पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- लोकसभा अध्यक्ष ने लोक लेखा समितियों (PACs) से लंबित लेखापरीक्षा संबंधी टिप्पणियों पर समयबद्ध कार्रवाई करने तथा सरकारी व्यय के परिणामों की अधिक गहन जाँच करने का आग्रह किया।
लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की गई सिफारिशें
- बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ: समितियों को जहाँ भी उपयुक्त हो, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, समय पर परियोजना पूर्ण होने तथा निर्धारित मानकों के अनुपालन की जाँच के लिए परियोजना स्थलों का दौरा करना चाहिए।
- कल्याणकारी योजनाओं की जाँच: उन्होंने कहा कि कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा में केवल व्यय की गई राशि पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय लाभार्थियों पर उनके वास्तविक प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आँकड़ा विश्लेषण और अन्य प्रौद्योगिकियाँ समितियों को व्यय संबंधी आँकड़ों की बड़ी मात्रा का विश्लेषण करने, प्रवृत्तियों की पहचान करने, संभावित अनियमितताओं का पता लगाने तथा लंबित लेखापरीक्षा टिप्पणियों की निगरानी करने में सहायता कर सकती हैं।
- संसदीय चर्चा: संसद के प्रत्येक सत्र के दौरान लोक लेखा समिति की कम-से-कम एक रिपोर्ट तथा उस पर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई पर चर्चा की जानी चाहिए।
लोक लेखा समिति के बारे में
- लोक लेखा समिति संसद की एक ऐसी समिति है, जो सरकार के व्यय की जाँच करती है और यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक धन का उपयोग संसद द्वारा दी गई स्वीकृति के अनुरूप किया जाए।
- यह संसद की तीन वित्तीय समितियों में से एक है। अन्य दो समितियाँ हैं:
- प्राक्कलन समिति ।
- सार्वजनिक उपक्रम समिति ।
- स्थापना: इसका गठन भारत सरकार अधिनियम, 1919 के बाद वर्ष 1921 में किया गया था।
- प्रकृति: यह संसद की एक स्थायी समिति है। स्थायी समिति संसद की ऐसी विशिष्ट समिति होती है, जो स्थायी रूप से कार्य करती है और जिसका समय-समय पर पुनर्गठन किया जाता है।
- संवैधानिक स्थिति: यह संवैधानिक निकाय नहीं है। इसका गठन लोकसभा में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों के नियम 308 के अंतर्गत किया जाता है।
- संरचना: इसमें कुल 22 सदस्य होते हैं—
- लोकसभा से 15 सदस्य।
- राज्यसभा से 7 सदस्य।
- सदस्यों का निर्वाचन: सदस्यों का निर्वाचन संसद द्वारा प्रतिवर्ष आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अंतर्गत एकल संक्रमणीय मत पद्धति से किया जाता है।
- कार्यकाल: सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष होता है।
- मंत्री की सदस्यता: कोई भी मंत्री लोक लेखा समिति का सदस्य निर्वाचित नहीं हो सकता।
- अध्यक्ष की नियुक्ति: समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।
- वर्ष 1967 से चली आ रही परंपरा के अनुसार, लोक लेखा समिति का अध्यक्ष विपक्ष से नियुक्त किया जाता है।
- कार्य: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की लेखापरीक्षा रिपोर्टों की जाँच करना।
- यह सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक व्यय की समीक्षा करना कि उसमें अपव्यय या अनियमितता न हो।
- कार्यपालिका की विधायिका के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना।
- राजकोषीय अनुशासन और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए CAG के साथ समन्वय में कार्य करना।
संसदीय स्थायी समितियाँ क्या हैं?
- संसदीय स्थायी समितियाँ (PSCs) संसद की स्थायी समितियाँ हैं, जिनका गठन कार्यपालिका के कार्य की जाँच, समीक्षा और निगरानी करने के लिए किया जाता है।
- ये समितियाँ पूरे वर्ष कार्य करती हैं, जबकि तदर्थ समितियाँ अस्थायी प्रकृति की होती हैं।
- संसदीय स्थायी समितियों के प्रकार:
- विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ ( DRSCs): ये समितियाँ मंत्रालयों की अनुदान माँगों, उन्हें संदर्भित विधेयकों तथा नीतिगत मुद्दों की जाँच करती हैं। उदाहरण: वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति।
- वित्तीय समितियाँ :
- लोक लेखा समिति (PAC)।
- प्राक्कलन समिति।
- सार्वजनिक उपक्रम समिति।
- अन्य स्थायी समितियाँ :
- कार्य मंत्रणा समिति।
- विशेषाधिकार समिति।
- नियम समिति।
संसदीय स्थायी समितियों की भूमिका
- संसद से परे विस्तृत वित्तीय जाँच : संसदीय परिचर्चाओं में प्रायः बजटीय प्रावधानों की विस्तृत जाँच के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध नहीं होता है।
- स्थायी समितियाँ अनुदान माँगों, व्यय की प्रवृत्तियों तथा धन के उपयोग के स्वरूप की विस्तृत जाँच करती हैं।
- साक्ष्य-आधारित एवं निष्पक्ष निगरानी: समितियाँ विशेषज्ञों के सुझावों और आँकड़ा-आधारित विश्लेषण पर निर्भर रहते हुए निष्पक्ष तरीके से कार्य करती हैं।
- उनकी रिपोर्टें नीतियों के कार्यान्वयन और राजकोषीय अनुशासन का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन प्रस्तुत करती हैं।
- कार्यपालिका के कामकाज की निगरानी: समितियाँ पूरे वर्ष कार्य करती हैं और मंत्रालयों तथा विभागों की निरंतर निगरानी सुनिश्चित करती हैं।
- इससे शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलता है।
भारत में बजटीय पूर्वानुमान और धन के उपयोग से संबंधित चुनौतियाँ
- अवास्तविक एवं बढ़ा-चढ़ाकर किए गए बजटीय पूर्वानुमान: मंत्रालय प्रायः कार्यान्वयन क्षमता का यथार्थ आकलन किए बिना ही व्यय संबंधी आवश्यकताओं का अनुमान प्रस्तुत करते हैं।
- धन के कम उपयोग के बावजूद बजटीय आवंटन में निरंतर वृद्धि होना कमजोर पूर्वानुमान व्यवस्था को दर्शाता है।
- आवंटित धन का अपर्याप्त उपयोग :: बजट अनुमान (BE) और वास्तविक व्यय (AE) के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर पाया जाता है।
- आवंटित धन का अपर्याप्त उपयोग होने से सार्वजनिक संसाधन निष्क्रिय पड़े रहते हैं तथा विकासात्मक परिणाम प्राप्त होने में विलंब होता है।
- परिणामोन्मुख दृष्टिकोण के बिना वृद्धिशील बजट निर्माण: बजटीय आवंटन में प्रतिवर्ष वृद्धि होती रहती है, लेकिन इसे पिछले प्रदर्शन या प्राप्त परिणामों से नहीं जोड़ा जाता है।
- यह परिणाम-आधारित बजट निर्माण के बजाय निवेश-आधारित बजट निर्माण की प्रधानता को दर्शाता है।
- राजकोषीय अनुशासनहीनता: मंत्रालय आवंटित धनराशि को पूरी तरह व्यय करने के लिए वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में अत्यधिक व्यय करते हैं।
- इस प्रकार का व्यय त्रैमासिक व्यय योजना के मानदंडों तथा राजकोषीय विवेक के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
आगे की राह
- संसदीय समिति की टिप्पणियाँ कार्यपालिका की जवाबदेही और राजकोषीय विवेक सुनिश्चित करने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को पुनः रेखांकित करती हैं।
- शासन के परिणामों में सुधार लाने तथा भारत की राजकोषीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पुनर्स्थापित करने के लिए परिणाम-आधारित बजट निर्माण को सुदृढ़ करना और नीतियों को वित्तीय प्रावधानों के साथ एकीकृत करना आवश्यक है।
स्रोत: DD
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