भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर अपर्याप्त व्यय

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर कम व्यय किसी एक कारण का परिणाम नहीं है, बल्कि यह प्रणालीगत, ऐतिहासिक, वित्तीय तथा सांस्कृतिक कारकों की परस्पर क्रिया का संयुक्त प्रभाव है।

R&D पर कम व्यय के कारण

  • विशाल घरेलू बाज़ार और सीमित प्रतिस्पर्धात्मक दबाव:: भारत का विशाल घरेलू बाज़ार कंपनियों को तीव्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना किए बिना विकसित होने की अनुमति देता है। इससे जोखिमपूर्ण और महंगी अग्रणी नवाचार गतिविधियों में निवेश करने की प्रेरणा कम हो जाती है।
  • औपनिवेशिक विमुद्योगीकरण की ऐतिहासिक विरासत: औपनिवेशिक नीतियों ने स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं को कमजोर किया तथा व्यापार-केंद्रित व्यावसायिक संस्कृति को प्रोत्साहन दिया। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के कारण नवाचार-आधारित विनिर्माण पर अपेक्षाकृत कम बल दिया गया।
  • कॉर्पोरेट क्षेत्र का समयपूर्व वित्तीयकरण: अनेक कंपनियाँ दीर्घकालिक निवेशों, जैसे R&D, की अपेक्षा अल्पकालिक वित्तीय प्रतिफलों को प्राथमिकता देती हैं। शेयरधारकों का दबाव तथा तिमाही प्रदर्शन पर अत्यधिक ध्यान नवाचार संबंधी व्यय को हतोत्साहित करता है।
  • उच्च अनिश्चितता और जोखिम से बचाव की प्रवृत्ति: दीर्घावधि वाले R&D परियोजनाओं में विनियामक व्यवस्था, बाज़ार तथा प्रतिफल से जुड़ी अनिश्चितताएँ होती हैं। परिणामस्वरूप व्यवसाय भविष्य के लाभों का मूल्यांकन उच्च छूट दर से करते हैं और अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेशों को प्राथमिकता देते हैं।
  • उद्योगों की सीमित भागीदारी: भारत का सकल घरेलू अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.6–0.7% बना हुआ है, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान प्रमुख नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अत्यंत कम है।

भारत में R&D व्यय

  • भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) GDP के लगभग 0.6% से 0.7% के बीच रहा है, जो वैश्विक औसत से कम है तथा चीन, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में काफी निम्न स्तर पर है।
  • इसका एक प्रमुख कारण भारत के निजी क्षेत्र का अपेक्षाकृत कम निवेश है, जिसका योगदान केवल लगभग 36% है, जबकि उपर्युक्त देशों में निजी क्षेत्र का योगदान 70% से अधिक है।
  • कुल R&D व्यय में केंद्र सरकार का योगदान लगभग 43.7% है।

R&D में निवेश की आवश्यकता

  • आर्थिक विकास: नए उद्योगों के विकास, उत्पादकता में वृद्धि तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करने में सहायता करता है।
  • तकनीकी प्रगति: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जैव-प्रौद्योगिकी तथा नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण नवाचारों एवं उपलब्धियों को प्रोत्साहित करता है।
  • सामाजिक चुनौतियों का समाधान: निर्धनता, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा पर्यावरणीय स्थिरता जैसी समस्याओं के समाधान में सहायक होता है।
  • रोजगार सृजन: नवाचार नए रोजगार अवसर उत्पन्न करता है तथा उद्यमिता को प्रोत्साहित करता है।
  • वैश्विक प्रतिष्ठा: भारत को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व प्रदान करने में सहायक होता है।
  • निवेश आकर्षण: अनुसंधान-आधारित क्षेत्रों में घरेलू एवं विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देता है।

सरकारी पहलें 

  • अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) योजना: ₹1 लाख करोड़ के कोष के साथ स्वीकृत इस योजना का उद्देश्य निजी क्षेत्र के R&D तथा डीप-टेक स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करना है।
    • यह योजना दीर्घकालिक, कम अथवा शून्य ब्याज दर वाले ऋण, इक्विटी निवेश तथा अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के माध्यम से एक नए डीप-टेक फंड ऑफ फंड्स को वित्तपोषित करती है।
  • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF): वर्ष 2023 में स्थापित ANRF विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता के लिए उच्च स्तरीय रणनीतिक दिशा प्रदान करता है।
    • इसका लक्ष्य 2023–28 की अवधि में विभिन्न स्रोतों—ANRF फंड, इनोवेशन फंड, विज्ञान एवं अभियांत्रिकी अनुसंधान फंड तथा विशेष प्रयोजन निधियों—के माध्यम से ₹50,000 करोड़ एकत्रित करना है।
  • राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति, 2022: इस नीति का उद्देश्य वर्ष 2035 तक भारत को भू-स्थानिक क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी बनाना है।
    • यह नीति भू-स्थानिक डेटा तक पहुँच को उदार बनाती है, जिससे शासन, व्यवसाय और अनुसंधान में इसके उपयोग को प्रोत्साहन मिलता है।
  • भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: यह नीति वर्ष 2020 में आरंभ किए गए अंतरिक्ष सुधारों को आगे बढ़ाती है, जिनके अंतर्गत गैर-सरकारी संस्थाओं को अंतरिक्ष क्षेत्र में पूर्ण भागीदारी की अनुमति दी गई थी।
    • इसका उद्देश्य अंतरिक्ष क्षमताओं का विस्तार करना, एक सशक्त वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग विकसित करना तथा सार्वजनिक और निजी संस्थाओं के बीच सहयोग को प्रोत्साहन देना है।
  • राष्ट्रीय क्वांटम मिशन: वर्ष 2023–31 के लिए ₹6,003.65 करोड़ के आवंटन के साथ यह मिशन वैज्ञानिक एवं औद्योगिक R&D के माध्यम से क्वांटम प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्साहन देता है।
  • बायोE3 नीति, 2024: यह नीति जैव-विनिर्माण) तथा बायो-AI हब्स की स्थापना और राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क के विकास को प्रोत्साहित करती है, ताकि प्रौद्योगिकी विकास एवं व्यावसायीकरण की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।
  • राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM): वर्ष 2015 में प्रारंभ इस मिशन का उद्देश्य विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों तथा सरकारी एजेंसियों को अत्याधुनिक सुपरकंप्यूटिंग प्रणालियों से सशक्त बनाना है, जिन्हें राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क से जोड़ा गया है।
  • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM): वर्ष 2021 में स्थापित इस मिशन का उद्देश्य सेमीकंडक्टर एवं डिस्प्ले विनिर्माण के लिए एक सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
    • भारत ने पहले ही छह राज्यों में 10 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान कर दी है, जिनमें ओडिशा में स्थापित होने वाली प्रथम वाणिज्यिक सिलिकॉन कार्बाइड निर्माण इकाई भी शामिल है।
  • इंडिया AI मिशन: “भारत में AI का निर्माण और भारत के लिए AI का उपयोग” की परिकल्पना पर आधारित यह मिशन तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है।
    • इसने अपनी प्रारंभिक 10,000 GPU क्षमता के लक्ष्य को बढ़ाकर 38,000 GPU तक पहुँचाया है, जिससे स्टार्टअप्स, शोधकर्ताओं और उद्योगों के लिए AI अवसंरचना अधिक सुलभ हो रही है।
  • अटल नवाचार मिशन (AIM): इसका उद्देश्य छात्रों, स्टार्टअप्स और उद्यमियों को सहयोग प्रदान कर बुनियादी स्तर पर नवाचार को प्रोत्साहित करना है।
  • उच्च उपज वाले बीजों पर राष्ट्रीय मिशन: यह मिशन अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने तथा उच्च उत्पादकता, कीट-प्रतिरोधी एवं जलवायु-अनुकूल बीजों के विकास पर केंद्रित होगा।
    • यह जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के कृषि जैव-प्रौद्योगिकी संबंधी प्रयासों के अनुरूप कार्य करेगा।

Source: IE

 

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