पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत सरकार अपने वर्ष 2016 के मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) में संशोधन कर रही है, ताकि इसे निवेशकों के लिए अधिक अनुकूल बनाया जा सके, साथ ही भारत की नियामकीय संप्रभुता एवं विधिक व्यवस्था की रक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) क्या है?
- द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) दो देशों के बीच किया गया एक ऐसा समझौता है, जिसका उद्देश्य एक देश के निवेशकों द्वारा दूसरे देश में किए गए निवेशों को प्रोत्साहित एवं संरक्षित करना होता है।
- यह निवेशकों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है, जैसे—अधिग्रहण से संरक्षण, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत व्यवहार तथा विवाद निपटान तंत्र।
- BIT का उद्देश्य निवेशकों का विश्वास बढ़ाना तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को प्रोत्साहित करना है।
द्विपक्षीय निवेश संधियों की प्रमुख विशेषताएँ
- राष्ट्रीय उपचार: विदेशी निवेशकों को घरेलू निवेशकों की तुलना में कम अनुकूल व्यवहार नहीं दिया जाता।
- अधिग्रहण के विरुद्ध संरक्षण : निवेशों का राष्ट्रीयकरण अथवा अधिग्रहण विधिसम्मत प्रक्रिया एवं उचित मुआवज़े के बिना नहीं किया जा सकता।
- निष्पक्ष एवं न्यायसंगत व्यवहार (FET): निवेशकों को मेजबान राज्य द्वारा मनमाने अथवा भेदभावपूर्ण कार्यों से संरक्षण प्रदान किया जाता है।
- निधियों के स्वतंत्र हस्तांतरण की सुविधा: निवेशक लागू विनियमों के अधीन लाभ, लाभांश एवं पूंजी को सीमा-पार स्थानांतरित कर सकते हैं।
- विवाद निपटान तंत्र : यह निवेशकों एवं मेजबान राज्यों अथवा राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों के समाधान हेतु प्रक्रियाएँ उपलब्ध कराता है।
BIT के क्षेत्र में भारत की प्रगति
- भारत के BIT ढाँचे का विकास: भारत ने अपना प्रथम मॉडल BIT वर्ष 1993 में हस्ताक्षरित किया था, जिसमें वर्ष 2003 में संशोधन किया गया।
- कई अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता विवादों के पश्चात भारत ने दिसंबर 2015 में एक नया मॉडल BIT अपनाया, जो वर्ष 2016 से प्रभावी हुआ।
- हाल के विकास: भारत ने बेलारूस, किर्गिज़ गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान तथा ब्राज़ील (निवेश सहयोग एवं सुविधा संधि के माध्यम से) जैसे देशों के साथ BIT अथवा निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
- वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में सरकार ने BIT ढाँचे की समीक्षा करने की घोषणा की, ताकि इसे निवेशकों के लिए अधिक अनुकूल बनाया जा सके तथा राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
प्रस्तावित नए BIT मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ
- स्थानीय उपायों के उपयोग की दो-वर्षीय अनिवार्यता: विदेशी निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता आरंभ करने से पूर्व कम-से-कम दो वर्षों तक भारत की घरेलू न्यायिक प्रणाली के अंतर्गत उपलब्ध उपायों का उपयोग करना होगा।
- कुछ साझेदार देशों के साथ वार्ताओं के दौरान एक वर्ष की अपेक्षाकृत कम ‘कूलिंग-ऑफ अवधि’ पर भी विचार किया जा सकता है।
- मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) प्रावधान का अभाव: संशोधित मॉडल में मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) प्रावधान को सम्मिलित किए जाने की संभावना नहीं है।
- MFN प्रावधान निवेशकों को भारत द्वारा अन्य देशों के साथ की गई संधियों में उपलब्ध अधिक अनुकूल व्यवहार का दावा करने की अनुमति देता है।
- सरकार का मानना है कि इस प्रावधान को हटाने से ‘ट्रीटी-शॉपिंग’ तथा कानूनी अनिश्चितताओं में कमी आएगी।
- कराधान संबंधी मामलों को बाहर रखना: कराधान से संबंधित विवाद निवेश संधियों के दायरे से बाहर रहेंगे।
- यह दृष्टिकोण वोडाफोन समूह तथा कैर्न एनर्जी जैसी विदेशी कंपनियों से जुड़े पूर्व मध्यस्थता मामलों से प्रभावित है।
- सरकार का मत है कि कराधान एक संप्रभु नीतिगत विषय है और इसे निवेशक-राज्य मध्यस्थता के अधीन नहीं होना चाहिए।
प्रमुख चिंताएँ
- निवेशकों की चिंताएँ: अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से पूर्व स्थानीय उपायों के उपयोग की अनिवार्यता से लागत एवं समय दोनों बढ़ सकते हैं।
- न्यायिक प्रक्रियाओं में होने वाली देरी विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित कर सकती है।
- MFN प्रावधान के अभाव में निवेशकों को अन्य संधियों के अंतर्गत उपलब्ध संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकेगा।
- भारत की चिंताएँ: निवेशकों को अत्यधिक अधिकार प्रदान किए जाने से वैध सार्वजनिक नीतिगत उपायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) तंत्र संप्रभु नियामकीय निर्णयों को चुनौती दे सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के निर्णय सरकारों पर भारी वित्तीय दायित्व आरोपित कर सकते हैं।
निवेश विवाद निपटान में वैश्विक प्रवृत्तियाँ
- पारंपरिक ISDS से दूरी : विश्व के अनेक देश पारंपरिक निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) तंत्र पर पुनर्विचार कर रहे हैं।
- उदाहरणार्थ, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संपन्न BIT में ISDS के स्थान पर राज्य-से-राज्य विवाद निपटान (SSDS) व्यवस्था को अपनाया गया है।
- SSDS के अंतर्गत विवादों का समाधान सीधे निवेशकों और मेजबान राज्यों के बीच न होकर संबंधित सरकारों के बीच किया जाता है।
आगे की राह
- ऐसा संतुलित BIT ढाँचा अपनाया जाए जो निवेशकों के हितों की रक्षा करने के साथ-साथ भारत की नियामकीय संप्रभुता एवं नीतिगत स्वतंत्रता को भी सुरक्षित रखे।
- घरेलू कानूनी संस्थाओं में निवेशकों का विश्वास बढ़ाने हेतु वाणिज्यिक न्यायालयों तथा अनुबंध प्रवर्तन व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए।
- पारदर्शी एवं सुसंगत नीतिनिर्माण के माध्यम से नियामकीय स्थिरता तथा नीतिगत पूर्वानुमेयता सुनिश्चित की जाए।
- महंगी मध्यस्थता प्रक्रियाओं के विकल्प के रूप में मध्यस्थता, सुलह तथा राज्य-से-राज्य विवाद निपटान तंत्र को प्रोत्साहित किया जाए।
Source: IE
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संक्षिप्त समाचार 08-06-2026