पाठ्यक्रम: GS1/शहरीकरण, GS3/अवसंरचना
संदर्भ
- केंद्रीय बजट, आर्थिक सर्वेक्षण 2026 और 16वें वित्त आयोग ने शहरी नियोजन एवं शासन-व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए राष्ट्रीय शहरीकरण नीति की आवश्यकता पर बल दिया है।
भारत में शहरीकरण की स्थिति
- शहरी जनसंख्या: वर्ष 2011 में भारत के लगभग 8,000 शहरों और कस्बों में 37.7 करोड़ शहरी निवासी थे।
- संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, वर्तमान में भारत की 44% जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करती है। वर्ष 2050 तक इसके 72 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है।
- बदलते बसावट प्रतिरूप: लगभग 94% शहरी बस्तियाँ छोटे कस्बों की श्रेणी में आती हैं, जबकि लगभग 60% शहरी जनसंख्या प्रथम श्रेणी के शहरों में निवास करती है।
- शहरी परिधीय क्षेत्रों का विस्तार: शहरी परिधीय क्षेत्रों का विस्तार लगभग 4.15% वार्षिक दर से हो रहा है, जबकि वर्तमान शहरों की सीमाओं के अंदर विकास दर 2.9% है।
- कार्यात्मक शहरीकरण: आर्थिक सर्वेक्षण 2026 ने रेखांकित किया कि कार्यात्मक दृष्टि से भारत आधिकारिक परिभाषाओं की तुलना में अधिक शहरीकृत है। इसमें उपग्रह-आधारित अनुमानों का उल्लेख किया गया, जिनके अनुसार वर्ष 2015 में भारत का शहरीकरण स्तर 63% था।
संवैधानिक ढाँचा
- अनुच्छेद 243Q: नगर पंचायतों, नगर परिषदों और नगर निगमों के गठन का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 243W: राज्य विधानमंडलों को नगरपालिकाओं को शक्तियाँ एवं उत्तरदायित्व सौंपने का अधिकार प्रदान करता है।
- बारहवीं अनुसूची: उन 18 कार्यों की सूची प्रदान करती है, जिन्हें शहरी स्थानीय निकायों को सौंपा जा सकता है।
- अनुच्छेद 243ZD: जिला योजना समितियों के गठन का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 243ZE: महानगर योजना समितियों के गठन का प्रावधान करता है।
वर्तमान शहरी वर्गीकरण की सीमाएँ
- जनगणना के पुराने मानदंड: जनगणना 2027 में जनगणना नगरों की पहचान के लिए वर्ष 2011 के मानदंडों को बनाए रखा जाएगा:
- कम-से-कम 5,000 की जनसंख्या।
- प्रति वर्ग किलोमीटर कम-से-कम 400 व्यक्तियों का जनसंख्या घनत्व।
- मुख्य पुरुष कामगारों में से कम-से-कम 75% का गैर-कृषि गतिविधियों में संलग्न होना।
- प्रशासनिक सीमाएँ: अनुच्छेद 243Q राज्यों को किसी क्षेत्र को शहरी घोषित करने के संबंध में विवेकाधिकार प्रदान करता है, लेकिन इसमें एकसमान मानदंडों या अनिवार्य आवधिक समीक्षा का प्रावधान नहीं है।
- आर्थिक गतिविधियों और शासन-व्यवस्था के बीच असंगति: कई ऐसी बस्तियाँ, जहाँ अधिकांश रोजगार गैर-कृषि गतिविधियों से संबंधित हैं, अब भी ग्रामीण क्षेत्रों के रूप में प्रशासित होती हैं।
- अपर्याप्त स्थानिक नियोजन: लगभग 52% वैधानिक नगरों और 76% जनगणना नगरों के पास नगर विकास की व्यापक योजनाएँ (मास्टर प्लान) नहीं हैं। इसके परिणामस्वरूप अनियोजित विस्तार और आधारभूत संरचना संबंधी कमियाँ उत्पन्न होती हैं।
राष्ट्रीय शहरीकरण नीति की आवश्यकता क्यों है?
- उभरती हुई शहरी बस्तियों की पहचान: यह एकसमान मानदंड स्थापित करेगी तथा शहरी परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रही बस्तियों की पहचान के लिए आवधिक समीक्षा सुनिश्चित करेगी।
- एकीकृत क्षेत्रीय नियोजन: यह नगरपालिका की सीमाओं से आगे बढ़कर शहरी परिधीय क्षेत्रों और परस्पर जुड़े आर्थिक क्षेत्रों को शामिल करते हुए नियोजन को प्रोत्साहित करेगी।
- शहरी शासन-व्यवस्था को सुदृढ़ करना: यह केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच समन्वय में सुधार करेगी तथा संस्थागत उत्तरदायित्वों को स्पष्ट करेगी।
- नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति में सुधार: भारत में नगरपालिका राजस्व सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 1% है, जबकि ब्राज़ील में यह 7.4% और दक्षिण अफ्रीका में 6% है।
- एक सुसंगत नीति नगरपालिका राजस्व एकत्रित करने की क्षमता को सुदृढ़ कर सकती है तथा पूर्वानुमेय वित्तीय अंतरण सुनिश्चित कर सकती है।
राष्ट्रीय शहरीकरण नीति के लिए सिफारिशें
- विश्व संसाधन संस्थान (WRI) इंडिया की रिपोर्ट ‘भारत में शहरों की समतामूलक, उत्पादक, निम्न-कार्बन एवं लचीली प्रणाली—राष्ट्रीय शहरीकरण नीति के लिए सिफारिशें’ में सात प्रमुख प्रणालीगत बदलावों का प्रस्ताव किया गया है:
- वैधानिक शहरी बस्तियों की परिभाषा एवं वर्गीकरण को मानकीकृत करना।
- स्थानिक एवं क्षेत्रीय नियोजन का आधुनिकीकरण करना।
- शहरीकरण के लिए सार्वजनिक एवं निजी वित्तीय प्रवाह को पुनर्निर्देशित करना।
- राष्ट्रीय शहरीकरण परिषद के नेतृत्व में विभिन्न स्तरों वाली समन्वय व्यवस्था स्थापित करना।
- कार्यात्मक आधारों पर क्षेत्रवार सुधारों को आगे बढ़ाना।
- शहरी राजनीति को सुधारों के लिए प्रोत्साहनकारी व्यवस्था के अनुरूप बनाना।
- ज्ञान के आदान-प्रदान एवं स्थानीय नवाचार को प्रोत्साहित करना।
निष्कर्ष
- भारत को पारंपरिक ग्रामीण-शहरी वर्गीकरण से आगे बढ़कर शहरीकरण के प्रति कार्यात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
- राष्ट्रीय शहरीकरण नीति इस परिवर्तन के प्रबंधन के लिए एक साझा संस्थागत एवं वित्तीय ढाँचा प्रदान कर सकती है। साथ ही, यह समतामूलक, उत्पादक, निम्न-कार्बन एवं जलवायु तथा अन्य चुनौतियों के प्रति सक्षम शहरों के विकास को बढ़ावा दे सकती है।
स्रोत: TH
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