सरकार का पूँजीगत व्यय में वृद्धि पर बल
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- केंद्रीय वित्त मंत्री ने सतत सार्वजनिक पूँजीगत व्यय के माध्यम से आर्थिक विकास को समर्थन देने तथा साथ ही राजकोषीय विवेक बनाए रखने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया।
पूँजीगत व्यय के बारे में
- पूँजीगत व्यय (Capex) से तात्पर्य सरकार द्वारा दीर्घकालिक भौतिक परिसंपत्तियों और अवसंरचना के निर्माण, अधिग्रहण अथवा सुधार पर किए जाने वाले व्यय से है, जो समय के साथ आर्थिक लाभ उत्पन्न करते हैं।
- प्रमुख विशेषताएँ :
- परिसंपत्ति निर्माण : इससे सतत परिसंपत्तियों का निर्माण होता है।
- दीर्घकालिक लाभ : यह आर्थिक विकास को समर्थन देता है तथा उत्पादक क्षमता में सुधार करता है।
- गुणक प्रभाव : इससे रोजगार सृजन, माँग में वृद्धि और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है।
- राजस्व सृजन : कुछ पूँजीगत परिसंपत्तियाँ भविष्य में सरकार के लिए आय उत्पन्न करती हैं।
स्रोत: TH
वधावन बंदरगाह
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- ₹76,000 करोड़ से अधिक की लागत वाली वधावन बंदरगाह परियोजना को पर्यावरण संबंधी चिंताओं के कारण स्थानीय समुदायों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
परिचय
- वधावन बंदरगाह महाराष्ट्र के पालघर जिले के दहानू के निकट विकसित किया जा रहा एक सर्व-मौसम , ग्रीनफील्ड और गहरे जल वाला प्रमुख बंदरगाह है।
- इसका विकास वधावन पोर्ट प्रोजेक्ट लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है, जो जवाहरलाल नेहरू पोर्ट प्राधिकरण (JNPA) और महाराष्ट्र मैरीटाइम बोर्ड (MMB) के बीच एक संयुक्त उद्यम है। इसमें दोनों की हिस्सेदारी क्रमशः 74% और 26% है।
- यह लैंडलॉर्ड पोर्ट मॉडल पर आधारित होगा। इस मॉडल के अंतर्गत बंदरगाह प्राधिकरण स्वामित्व और नियामकीय जिम्मेदारियाँ अपने पास रखता है, जबकि निजी कंपनियाँ टर्मिनल संचालन का कार्य करती हैं।
- इस स्थल पर समुद्र तट से लगभग 10 किलोमीटर दूर प्राकृतिक रूप से लगभग 20 मीटर गहराई उपलब्ध है, जो बड़े आकार के जहाजों के आवागमन के लिए उपयुक्त है।
- इस परियोजना में समुद्र से लगभग 1,448 हेक्टेयर भूमि का पुनर्भरण तथा 10.14 किलोमीटर लंबे अपतटीय तरंगरोध का निर्माण शामिल है। इससे समुद्री जैव विविधता, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और पारंपरिक मत्स्य आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंकाएँ उत्पन्न हुई हैं।
रणनीतिक महत्त्व
- परिचालन शुरू होने के बाद इस बंदरगाह से भारत के निर्यात-आयात (EXIM) व्यापार को सुदृढ़ता मिलने, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार गलियारों से संपर्क बेहतर होने तथा विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम होने की अपेक्षा है।
स्रोत: HT
डीपफेक की पहचान के लिए नई तकनीक
पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
समाचारों में
- कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स (UCLA) के शोधकर्ताओं ने वीडियो में प्रकाश के पैटर्न का विश्लेषण करके जाली जानकारी की पहचान करने वाली एक नई डीपफेक पहचान तकनीक विकसित की है।
डीपफेक
- डीपफेक डिजिटल मीडिया के ऐसे रूप हैं, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करके वीडियो, ऑडियो और तस्वीरों को संपादित एवं परिवर्तित किया जाता है।
- मूल रूप से, यह अत्यधिक यथार्थवादी डिजिटल जालसाजी है।
- AI प्रौद्योगिकियों, क्लाउड कंप्यूटिंग और बड़ी मात्रा में डिजिटल डेटा की सहज उपलब्धता ने डीपफेक तैयार करना पहले की तुलना में अधिक सुलभ बना दिया है।
प्रभाव
- डीपफेक के शिक्षा, सुगम्यता, फिल्म निर्माण, फोरेंसिक जाँच और कलात्मक अभिव्यक्ति जैसे क्षेत्रों में अनेक लाभ हैं।
- हालाँकि, इनका दुरुपयोग किसी की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाने, धोखाधड़ी करने, साक्ष्यों को जाली बनाने, भ्रामक सूचनाएँ फैलाने तथा बड़े पैमाने पर जनविश्वास और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के लिए भी किया जा सकता है।
डीपफेक पहचान की नई विधि
- इस हाइब्रिड ऑप्टिकल-इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली ने 99.86% सटीकता के साथ फर्जी वीडियो तथा 95.72% सटीकता के साथ वास्तविक वीडियो की पहचान की।
- पारंपरिक AI-आधारित पहचान प्रणालियों को अधिक कंप्यूटिंग संसाधनों की आवश्यकता होती है तथा कम्प्रेशन या धुंधलापन उत्पन्न करके उन्हें भ्रमित किया जा सकता है।
- यह प्रणाली गूगल के Veo 3 मॉडल से बनाए गए वीडियो की भी 94.8% सटीकता के साथ पहचान कर सकती है। साथ ही, यह पूर्णतः इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की तुलना में कम ऊर्जा की खपत करती है।
- यह तकनीक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बड़ी मात्रा में वीडियो का विश्लेषण करने, समस्याग्रस्त सामग्री की पहचान करने तथा डीपफेक की पहचान से जुड़े कार्यभार को कम करने में सहायता कर सकती है।
स्रोत: TH
हरित पटाखे
पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश के माध्यम से दिवाली के अवसर पर दिल्ली-NCR में कुछ सख्त शर्तों के अधीन हरित पटाखे फोड़ने की अनुमति दी है।
हरित पटाखे क्या हैं?
- हरित पटाखों को पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम उत्सर्जन करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। हालाँकि, ये पूर्णतः प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं।
- इन्हें वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (CSIR-NEERI) द्वारा विकसित किया गया है। इनमें कणीय पदार्थों और कुछ गैसीय उत्सर्जनों को कम करने के लिए संशोधित रासायनिक संरचनाओं तथा योजकों का उपयोग किया जाता है।
- इन बदलावों में पटाखों के आवरण का आकार कम करना, राख उत्पन्न करने वाली सामग्रियों को हटाना, पारंपरिक रसायनों के उपयोग को न्यूनतम करना तथा जियोलाइट्स और आयरन ऑक्साइड जैसे पदार्थों को शामिल करना शामिल हो सकता है।
- पारंपरिक पटाखों की समान श्रेणी की तुलना में इन्हें उत्सर्जन में कमी के निम्नलिखित दो मानदंडों में से किसी एक को पूरा करना आवश्यक है:
- कणीय पदार्थों के उत्सर्जन में कम-से-कम 30% की कमी; अथवा
- कणीय पदार्थों के उत्सर्जन में कम-से-कम 20% और गैसीय उत्सर्जन में 10% की कमी।
- इसका उद्देश्य आतिशबाजी के दृश्य और ध्वनि प्रभावों को बनाए रखते हुए उनसे उत्पन्न प्रदूषण को कम करना है।
क्या आप जानते हैं?
- वर्ष 2023 के एक अध्ययन में परीक्षण किए गए विशिष्ट हरित पटाखों से कणीय पदार्थों और बेरियम के उत्सर्जन में 30–60% तक की कमी पाई गई। हालाँकि, यह कमी अलग-अलग उत्पादों के अनुसार भिन्न थी।
- इनका समग्र प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि कितने पटाखे फोड़े जाते हैं, उत्पादों की गुणवत्ता कैसी है और नियमों का प्रवर्तन कितनी प्रभावी ढंग से किया जाता है।
- हरित पटाखों का उपयोग भी श्वसन संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है, विशेषकर बच्चों, वृद्धजनों और पहले से श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों में।
स्रोत: HT
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