भारत के परिवर्तित होते मौसमीय प्रतिरूपों की समझ 

पाठ्यक्रम: GS1/ भौगोलिक परिघटनाएँ

संदर्भ

  • भारत में पश्चिमी विक्षोभ, एल नीनो और ला नीना जैसी जलवायु संबंधी घटनाओं के कारण असमय वर्षा, हीट वेव तथा अत्यधिक आर्द्रता जैसी चरम मौसमी परिस्थितियाँ लगातार बढ़ रही हैं। ये घटनाएँ देश के मानसून, कृषि तथा जनस्वास्थ्य को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हैं।

हीट वेव (लू) क्या है?

  • हीट वेव वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र का तापमान सामान्य से अत्यधिक अधिक हो जाता है। इसका निर्धारण विभिन्न क्षेत्रों के ऐतिहासिक तापमान के आधार पर किया जाता है।
  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार हीट वेव घोषित करने के लिए निम्नलिखित मानदंड निर्धारित हैं—
    • मैदानी क्षेत्रों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस (°C) से अधिक हो।
    • तटीय क्षेत्रों में तापमान 37°C से अधिक हो।
    • पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान 30°C से अधिक हो।

“फील्स लाइक” तापमान, हीट इंडेक्स तथा विंड चिल इंडेक्स

  • “फील्स लाइक” तापमान: “फील्स लाइक” अथवा आभासी तापमान में वायु की गति और आर्द्रता दोनों को ध्यान में रखकर यह निर्धारित किया जाता है कि बाहरी तापमान मानव शरीर को वास्तव में कितना महसूस होगा।
  • हीट इंडेक्स : हीट इंडेक्स आभासी तापमान का एक प्रकार है, जो वास्तविक तापमान और सापेक्षिक आर्द्रता को मिलाकर यह मापता है कि मानव शरीर को कितनी गर्मी महसूस होती है।
  • विंड चिल इंडेक्स : विंड चिल इंडेक्स भी आभासी तापमान का एक प्रकार है, जिसमें तापमान और वायु की गति दोनों को सम्मिलित किया जाता है।
    •  यह बताता है कि तीव्र वायु के कारण त्वचा को वास्तव में कितनी ठंड महसूस होती है, क्योंकि वायु शरीर द्वारा उत्पन्न गर्म वायु की पतली परत को हटाकर शरीर की ऊष्मा को कम कर देती है।

वेट बल्ब तापमान और ड्राई बल्ब तापमान

  • वेट बल्ब तापमान : वेट बल्ब तापमान वह न्यूनतम तापमान है जो वाष्पीकरण की प्रक्रिया द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। यह ताप और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव को दर्शाता है।
    • महत्व: मानव शरीर पसीने और उसके वाष्पीकरण के माध्यम से स्वयं को ठंडा करता है। अधिक आर्द्रता वाष्पीकरण की प्रक्रिया को कम प्रभावी बना देती है, जिससे शरीर को ठंडा रखना कठिन हो जाता है।
  • ड्राई बल्ब तापमान : ड्राई बल्ब तापमान वह वास्तविक वायु तापमान है जिसे सामान्य थर्मामीटर द्वारा मापा जाता है।
    •  यह वायुमंडलीय आर्द्रता को ध्यान में नहीं रखता।

पश्चिमी विक्षोभ क्या है?

  • पश्चिमी विक्षोभ एक अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय मौसम प्रणाली है, जिसका उद्गम भारत के बाहर होता है और जो पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बढ़ती है। यह भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भागों में विशेषकर शीत ऋतु और प्रारंभिक वसंत के दौरान वर्षा, हिमपात और तूफान लाती है।
  • उत्पत्ति और निर्माण: पश्चिमी विक्षोभ का उद्गम भूमध्यसागरीय क्षेत्र, काला सागर अथवा कैस्पियन सागर के आसपास होता है।
    • इनका निर्माण तब होता है जब ठंडी ध्रुवीय वायु गर्म एवं आर्द्र वायु के संपर्क में आती है, जिससे निम्न दाब प्रणाली बनती है।
    • ये प्रणालियाँ ऊपरी वायुमंडल की पश्चिमी पवनों, विशेषकर उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम, द्वारा पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं।
  • भारत में प्रभावित क्षेत्र: जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश।
  • पश्चिमी विक्षोभ का महत्व: उत्तर-पश्चिम भारत (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड) में वार्षिक वर्षा का लगभग 30% भाग शीतकाल में प्राप्त होता है, जो मुख्यतः पश्चिमी विक्षोभ से संबंधित होता है।
    • पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा हिमालयी जलवायु, हिमनदों, हिम-जल भंडारण, वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, कृषि फसलों तथा मानव जीवन को प्रभावित करती है।
    • पश्चिमी विक्षोभ से प्राप्त शीतकालीन वर्षा रबी फसलों, विशेषकर गेहूँ, सरसों और जौ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्याप्त वर्षा से मृदा की आर्द्रता, फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा में वृद्धि होती है।

ENSO (एल नीनो-दक्षिणी दोलन) क्या है?

  • ENSO भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतही तापमान तथा वायुमंडलीय दाब में होने वाला आवधिक परिवर्तन है। इसके दो विपरीत चरण होते हैं— एल नीनो और ला नीना।
  • ENSO भारतीय मानसून, चक्रवातीय गतिविधियों, सूखा-बाढ़ तथा वैश्विक तापमान परिवर्तनशीलता को प्रभावित करता है।

एल नीनो (El Niño) क्या है?

  • एल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य-पूर्वी भाग में समुद्री जल के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति है, जो प्रत्येक कुछ वर्षों में उत्पन्न होती है।
  • एल नीनो के दौरान—
    • भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र का सतही तापमान बढ़ जाता है।
    • व्यापारिक पवनें (Trade Winds), जो भूमध्य रेखा के निकट पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती हैं, कमजोर पड़ जाती हैं।

ला नीना (La Niña) क्या है?

  • ला नीना, एल नीनो की विपरीत स्थिति है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है।
    • व्यापारिक पवनें सामान्य से अधिक सुदृढ़ हो जाती हैं।
    • ये गर्म जल को एशिया की ओर धकेलती हैं।
  • प्रभाव: इसके परिणामस्वरूप दक्षिणी अमेरिका में शुष्क परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जबकि कनाडा में भारी वर्षा होती है। यह ऑस्ट्रेलिया में भीषण बाढ़ से भी जुड़ी रही है।

भारतीय मानसून पर इसका प्रभाव

  • एल नीनो का प्रभाव: एल नीनो के वर्षों में भारत में तापमान अधिक तथा वर्षा कम होती है, जिससे कई क्षेत्रों में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
    •  इसका प्रभाव कृषि, जल संसाधनों तथा पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
    • एल नीनो की घटना के कारण वर्ष 2023-24 (जुलाई-जून) की फसल अवधि में खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 1.4% की कमी दर्ज की गई।
  • ला नीना का प्रभाव: ला नीना समुद्र सतह के तापमान को कम करती है, जिसके परिणामस्वरूप भारत के कुछ भागों में अधिक वर्षा होती है।

आगे की राह

  • भारत को जलवायु पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ करना चाहिए।
  • जलवायु-सहिष्णु कृषि तथा जल संरक्षण उपायों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • शहरी नियोजन में हरित अवसंरचना तथा ताप-नियंत्रण रणनीतियों को सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  • लू से संबंधित स्वास्थ्य जोखिमों तथा आपदा तैयारी के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।

Source: IE

 

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