पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में, केंद्रीय इस्पात मंत्रालय ने मसौदा राष्ट्रीय इस्पात नीति: विज़न 2047 जारी की है। इसका उद्देश्य भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी इस्पात उत्पादक के रूप में विकसित करना तथा इस्पात निर्यात को बढ़ाकर 4.5 करोड़ टन तक पहुँचाना है।
भारत का इस्पात उद्योग एवं उसका प्रदर्शन
- भारत का इस्पात उद्योग आर्थिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण आधार स्तंभ है। यह अवसंरचना, निर्माण, ऑटोमोबाइल, रेलवे, रक्षा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को समर्थन प्रदान करता है।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कच्चे इस्पात का उत्पादक बनकर उभरा है। देश का इस्पात उत्पादन लगभग 170 मिलियन टन (Mt) तक पहुँच गया है।
- वैश्विक इस्पात उत्पादन में भारत की स्थिति में सुधार हुआ है। वर्ष 2000 में भारत नौवें स्थान पर था और वैश्विक इस्पात उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 5% से भी कम थी।
- वर्ष 2000–2025 के दौरान इस्पात उद्योग की औसत लाभप्रदता लगभग 15% रही, जो समग्र विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में 3–4 प्रतिशत अंक अधिक थी।
- मसौदा राष्ट्रीय इस्पात नीति: विज़न 2047 का उद्देश्य भारत की वैश्विक स्थिति को सुदृढ़ करना, निर्यात को बढ़ावा देना तथा प्रतिस्पर्धी घरेलू इस्पात पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना है।
- हालाँकि, उच्च उत्पादन और लाभप्रदता अपने आप में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता का संकेत नहीं देते हैं।
संरक्षण–प्रतिस्पर्धात्मकता विरोधाभास को समझना
- भारत के इस्पात उद्योग को सरकार की ओर से पर्याप्त संरक्षण प्राप्त है। इससे यह चिंता उत्पन्न होती है कि उद्योग की लाभप्रदता वास्तविक परिचालन दक्षता का परिणाम है या नीतिगत समर्थन का।
- संरक्षण के प्रमुख स्वरूप निम्नलिखित हैं:
- लौह अयस्क पर निर्यात शुल्क : 58% से अधिक लौह अंश वाले लौह अयस्क पर 30% निर्यात शुल्क लगाए जाने से घरेलू लौह अयस्क की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तुलना में लगभग 30–40% कम बनी रहती हैं।
- आयात शुल्क के माध्यम से संरक्षण: 7.5% के मूल आयात शुल्क के साथ 11.5% का सुरक्षा शुल्क लगाए जाने से प्रभावी संरक्षण का स्तर लगभग 18% हो जाता है, जबकि आसियान (ASEAN) देशों में यह लगभग 3–4% है।
- गैर-शुल्क बाधाएँ : गुणवत्ता नियंत्रण आदेश के दायरे में इस्पात के 228 उत्पाद शामिल हैं। बताया जाता है कि गौबा समिति ने 122 उत्पादों को इस दायरे से हटाने की सिफारिश की थी, लेकिन संबंधित आकलन के समय तक केवल 59 उत्पादों के लिए ही इन आदेशों को निलंबित किया गया था।
- इसके परिणामस्वरूप, घरेलू इस्पात उत्पादक हॉट-रोल्ड कॉइल को जापानी कीमतों की तुलना में 6–7% अधिक मूल्य पर बेच सकते हैं, जबकि जापान अपेक्षाकृत अधिक लागत वाला उत्पादक देश है।
अत्यधिक संरक्षण के आर्थिक परिणाम
- अत्यधिक संरक्षण से अर्थव्यवस्था में कई प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं:
- उच्च आगत लागत : घरेलू इस्पात की अधिक कीमतें निर्माण, ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
- निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता : सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा डाउनस्ट्रीम विनिर्माताओं को अधिक उत्पादन लागत का सामना करना पड़ता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की उनकी क्षमता घटती है।
- संसाधनों का अनुचित आवंटन : घरेलू स्तर पर लौह अयस्क की कम कीमतें खनन गतिविधियों के लिए प्रोत्साहन कम करती हैं तथा खनिज-संपन्न क्षेत्रों में मूल्य संवर्धन की संभावनाओं को सीमित करती हैं।
- दक्षता में कमी : अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से संरक्षण मिलने के कारण उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाने और उत्पादकता बढ़ाने के प्रोत्साहन कमजोर पड़ते हैं।
- राजकोषीय एवं आर्थिक विकृतियाँ : नीतिगत समर्थन से प्राप्त लाभप्रदता अकुशल परिचालन को छिपा सकती है तथा आवश्यक संरचनात्मक सुधारों को हतोत्साहित कर सकती है। इस्पात की कीमतों में 6% की कमी से प्रमुख इस्पात कंपनियों की लाभप्रदता 25–50% तक घट सकती है।
भारत के इस्पात उद्योग से जुड़ी अन्य चिंताएँ
- अत्यधिक संरक्षण के अतिरिक्त, इस्पात उद्योग को कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
- आयातित कोकिंग कोयले पर निर्भरता : भारत कोकिंग कोयले के आयात पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे इस्पात उत्पादक अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
- पर्यावरणीय चिंताएँ : पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस आधारित इस्पात निर्माण प्रक्रिया में ऊर्जा की अधिक खपत होती है और कार्बन उत्सर्जन भी अधिक होता है।
- प्रौद्योगिकीय सीमाएँ : उन्नत इस्पात निर्माण प्रक्रियाओं, स्वचालन और उच्च मूल्य वाले विशेष इस्पात में अधिक निवेश की आवश्यकता है।
- खनन क्षेत्र की अक्षमताएँ : बताया जाता है कि भारत की ज्ञात भूवैज्ञानिक संभावनाओं में से केवल लगभग 10% का ही अन्वेषण किया गया है।
- सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमताएँ : लाभप्रदता और बाजार प्रदर्शन में अंतर बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था तथा परिचालन दक्षता की आवश्यकता को दर्शाता है।
संबंधित सुधार एवं पहलें
- राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2017 : घरेलू इस्पात उत्पादन को बढ़ावा देना तथा आयात पर निर्भरता कम करना।
- विशेष इस्पात के लिए उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना : उच्च गुणवत्ता वाले एवं मूल्यवर्धित इस्पात के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करना।
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन : इस्पात सहित उन उद्योगों में हरित हाइड्रोजन के उपयोग को बढ़ावा देना, जहाँ कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना कठिन है।
- इस्पात स्क्रैप पुनर्चक्रण नीति, 2019 : स्क्रैप की उपलब्धता और संसाधन दक्षता को बढ़ावा देना।
- पीएम गति शक्ति : बहु-माध्यमीय संपर्क व्यवस्था में सुधार करना तथा लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना।
- राष्ट्रीय खनिज नीति, 2019: सतत खनिज विकास और अन्वेषण को प्रोत्साहित करना।
वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए आवश्यक सुधार
- आयात शुल्क संरक्षण में क्रमिक कमी: आयात शुल्क को पाँच वर्षों में तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए, ताकि इसे आसियान देशों के स्तर के करीब लाया जा सके।
- प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और आगतों की उपलब्धता में सुधार के लिए अनावश्यक गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCOs) को भी समाप्त किया जाना चाहिए।
- औषधि एवं ऑटोमोबाइल कलपुर्जा उद्योगों का अनुभव दर्शाता है कि संरक्षण में कमी से घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता अनिवार्य रूप से कमजोर नहीं होती है।
- वर्ष 2003 से 2024 के बीच ऑटोमोबाइल कलपुर्जों के वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 0.2% से बढ़कर 1.5% हो गई।
- इसी अवधि में औषधि क्षेत्र में भारत की वैश्विक निर्यात हिस्सेदारी 0.7% से बढ़कर 2% हो गई।
- लौह अयस्क निर्यात शुल्क का युक्तिसंगतीकरण: उच्च श्रेणी के लौह अयस्क पर 30% निर्यात शुल्क समाप्त करने से बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण संभव होगा, अन्वेषण को प्रोत्साहन मिलेगा तथा खनिज संसाधनों से बेहतर प्रतिफल प्राप्त होगा।
- खनन विनियमों में सुधार : भारत को ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से प्रेरणा लेते हुए अन्वेषण-अनुकूल खनन नीतियाँ अपनानी चाहिए।
- खनिज भंडारों की खोज करने वालों को उपयुक्त प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
- खनन अधिकारों तक पहुँच के लिए पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
- सार्वजनिक क्षेत्र की दक्षता में सुधार : चयनित अकुशल इस्पात संयंत्रों के निजीकरण अथवा रणनीतिक विनिवेश पर विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही पेशेवर प्रबंधन और सुदृढ़ कॉरपोरेट प्रशासन को बढ़ावा देना आवश्यक है।
- बताया जाता है कि वर्ष 2000 से 2025 के बीच SAIL की बाजार हिस्सेदारी 30% से घटकर 10% रह गई, जबकि JSW की हिस्सेदारी 1% से बढ़कर 12% हो गई।
- यह परिचालन दक्षता और प्रतिस्पर्धी व्यावसायिक मॉडलों के महत्त्व को रेखांकित करता है।
- हरित एवं उच्च मूल्यवर्धित इस्पात को बढ़ावा : उभरते वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए हाइड्रोजन-आधारित इस्पात निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, स्क्रैप पुनर्चक्रण, ऊर्जा दक्षता और विशेष इस्पात में निवेश आवश्यक है।
भविष्य की राह: 2047 तक इस्पात क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाना
- भारत को संरक्षण-आधारित औद्योगिक विकास से आगे बढ़कर उत्पादकता-आधारित प्रतिस्पर्धात्मकता की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
- राष्ट्रीय इस्पात नीति में निम्नलिखित क्षेत्रों के लिए मापनीय मानक निर्धारित किए जाने चाहिए:
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत और उत्पादकता।
- निर्यात में वृद्धि तथा वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ बेहतर एकीकरण।
- अनुसंधान, विकास और प्रौद्योगिकीय नवाचार में निवेश में वृद्धि।
- सतत खनन तथा संसाधनों का उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग।
- कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता में कमी तथा हरित इस्पात को व्यापक स्तर पर अपनाना।
- इस्पात मूल्य शृंखला में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की अधिक भागीदारी।
- घरेलू विनिर्माताओं को आवश्यक समायोजन के लिए पर्याप्त समय देने तथा अनावश्यक औद्योगिक व्यवधानों से बचने के उद्देश्य से सुधारों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत के इस्पात उद्योग ने उत्पादन और लाभप्रदता के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हासिल की है। हालाँकि, अत्यधिक संरक्षण इसकी दीर्घकालिक वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर सकता है। इस कथन का परीक्षण कीजिए तथा भारतीय इस्पात उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए उपयुक्त सुधारों का सुझाव दीजिए। |
स्रोत: IE