पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- मृत्युदंड के विरुद्ध विश्व दिवस प्रतिवर्ष 10 अक्टूबर को मृत्युदंड की समाप्ति का समर्थन करने के उद्देश्य से मनाया जाता है।
- इसे वर्ष 2003 में मृत्युदंड के विरुद्ध विश्व गठबंधन द्वारा निर्धारित किया गया था और प्रथम बार आयोजित किया गया था।
परिचय
- बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980): सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, लेकिन न्यायिक विवेक के प्रयोग के लिए दिशा-निर्देशों के रूप में कुछ विशिष्ट शर्तें निर्धारित कीं।
- अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 393(3) के अंतर्गत आजीवन कारावास को सामान्य दंड माना गया है तथा मृत्युदंड केवल ‘विशेष कारणों’ के आधार पर ही दिया जा सकता है।
- न्यायालयों को अपराध की परिस्थितियों के साथ-साथ अभियुक्त की व्यक्तिगत परिस्थितियों पर भी विचार करना आवश्यक है। मृत्युदंड केवल उन्हीं मामलों में दिया जाना चाहिए, जहाँ आजीवन कारावास का विकल्प ‘निश्चित रूप से अनुपयुक्त’ हो।
भारत में मृत्युदंड
- दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के प्रोजेक्ट 39A की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में लगातार दूसरे वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की।
- भारत में मृत्युदंड की प्रतीक्षा कर रहे कैदी:

- भारत में मृत्युदंड को फाँसी के रूप में दिया जाता है, अर्थात् दोषी व्यक्ति को गर्दन से तब तक लटकाया जाता है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
- पुर्तगाल, नीदरलैंड, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों ने मृत्युदंड को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए हैं। वहीं अमेरिका, ईरान, चीन और भारत जैसे देशों ने मृत्युदंड देने के लिए कानूनी व्यवस्था बनाए रखी है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि मृत्युदंड का प्रयोग केवल ‘विरलतम से विरल’ मामलों में किया जाना चाहिए। भारत में इसे अंतिम बार वर्ष 2020 में निर्भया मामले में लागू किया गया था।
- वर्ष 2025 में निचली अदालतों ने 128 व्यक्तियों को मृत्युदंड सुनाया। जिन मामलों में प्रक्रिया के अनुपालन का आकलन किया जा सका, उनमें से 95.18% मामलों में मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
भारत में ‘विरलतम से विरल(Rarest of Rare)’ का सिद्धांत
- 1972 — जगमोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य: सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
- 1980 — बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य: न्यायालय ने ‘विरलतम से विरल’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसके अनुसार, मृत्युदंड केवल असाधारण मामलों में ही दिया जाना चाहिए।
- 1983 — मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य: सर्वोच्च न्यायालय ने ‘विरलतम से विरल’ सिद्धांत को स्पष्ट किया तथा अपराधों की पाँच ऐसी श्रेणियों की पहचान की, जिनमें मृत्युदंड उचित हो सकता है:
- हत्या करने का तरीका: अत्यंत क्रूर और जघन्य तरीके से की गई हत्याएँ।
- हत्या का उद्देश्य: ऐसे उद्देश्य से की गई हत्या, जो पूर्ण नैतिक पतन को दर्शाती हो।
- अपराध की सामाजिक रूप से घृणित प्रकृति: जब हत्या किसी अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाकर की गई हो और उससे व्यापक सामाजिक आक्रोश उत्पन्न हुआ हो।
- अपराध की व्यापकता: जब अपराध का विस्तार या उसका प्रभाव अत्यधिक व्यापक हो।
- पीड़ित की स्थिति: जब पीड़ित विशेष रूप से असुरक्षित हो, जैसे बच्चा, महिला या वृद्ध व्यक्ति।
- मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने अभियुक्त से संबंधित जानकारी एकत्र करने के लिए व्यावहारिक दिशा-निर्देश निर्धारित किए। इसके अंतर्गत राज्य के लिए अभियुक्त के मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन, हिरासत के दौरान उसके आचरण संबंधी रिपोर्ट तथा परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट प्रस्तुत करना आवश्यक किया गया।
- वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ (2025): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मनोज मामले में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप दंड निर्धारण की सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से उत्पन्न होती है।
- ऐसी सुनवाई के बिना दिया गया मृत्युदंड असंवैधानिक है और अंतिम निर्णय हो जाने के बाद भी संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उसे पुनः चुनौती दी जा सकती है।
मृत्युदंड से संबंधित चिंताएँ
- गलत दोषसिद्धि का जोखिम: दोषपूर्ण जाँच, अविश्वसनीय साक्ष्य, झूठी गवाही या न्यायिक त्रुटियों के कारण निर्दोष व्यक्तियों को मृत्युदंड दिए जाने की संभावना बनी रहती है।
- अपराध रोकने में प्रभावशीलता का निर्णायक प्रमाण नहीं: ऐसा कोई निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि मृत्युदंड, आजीवन कारावास की तुलना में अपराधों को अधिक प्रभावी ढंग से रोकता है।
- दंड की अपरिवर्तनीयता: अन्य दंडों के विपरीत, मृत्युदंड लागू हो जाने के बाद उसे वापस नहीं लिया जा सकता, भले ही बाद में नए साक्ष्यों से संबंधित व्यक्ति की निर्दोषता सिद्ध हो जाए।
- मनोवैज्ञानिक पीड़ा: मृत्युदंड के अंतिम निर्णय को लेकर लंबे समय तक बनी अनिश्चितता, बार-बार की अपीलें तथा मृत्युदंड की प्रतीक्षा में वर्षों तक कारावास में रहना कैदियों में गंभीर मानसिक तनाव उत्पन्न कर सकता है।
मृत्युदंड पर वैश्विक व्यवस्था
- नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (ICCPR) का अनुच्छेद 6: यह अनुच्छेद सीमित परिस्थितियों में मृत्युदंड की अनुमति देता है।
- हालाँकि, इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई भी बात किसी सदस्य देश द्वारा मृत्युदंड समाप्त करने की प्रक्रिया में बाधा नहीं बननी चाहिए और न ही उसमें विलंब का कारण बननी चाहिए।
- 1984 — संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा उपाय: – संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद ने मृत्युदंड का सामना कर रहे व्यक्तियों के अधिकारों की गारंटी देने वाले सुरक्षा उपायों को अपनाया।
- 1989 — ICCPR का द्वितीय वैकल्पिक प्रोटोकॉल: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस प्रोटोकॉल को अपनाया, जिसमें सदस्य देशों से मृत्युदंड समाप्त करने का आग्रह किया गया।
- जिन देशों ने इस प्रोटोकॉल की पुष्टि की, उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड न देने की सहमति व्यक्त की।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव (2007–2018): इन प्रस्तावों के माध्यम से देशों से निम्नलिखित कदम उठाने का आग्रह किया गया:
- मृत्युदंड का सामना कर रहे व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने वाले अंतरराष्ट्रीय मानकों का सम्मान करना।
- मृत्युदंड के प्रयोग को क्रमिक रूप से सीमित करना।
- मृत्युदंड से दंडनीय अपराधों की संख्या कम करना।
- प्रथम बार संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्य देशों में से दो-तिहाई से अधिक देशों ने मृत्युदंड के प्रयोग पर रोक लगाने संबंधी महासभा के दसवें प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
निष्कर्ष
- विगत एक दशक में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए मृत्युदंड के लगभग एक-तिहाई मामले दोषमुक्ति में समाप्त हुए हैं।
- केवल वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड से संबंधित अपने द्वारा निपटाए गए 19 मामलों में से 10 में अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने बार-बार जाँच और अभियोजन में गंभीर खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
- भारत के विधि आयोग ने अपनी 262वीं रिपोर्ट (2015) में मृत्युदंड से संबंधित मनमानेपन, भेदभाव, गलत दोषसिद्धि तथा अपराध रोकने में इसकी प्रभावशीलता के निर्णायक प्रमाणों के अभाव जैसी चिंताओं को रेखांकित किया।
- आयोग ने आतंकवाद से संबंधित अपराधों और राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के अपराधों को छोड़कर अन्य सभी अपराधों के लिए मृत्युदंड समाप्त करने की सिफारिश की।
- बच्चन सिंह से लेकर दुपारे तक विकसित किए गए सुरक्षा उपाय न्याय सुनिश्चित करने में बाधा नहीं हैं, बल्कि वे आवश्यक शर्तें हैं, जिन पर मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता आधारित है।
स्रोत: TH