशल विकास, उद्यम निर्माण, वित्तीय समावेशन और सतत आय सृजन के माध्यम से सफल ग्रामीण उद्यमी बनाना है।
  • नमो ड्रोन दीदी योजना: इस पहल के अंतर्गत 15,000 चयनित महिला SHGs को किसानों को किराये पर सेवाएँ देने हेतु ड्रोन उपलब्ध कराए जाते हैं। लाभार्थी महिलाओं को ड्रोन पायलट बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • SHG-बैंक लिंकज कार्यक्रम: NABARD द्वारा 1992 में शुरू किया गया यह कार्यक्रम भारत में महिला-नेतृत्व वाले SHGs के विस्तार में परिवर्तनकारी भूमिका निभा चुका है।

भारत में SHGs की सफलता की कहानियाँ

  • कुडुम्बश्री (केरल): यह विश्व के सबसे बड़े महिला सामुदायिक नेटवर्कों में से एक है, जो गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित है।
  • मिशन शक्ति (ओडिशा): इसने ओडिशा में महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों और SHG नेटवर्कों को सफलतापूर्वक बढ़ावा दिया है।
  • जीविका (बिहार): बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसाइटी (जीविका) ने ग्रामीण महिलाओं की आजीविका और वित्तीय समावेशन में सुधार किया है।
  • बीबी फ़ातिमा स्व-सहायता संघ (कर्नाटक): इस महिला-नेतृत्व वाली पहल ने 30 गाँवों में 5,000 से अधिक किसानों को बाजरा-आधारित बहु-फसल प्रणाली, बीज बैंक और सौर ऊर्जा आधारित प्रसंस्करण के माध्यम से सहयोग दिया है।

SHGs द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ

  • सीमित बाज़ार पहुँच: कई SHGs ब्रांडिंग, पैकेजिंग, परिवहन और बाज़ार एकीकरण में कठिनाइयों का सामना करती हैं।
  • अपर्याप्त वित्तीय साक्षरता: वित्तीय और डिजिटल साक्षरता की कमी प्रभावी उद्यम प्रबंधन को सीमित करती है।
  • सब्सिडी पर निर्भरता: कुछ SHGs सतत व्यवसाय मॉडल के बजाय सरकारी सहायता पर निर्भर रहती हैं।
  • लैंगिक और सामाजिक बाधाएँ: पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और गतिशीलता प्रतिबंध महिलाओं की भागीदारी को प्रभावित करते हैं।
  • कमज़ोर संस्थागत क्षमता: कई SHGs को मजबूत प्रबंधकीय, लेखा और तकनीकी क्षमताओं की आवश्यकता है।
  • ऋण संबंधी बाधाएँ: ऋण वितरण में देरी और बड़े पैमाने पर वित्तपोषण तक सीमित पहुँच विकास में बाधा डालती है।

आगे की राह

  • SHG महिला उद्यमियों के लिए सस्ती और समय पर संस्थागत ऋण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • बाज़ार संपर्क में सुधार: SHGs को ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, खुदरा श्रृंखलाओं और निर्यात बाज़ारों से जोड़ा जाना चाहिए।
    • डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन विपणन और प्रौद्योगिकी-आधारित व्यावसायिक प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी: सरकार, निजी क्षेत्र, NGOs और वित्तीय संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • स्व-सहायता समूह भारत में महिला सशक्तिकरण और समावेशी ग्रामीण विकास के लिए एक शक्तिशाली साधन बन गए हैं।
  • वित्तीय स्वतंत्रता, सामाजिक जागरूकता, नेतृत्व और उद्यमिता को बढ़ावा देकर SHGs ने लाखों ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को परिवर्तित किया है।

स्रोत: DD News

 

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