संक्षिप्त समाचार 08-06-2026

मानव तस्करी से बचे पीड़ितों के लिए उच्चतम न्यायालय की पीड़ित संरक्षण योजना

पाठ्यक्रम: जीएस-2/ राजव्यवस्था एवं शासन 

सन्दर्भ

  • उच्चतम न्यायालय ने प्रज्वला बनाम भारत संघ मामले में वाणिज्यिक एवं यौन शोषण (CSE) हेतु मानव तस्करी से बचे पीड़ितों के लिए एक व्यापक पीड़ित संरक्षण योजना तैयार की।
  • न्यायालय ने यह कदम विधायी रिक्तता (Legislative Vacuum) तथा अपर्याप्त पुनर्वास व्यवस्था का उल्लेख करते हुए उठाया।

पीड़ित संरक्षण योजना के प्रमुख तत्व

1. पुनर्वास का मौलिक अधिकार

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुनर्वास का अधिकार, अनुच्छेद 21 (गरिमामय जीवन का अधिकार) तथा अनुच्छेद 23 का अभिन्न अंग है।
  • न्यायालय ने बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ तथा नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल बचाव (Rescue) पर्याप्त नहीं है; पुनर्वास न्याय का अनिवार्य हिस्सा है।

2. सहमति-आधारित दृष्टिकोण

  • न्यायालय ने बलपूर्वक तस्करी के शिकार व्यक्तियों और सहमति से यौन कार्य करने वाले वयस्कों के बीच स्पष्ट अंतर किया।
  • न्यायालय ने कहा कि सहमति से यौन कार्य करने वाले वयस्कों को उनकी इच्छा के विरुद्ध हिरासत में नहीं रखा जा सकता और न ही उनका जबरन पुनर्वास किया जा सकता है।

3. संस्थागत समन्वय

  • इस निर्णय में किशोर न्याय अधिनियम तथा पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों को एक समान प्रोटोकॉल में समाहित किया गया है।

इससे निम्न संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित होने की अपेक्षा है—

  • बाल कल्याण समितियाँ (CWCs)
  • मानव तस्करी निरोधक इकाइयाँ (AHTUs)
  • जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSAs)

4. संस्थागत सहायता अवसंरचना

केंद्र एवं राज्य सरकारों को निम्न सुविधाओं की मानकीकृत व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश दिया गया है—

  • सुरक्षित आश्रय गृह (Safehouses),
  • निःशुल्क विधिक सहायता,
  • चिकित्सीय एवं मनोवैज्ञानिक देखभाल सुविधाएँ,
  • व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम । 
  • इसका उद्देश्य पीड़ितों के सामाजिक पुनर्वास और आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित करना है।

स्रोत : IE

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM)

पाठ्यक्रम : जीएस-2/शासन 

सन्दर्भ

  • प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की एक बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें सदस्यों ने अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने और उसे तेज़ करने के उपायों पर चर्चा की।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM)

  • प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) एक स्वतंत्र निकाय है, जिसका गठन प्रधानमंत्री को आर्थिक एवं संबंधित विषयों पर परामर्श देने के लिए किया गया है।
  • वर्तमान में इसकी अध्यक्षता एस. महेंद्र देव कर रहे हैं।
  • संरचना:वर्तमान में EAC-PM में एक अध्यक्ष, 3 पूर्णकालिक सदस्य तथा 11 अंशकालिक सदस्य हैं।
  • कार्य:प्रधानमंत्री द्वारा संदर्भित किसी भी आर्थिक अथवा अन्य विषय का विश्लेषण करना और उस पर परामर्श देना।
  • व्यापक आर्थिक (Macroeconomic) महत्त्व के मुद्दों पर सुझाव प्रदान करना।

परिषद निम्न प्रकार से विषयों पर विचार कर सकती है:

  • स्वप्रेरणा (Suo Motu) से, अथवा
  • प्रधानमंत्री या किसी अन्य स्रोत द्वारा संदर्भित विषयों पर।
  • समय-समय पर प्रधानमंत्री द्वारा सौंपे गए अन्य कार्यों का निर्वहन करना।

स्रोत: PIB

पीएम ई-ड्राइव

पाठ्यक्रम: जीएस-3/ ऊर्जा /पर्यावरण 

सन्दर्भ

  • दिल्ली सरकार ने सार्वजनिक परिवहन को सुदृढ़ बनाने तथा सतत शहरी गतिशीलता की दिशा में संक्रमण को तेज़ करने के लिए पीएम इलेक्ट्रिक ड्राइव रिवोल्यूशन इन इनोवेटिव व्हीकल एन्हांसमेंट (PM E-DRIVE) योजना के अंतर्गत 2,800 नई निम्न-फर्श (Low-Floor) विद्युत बसों को शामिल करने की घोषणा की है।

परिचय

पीएम ई-ड्राइव योजना भारत सरकार द्वारा वर्ष 2024 में विद्युत गतिशीलता (Electric Mobility) को बढ़ावा देने हेतु प्रारम्भ की गई थी।

इस योजना का कुल वित्तीय परिव्यय ₹10,900 करोड़ है।

  • अवधि:प्रारम्भ में यह योजना दो वर्षों (2024–26) के लिए स्वीकृत की गई थी।
  • अब इसकी अवधि को बढ़ाकर 31 मार्च 2028 तक कर दिया गया है, जबकि कुल परिव्यय यथावत रखा गया है।

उद्देश्य

  • देशभर में विद्युत वाहनों (EVs) को अपनाने की गति को बढ़ाना।
  • सुदृढ़ ईवी चार्जिंग अवसंरचना का विकास करना।
  • घरेलू विद्युत वाहन विनिर्माण पारितंत्र को मजबूत बनाना।
  • जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना तथा वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को घटाना।
  • चरणबद्ध विनिर्माण कार्यक्रम (PMP) के माध्यम से मेक इन इंडिया पहल को प्रोत्साहित करना।

प्रमुख विशेषताएँ

यह योजना 40 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नौ प्रमुख शहरों में 14,028 विद्युत बसों की खरीद को समर्थन प्रदान करती है।

योजना का उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन को अधिक स्वच्छ, ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल बनाना है।

स्रोत : IE

पायरोप्रोसेसिंग(Pyroprocessing)

पाठ्यक्रम:जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी 

सन्दर्भ

  • पायरोप्रोसेसिंग पर जापान, दक्षिण कोरिया तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में अध्ययन किया गया है तथा इसे उन्नत तीव्र प्रजनक रिएक्टर (Fast Reactor) कार्यक्रमों के एक भाग के रूप में भी खोजा जा रहा है।

पायरोप्रोसेसिंग क्या है?

  • पायरोप्रोसेसिंग एक उच्च-तापमान प्रक्रिया है, जिसका उपयोग पदार्थों में भौतिक अथवा रासायनिक परिवर्तन उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
  • यह एक शुष्क (Dry) तथा ऊर्जा-गहन (Energy-Intensive) प्रक्रिया है, जिसका व्यापक उपयोग सीमेंट निर्माण, धातुकर्म तथा नाभिकीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।

पायरोप्रोसेसिंग के अनुप्रयोग

सीमेंट उद्योग

  • इसका उपयोग चूना पत्थर तथा अन्य कच्चे पदार्थों को क्लिंकर में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।
  • क्लिंकर सीमेंट निर्माण का प्रमुख घटक होता है।

 धातुकर्म

  • अयस्कों से धातुओं के निष्कर्षण के लिए प्रयुक्त विभिन्न प्रक्रियाओं में इसका उपयोग किया जाता है, जैसे—भर्जन (Roasting),प्रगलन (Smelting),उष्मीय अपघटन (Calcination)।

नाभिकीय क्षेत्र

  • प्रयुक्त (Spent) नाभिकीय ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण में इसका उपयोग किया जाता है।
  • इस प्रक्रिया में पिघले हुए लवणों (Molten Salts) में विद्युत-रासायनिक पृथक्करण द्वारा उपयोगी पदार्थों को पुनः प्राप्त किया जाता है।
  • इससे मूल्यवान नाभिकीय पदार्थों की पुनर्प्राप्ति एवं पुनः उपयोग संभव हो पाता है।

स्रोत : TH

मेजर अभिलाषा बराक संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार से सम्मानित

पाठ्यक्रम :जीएस-2/अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध

सन्दर्भ

  • प्रधानमंत्री ने मेजर अभिलाषा बराक को यूएन मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ दी ईयर से सम्मानित किए जाने पर बधाई दी।

परिचय

  • मेजर अभिलाषा बराक वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के लेबनान मिशन में कार्यरत हैं।
  • उन्हें पश्चिम एशियाई देश लेबनान में अपनी तैनाती के दौरान महिलाओं एवं बालिकाओं के साथ किए गए जनसंपर्क एवं सशक्तीकरण प्रयासों के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया है।
  • वे भारतीय सेना की पहली महिला युद्धक हेलीकॉप्टर पायलट भी हैं।
  • प्रत्येक वर्ष इस पुरस्कार के लिए उम्मीदवारों का चयन विभिन्न शांति अभियानों के बल कमांडरों तथा मिशन प्रमुखों द्वारा नामित व्यक्तियों में से किया जाता है।
  • भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सैनिकों एवं पुलिस बलों का सबसे बड़ा योगदान देने वाले देशों में से एक है।

संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन

  • संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन ऐसे अभियान हैं जिन्हें संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए तैनात किया जाता है।
  • पहला शांति स्थापना मिशन 1948 में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य इज़राइल और उसके अरब पड़ोसी देशों के बीच युद्धविराम की निगरानी करना था।
  • इसका गठन तथा दायित्व निर्धारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा किया गया था।
  • यह सामूहिक सुरक्षा का एक महत्त्वपूर्ण साधन है तथा इसका उद्देश्य संघर्षों की रोकथाम,नागरिकों की सुरक्षा,राजनीतिक प्रक्रियाओं को समर्थन तथा देशों को संघर्ष से शांति की ओर संक्रमण में सहायता प्रदान करना है।

प्रमुख संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन

  • MINUSTAH (हैती): हैती में राजनीतिक स्थिरीकरण, सुरक्षा तथा मानवीय सहायता के लिए कार्य किया (2004–2017)।
  • UNMISET (पूर्वी तिमोर): पूर्वी तिमोर में स्थिरता, सुशासन तथा सुरक्षा को समर्थन प्रदान किया (2002–2005)।
  • UNMIL (लाइबेरिया): लाइबेरिया में शांति निर्माण, निरस्त्रीकरण तथा संघर्षोत्तर पुनर्प्राप्ति में सहायता की (2003–2018)।
  • MINURCAT (मध्य अफ्रीकी गणराज्य एवं चाड): नागरिकों की सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता पर केंद्रित रहा (2007–2010)।
  • UNMOGIP (भारत–पाकिस्तान): जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम की स्थिति की निगरानी करता है (1949 से)।
  • संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना बलों को वर्ष 1988 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना के सिद्धांत

  • पक्षकारों की सहमति (Consent of the Parties): शांति स्थापना अभियानों के प्रभावी संचालन के लिए प्रमुख संघर्षरत पक्षों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
  • निष्पक्षता (Impartiality): शांति सैनिकों को सभी पक्षों के प्रति तटस्थ और निष्पक्ष रहना चाहिए।
  • आत्मरक्षा एवं अधिदेश की रक्षा को छोड़कर बल का प्रयोग नहीं : बल का प्रयोग केवल आत्मरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा तथा मिशन के अधिदेश को लागू करने के लिए किया जा सकता है।

स्रोत : TH

उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा खाद्य तेलों के लिए मानक पैक आकार निर्धारित

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • केंद्र सरकार ने वैधानिक मापविज्ञान (Legal Metrology) ढाँचे के अंतर्गत खाद्य तेलों के लिए मानक पैक आकार लागू किए हैं, जिससे बाज़ार में अधिक पारदर्शिता और एकरूपता लाई जा सके।

परिचय

  • संशोधित नियमों के अंतर्गत प्रमुख खाद्य तेलों के लिए मानक पैक आकार निर्धारित किए गए हैं, जिनमें पाम तेल, पामोलीन तेल, सोयाबीन तेल, सूरजमुखी तेल, सरसों तेल, मूंगफली तेल, तिल तेल, चावल की भूसी का तेल, कपास बीज तेल तथा मक्का तेल शामिल हैं।
  • स्वीकृत पैक आकार 200 ग्राम, 500 ग्राम, 1 से 5 किलोग्राम, 15 किलोग्राम तथा 20 किलोग्राम हैं।
  • इस पहल का उद्देश्य बाज़ार में विभिन्न प्रकार के पैकेट आकारों की बढ़ती संख्या की समस्या का समाधान करना है, क्योंकि इससे उपभोक्ताओं के लिए कीमतों की तुलना करना तथा सूचित खरीद निर्णय लेना कठिन हो जाता है।
  • महत्व: 
    • इससे उपभोक्ताओं को अधिक सूचित और पारदर्शी खरीद निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।
    • यह पहल खाद्य तेल उद्योग को भी लाभ पहुँचाएगी क्योंकि इससे पैकेजिंग प्रथाओं में अधिक एकरूपता आएगी।

वैधानिक मापविज्ञान (Legal Metrology)

  • वैधानिक मापविज्ञान मापन तथा मापन उपकरणों पर कानूनी आवश्यकताओं के अनुप्रयोग को कहा जाता है।
  • वैधानिक मापविज्ञान का उद्देश्य भार एवं माप की सुरक्षा तथा शुद्धता के दृष्टिकोण से जनता को विश्वसनीय आश्वासन प्रदान करना है।
  • भारत वर्ष 1956 में अंतरराष्ट्रीय वैधानिक मापविज्ञान संगठन (OIML) का सदस्य बना।
  • वर्ष 2023 में भारत विश्व का 13वाँ देश बना जिसे भार एवं मापन उपकरणों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य OIML अनुमोदन प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
  • इस मान्यता से भारतीय निर्माताओं को अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय परीक्षण लागत के बिना अपने उपकरणों का विश्वभर में निर्यात करने में सुविधा मिलेगी।
  • साथ ही, इससे वैश्विक व्यापार, मानक निर्धारण तथा वैधानिक मापविज्ञान शासन में भारत की भूमिका और अधिक सुदृढ़ होगी।

स्रोत: AIR

फूड प्लैनेट पुरस्कार 2026

पाठ्यक्रम: विविध 

सन्दर्भ

  • आंध्र प्रदेश सामुदायिक प्रबंधित प्राकृतिक खेती (APCNF) कार्यक्रम ने फूड प्लैनेट पुरस्कार 2026 जीता है।

परिचय

  • फूड प्लैनेट पुरस्कार की स्थापना वर्ष 2019 में कर्ट बर्गफोर्स फाउंडेशन द्वारा की गई थी।
  • इसे वैश्विक खाद्य प्रणालियों में परिवर्तन लाने के लिए समर्पित विश्व का सबसे बड़ा पर्यावरणीय पुरस्कार माना जाता है।
  • इस पुरस्कार के अंतर्गत 15 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹14 करोड़) की राशि प्रदान की जाती है।
  • APCNF का चयन इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली पहली भारतीय पहल है।

APCNF कार्यक्रम

  • इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2016 में रैयतु साधिकारा संस्था (RySS) के माध्यम से की गई थी।
  • यह कार्यक्रम रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देता है।
  • वर्तमान में यह कार्यक्रम 8,000 से अधिक गाँवों तथा लगभग 18 लाख किसान परिवारों तक पहुँच चुका है, जिससे यह विश्व की सबसे बड़ी सामुदायिक-नेतृत्व वाली कृषि-पारिस्थितिकी (Agroecology) पहलों में से एक बन गया है।
  • यह कार्यक्रम महिला स्वयं सहायता समूहों तथा 10,000 से अधिक सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों के नेटवर्क के माध्यम से कार्य करता है, जिससे किसानों को खेती की लागत कम करने तथा आय बढ़ाने में सहायता मिलती है।
  • आंध्र प्रदेश के इस मॉडल का अध्ययन एवं अनुकरण अब भारत के कई राज्यों के साथ-साथ श्रीलंका और जाम्बिया जैसे देशों में भी किया जा रहा है।

स्रोत: TH

 

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