अल नीनो
पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल
संदर्भ
- भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने आधिकारिक रूप से भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो परिस्थितियों की शुरुआत की पुष्टि की है।
अल नीनो क्या है?
- अल नीनो मध्य-पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के समुद्री जल के असामान्य रूप से उष्ण होने की घटना है, जो प्रत्येक कुछ वर्षों के अंतराल पर घटित होती है।
- अल नीनो के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के सतही तापमान में वृद्धि होती है तथा व्यापारिक पवनें , जो भूमध्य रेखा के निकट पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती हैं, कमजोर पड़ जाती हैं।
- प्रभाव: अल नीनो के कारण उत्तरी अमेरिका और कनाडा में शुष्क एवं अपेक्षाकृत गर्म सर्दियाँ देखने को मिलती हैं।
- इससे अमेरिका के खाड़ी तटीय क्षेत्रों तथा दक्षिण-पूर्वी भागों में बाढ़ का जोखिम बढ़ जाता है।
- यह इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में सूखे की स्थिति उत्पन्न करता है।
- अल नीनो वाले वर्षों में भारत में सामान्यतः तापमान अधिक रहता है तथा वर्षा में कमी आती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- इसका प्रतिकूल प्रभाव कृषि, जल संसाधनों तथा पारिस्थितिक तंत्रों पर पड़ता है।

स्रोत: HT
एस्टोनिया
पाठ्यक्रम: GS1/समाचारों में स्थान
संदर्भ
- एस्टोनिया की सरकार तथा व्यावसायिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भारत के साथ रक्षा एवं व्यापार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने में अधिक रुचि व्यक्त की है।
परिचय
- एस्टोनिया उत्तर-पूर्वी यूरोप में स्थित एक देश है तथा यह तीन बाल्टिक देशों में सबसे उत्तरी देश है।
- एस्टोनिया के क्षेत्र में लगभग 1,500 द्वीप एवं टापू शामिल हैं।
- इनमें सारेमा और हियूमा सबसे बड़े द्वीप हैं, जो एस्टोनिया के मुख्य भूभाग के पश्चिमी तट से दूर स्थित हैं।
- इसके पूर्व में रूस तथा दक्षिण में लातविया स्थित है।

- आधिकारिक भाषा: एस्टोनियाई
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एस्टोनिया वर्ष 1991 तक सोवियत संघ का एक गणराज्य था।
- वर्ष 1991 में अन्य बाल्टिक देशों के साथ इसने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।
- इसके पश्चात इसने व्यापक यूरोपीय एकीकरण की दिशा में कदम बढ़ाए तथा वर्ष 2004 में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) और यूरोपीय संघ (EU) का सदस्य बना।
- विशेषताएँ: एस्टोनिया को विश्व के सर्वाधिक डिजिटल रूप से उन्नत देशों में से एक माना जाता है।
- यहाँ व्यापक स्तर पर ऑनलाइन सार्वजनिक सेवाएँ तथा इलेक्ट्रॉनिक मतदान की व्यवस्था उपलब्ध है।
स्रोत: TH
प्रोजेक्ट कुशा
पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा
संदर्भ
- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वदेशी प्रोजेक्ट कुशा वायु रक्षा प्रणाली को भारत की सुरक्षा संरचना के लिए एक संभावित गेम-चेंजर बताया है।
प्रोजेक्ट कुशा क्या है?
- प्रोजेक्ट कुशा एक दीर्घ-मार्गी स्वदेशी सतह-से-वायु प्रक्षेपास्त्र प्रणाली है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित किया जा रहा है।
- इसका उद्देश्य विभिन्न प्रकार के हवाई खतरों के विरुद्ध बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रदान करना है।
- यह प्रणाली रूस की उन्नत एस-400 ट्रायम्फ जैसी प्रणालियों की क्षमता के समकक्ष विकसित की जा रही है।
- इंटरसेप्टर संस्करण:
- M1 इंटरसेप्टर: लगभग 150 किमी की मारक क्षमता।
- M2 इंटरसेप्टर: लगभग 250 किमी की मारक क्षमता।
- M3 इंटरसेप्टर: लगभग 350–400 किमी की मारक क्षमता।
- क्षमताएँ: यह प्रणाली निम्नलिखित खतरों का मुकाबला करने में सक्षम होगी—
- लड़ाकू विमान, जिनमें स्टील्थ विमान भी शामिल हैं।
- ड्रोन।
- क्रूज़ मिसाइलें।
- सटीक-निर्देशित आयुध ।
- कुछ प्रकार की बैलिस्टिक मिसाइलें।
- मिशन सुदर्शन चक्र से संबंध: यह परियोजना “मिशन सुदर्शन चक्र” से भी जुड़ी हुई है।
- इस पहल का उद्देश्य वर्ष 2035 तक भारत के लिए एक बहु-स्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा कवच विकसित करना है।
- विकास की वर्तमान स्थिति: वर्ष 2023 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने भारतीय वायुसेना के लिए पाँच स्क्वाड्रनों की खरीद हेतु आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) प्रदान की थी।
- इसके परिचालन तैनाती की संभावना 2028 से 2030 के बीच व्यक्त की गई है।
स्वदेशी एआई मॉडल ‘वार्या’ (Varya)
पाठ्यक्रम: GS3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- इंडियाएआई मिशन के समर्थन से अवतार (Avataar) द्वारा विकसित स्वदेशी एआई-संचालित वीडियो जनरेशन मॉडल ‘वार्या’ (Varya) का शुभारंभ किया गया है।
वार्या (Varya) क्या है?
- वार्या एक डिस्टिल्ड वीडियो जनरेशन मॉडल है, जो पाठ्य प्रॉम्प्ट तथा चित्रों को वीडियो में परिवर्तित करता है।
- मॉडल डिस्टिलेशन एक मशीन लर्निंग तकनीक है, जिसमें एक बड़े एआई मॉडल के आउटपुट का उपयोग करके एक छोटे एआई मॉडल को प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि वह कम संगणनात्मक लागत, तीव्र प्रसंस्करण तथा कम ऊर्जा खपत के साथ समान प्रदर्शन प्रदान कर सके।
- इसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों, त्योहारों, परंपराओं, परिधानों, खाद्य संस्कृति तथा दैनिक जीवन को प्रतिबिंबित करने वाली सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक दृश्य सामग्री उत्पन्न करने के लिए विकसित किया गया है।
- यह मंच “आइडिया से वीडियो और वीडियो से कहानी” कार्यप्रवाह का अनुसरण करता है, जिससे उपयोगकर्ता सरल प्रॉम्प्ट के माध्यम से दृश्य कथाओं का निर्माण एवं विस्तार कर सकते हैं।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- वीडियो निर्माण के चरणों को 50 से घटाकर मात्र 4 कर देता है, जिससे दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
- अनुमानित रूप से ₹0.48 प्रति सेकंड की लागत पर वीडियो तैयार करता है।
- दावा किया गया है कि यह कई प्रमुख वैश्विक वीडियो-जनरेशन मॉडलों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक लागत-कुशल है।
स्रोत: AIR
निकोबार के पश्चिमी तट पर प्रवाल (Coral) स्थानांतरण हेतु चार स्थलों की पहचान
पाठ्यक्रम: GS3 / पर्यावरण
संदर्भ
- ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) मेगा परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित गलाथिया खाड़ी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह के निर्माण से प्रभावित होने वाले प्रवाल उपनिवेशों) तथा विशाल शंखों को पश्चिमी तट के चार स्थलों पर स्थानांतरित किया जाएगा।
ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना
- इस परियोजना को वर्ष 2022 में चरण-I स्वीकृति प्राप्त हुई थी।
- कार्यान्वयन एजेंसी: पोर्ट ब्लेयर स्थित अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम लिमिटेड (ANIIDCO)।
- परियोजना के अंतर्गत निम्नलिखित अवसंरचनाओं का विकास प्रस्तावित है:
- अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT)
- अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
- टाउनशिप विकास
- 450 MVA क्षमता का गैस एवं सौर ऊर्जा आधारित विद्युत संयंत्र
- ICTT तथा विद्युत संयंत्र के लिए चयनित स्थल ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिण-पूर्वी कोने में स्थित गलाथिया खाड़ी है, जहाँ कोई मानव बस्ती नहीं है।
प्रवाल क्या हैं?
- प्रवाल अकशेरुकी जीव हैं, जो निडेरिया नामक बड़े जीव समूह से संबंधित हैं।
- प्रवाल अनेक छोटे एवं कोमल जीवों, जिन्हें पॉलिप कहा जाता है, से मिलकर बनते हैं।
- ये अपनी सुरक्षा के लिए अपने चारों ओर कैल्शियम कार्बोनेट का कठोर बाह्य कंकाल निर्मित करते हैं।
- लाखों सूक्ष्म पॉलिपों द्वारा निर्मित विशाल कार्बोनेट संरचनाएँ ही प्रवाल भित्तियाँ कहलाती हैं।
- स्वरूप एवं रंग: प्रवालों का रंग लाल, बैंगनी तथा नीला तक हो सकता है, किन्तु सामान्यतः ये भूरे एवं हरे रंग के होते हैं।
- उनकी चमक एवं रंगीनता का मुख्य कारण जूक्सैन्थेली नामक सूक्ष्म शैवाल होते हैं।
- प्रवाल भित्तियों के प्रकार:
- फ्रिंजिंग रीफ – तटरेखा के साथ विकसित होती हैं।
- बैरियर रीफ – खुले समुद्री जल में विकसित होती हैं।
- एटोल – डूबे हुए ज्वालामुखियों के चारों ओर निर्मित वृत्ताकार प्रवाल भित्तियाँ।
- भारत में प्रवाल भित्तियों का वितरण:
- कच्छ की खाड़ी
- मन्नार की खाड़ी
- अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह
- लक्षद्वीप द्वीप समूह
- मालवन (महाराष्ट्र)
- महत्व: प्रवाल भित्तियाँ समुद्री जैव विविधता का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार हैं। वे विश्व के लगभग एक-चौथाई समुद्री जीवों को भोजन, आश्रय, विश्राम एवं प्रजनन स्थल उपलब्ध कराती हैं।
- ये महत्वपूर्ण जैव विविधता की रक्षा हेतु नर्सरी एवं शरणस्थली के रूप में कार्य करती हैं।
- विश्वभर के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले 1 अरब से अधिक लोगों को भोजन, आजीविका एवं मनोरंजन के अवसर प्रदान करने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
स्रोत: IE
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