COP31 का 2035 तक विद्युतीकरण को 35 गुना बढ़ाने का लक्ष्य 

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन

संदर्भ

  • COP31 से पहले अंताल्या (तुर्किये) में वर्ष 2035 तक अंतिम ऊर्जा खपत में विद्युत की हिस्सेदारी बढ़ाकर 35% करने के प्रस्तावित वैश्विक लक्ष्य ने जलवायु संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं और विकासात्मक समानता को लेकर परिचर्चा शुरू कर दी है।

35% विद्युतीकरण लक्ष्य (COP31) को समझना

  • प्रस्तावित ‘35×35 वैश्विक विद्युतीकरण संकल्प’ का उद्देश्य वैश्विक अंतिम ऊर्जा खपत में विद्युत की वर्तमान 23% हिस्सेदारी को वर्ष 2035 तक बढ़ाकर 35% करना है।
    • इसका उद्देश्य मुख्य रूप से नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त विद्युत के माध्यम से जीवाश्म ईंधनों से विद्युत की ओर संक्रमण को तीव्र करना है।
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2026 के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) का उत्सर्जन रिकॉर्ड 58 गीगाटन तक पहुँच गया।
    • अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों (NDCs) का पूर्ण कार्यान्वयन होने पर भी वर्ष 2030 तक उत्सर्जन में वर्ष 2025 के स्तर की तुलना में केवल 5–8% की कमी आएगी।
    • 1.5°C तापमान वृद्धि के अनुरूप मार्ग के लिए वर्ष 2030 तक वर्ष 2019 के स्तर की तुलना में उत्सर्जन में 43% से अधिक की कमी आवश्यक है।
  • इसलिए, यह विद्युतीकरण पहल वर्तमान राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से आगे बढ़कर जलवायु कार्रवाई को तीव्र करने का एक प्रयास है।

यह लक्ष्य विकासशील देशों के लिए चिंताएँ क्यों उत्पन्न करता है?

  • विभिन्न विकासात्मक परिस्थितियाँ: विकसित अर्थव्यवस्थाओं के पास अधिक वित्तीय संसाधन, तकनीकी क्षमताएँ और अपेक्षाकृत विकसित विद्युत आधारभूत संरचना उपलब्ध है।
    • विकासशील देशों को एक साथ ऊर्जा तक पहुँच का विस्तार करने, औद्योगीकरण को बढ़ावा देने और गरीबी की समस्या का समाधान करने की आवश्यकता है।
  • विद्युतीकरण का अर्थ स्वतः कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं है: विद्युतीकरण के पर्यावरणीय लाभ विद्युत उत्पादन के स्रोत पर निर्भर करते हैं।
    • यदि विद्युत उत्पादन कोयले पर निर्भर बना रहता है, तो ऊर्जा खपत को विद्युत की ओर स्थानांतरित करने से उत्सर्जन में अपेक्षित कमी नहीं आ सकती।
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बनाम वास्तविक उत्पादन: वैश्विक स्तर पर स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 49.5% है, जबकि वास्तविक विद्युत उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी केवल लगभग 34% है।
    • सौर और पवन ऊर्जा की रुक-रुककर उपलब्धता के कारण उनकी क्षमता उपयोग दर अपेक्षाकृत कम होती है।
    • परिणामस्वरूप, स्थापित क्षमता वास्तविक विद्युत उत्पादन में उसी अनुपात में परिवर्तित नहीं होती।
  • आधारभूत संरचना एवं भंडारण संबंधी बाधाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के लिए पारेषण नेटवर्क, विद्युत ग्रिड के आधुनिकीकरण, बैटरी भंडारण और अन्य संतुलनकारी प्रौद्योगिकियों में पर्याप्त निवेश आवश्यक है।
    • इनके अभाव में नवीकरणीय विद्युत के माध्यम से बढ़ती माँग को विश्वसनीय रूप से पूरा नहीं किया जा सकता।
  • वित्तपोषण संबंधी चुनौतियाँ: विकासशील देशों को उच्च पूँजीगत लागत, सस्ती वित्तीय सहायता तक सीमित पहुँच और परस्पर प्रतिस्पर्धी विकासात्मक प्राथमिकताओं जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
    • अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्तपोषण इन आधारभूत संरचना संबंधी आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं कर पाया है।
  • इस प्रकार, राष्ट्रीय परिस्थितियों पर विचार किए बिना एकसमान लक्ष्य निर्धारित करना ‘समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों एवं संबंधित क्षमताओं’ (CBDR-RC) के सिद्धांत को कमजोर कर सकता है।

भारत और 35% विद्युतीकरण लक्ष्य

  • भारत की स्थिति में जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं और विकासात्मक आवश्यकताओं के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
  • वर्तमान ऊर्जा संबंधी वास्तविकताएँ:
  • भारत की अंतिम ऊर्जा खपत में विद्युत की हिस्सेदारी लगभग 23% है।
  • बड़े जलविद्युत संयंत्रों सहित नवीकरणीय ऊर्जा का विद्युत उत्पादन में योगदान लगभग 26% है।
  • भारत की स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय स्रोतों की हिस्सेदारी 50% से अधिक है।
  • भारत की कुल ऊर्जा खपत का लगभग 72% हिस्सा अभी भी जीवाश्म ईंधनों से पूरा किया जाता है।

भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • बढ़ती ऊर्जा माँग: भारत का आर्थिक विस्तार, शहरीकरण, औद्योगीकरण और जीवन स्तर में सुधार ऊर्जा की आवश्यकताओं में उल्लेखनीय वृद्धि करेंगे।
  • जीवाश्म ईंधनों पर औद्योगिक निर्भरता: इस्पात, सीमेंट, उर्वरक और अन्य ऊर्जा-गहन उद्योग अब भी कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस पर अत्यधिक निर्भर हैं।
    • इनके विद्युतीकरण के लिए हरित हाइड्रोजन सहित व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य विकल्पों की आवश्यकता है।
  • परिवहन क्षेत्र में संक्रमण: परिवहन क्षेत्र के व्यापक विद्युतीकरण के लिए किफायती विद्युत वाहनों, चार्जिंग आधारभूत संरचना और सुदृढ़ बैटरी विनिर्माण क्षमताओं की आवश्यकता है।
    • जैव ईंधन और हरित हाइड्रोजन की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी।
  • विद्युत ग्रिड में एकीकरण: नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के लिए पारेषण गलियारों, ऊर्जा भंडारण, लचीली विद्युत उत्पादन प्रणालियों और स्मार्ट ग्रिड में निवेश आवश्यक है।
  • वित्तीय बाधाएँ: भारत को आधारभूत संरचना के विकास, रोजगार सृजन और किफायती ऊर्जा तक पहुँच से समझौता किए बिना पर्याप्त घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय निवेश एकत्रण की आवश्यकता है।

COP31 में भारत का दृष्टिकोण क्या होना चाहिए?

  • विभेदित मार्गों का समर्थन: भारत को वैश्विक विद्युतीकरण का समर्थन करना चाहिए, लेकिन सभी देशों पर एक समान दृष्टिकोण थोपने का विरोध करना चाहिए।
    • राष्ट्रीय लक्ष्यों में विकासात्मक परिस्थितियों और ऊर्जा सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित किया जाना चाहिए।
  • नवीकरणीय विद्युत उत्पादन को प्राथमिकता: भारत को अंतिम ऊर्जा खपत में विद्युत की हिस्सेदारी पर विशेष ध्यान देने के बजाय वास्तविक विद्युत उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने पर बल देना चाहिए।
  • पारेषण एवं भंडारण को सुदृढ़ करना: हरित ऊर्जा गलियारों, बैटरी भंडारण, पंपित भंडारण जलविद्युत और स्मार्ट ग्रिड में तीव्र निवेश आवश्यक है।
  • तकनीकी विविधीकरण को बढ़ावा देना: हरित हाइड्रोजन, सतत जैव ईंधन, विद्युत गतिशीलता और ऊर्जा-कुशल औद्योगिक प्रौद्योगिकियों को नवीकरणीय विद्युत के पूरक के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
  • किफायती जलवायु वित्त एकत्रण: भारत को विकसित देशों से पूर्वानुमेय, रियायती एवं सुलभ जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण संबंधी सहायता की माँग करनी चाहिए।
  • विकासात्मक अवसरों की रक्षा: भारत की जलवायु रणनीति में उत्सर्जन को क्रमिक रूप से कम करते हुए किफायती ऊर्जा, सार्वभौमिक ऊर्जा पहुँच, औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता और रोजगार सृजन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करना: स्वदेशी सौर मॉड्यूल, बैटरियों, इलेक्ट्रोलाइजरों और महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण को बढ़ावा देने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है तथा हरित रोजगार के अवसर सृजित हो सकते हैं।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

  • वैश्विक ऊर्जा संक्रमण की सफलता का आकलन केवल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता या एकसमान विद्युतीकरण लक्ष्यों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
    • इसका मूल्यांकन वास्तविक उत्सर्जन में कमी, ऊर्जा सुरक्षा, किफायती ऊर्जा और समान पहुँच के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
  • COP31 में भारत को अपनी विकासात्मक वास्तविकताओं की अनदेखी करने वाले बाह्य रूप से निर्धारित मार्गों को स्वीकार किए बिना महत्त्वाकांक्षी जलवायु कार्रवाई का समर्थन करना चाहिए।
  • ऊर्जा भंडारण, पारेषण आधारभूत संरचना, किफायती वित्तपोषण और तकनीकी नवाचार से समर्थित नवीकरणीय विद्युत उत्पादन में क्रमिक किंतु निरंतर वृद्धि, वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की प्रतिबद्धता के बीच संतुलन स्थापित करने का अधिक व्यावहारिक मार्ग प्रदान करती है।
  • अंततः, वैश्विक ऊर्जा संक्रमण का मार्गदर्शन ‘महत्त्वाकांक्षा के साथ समानता’ के सिद्धांत द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि जलवायु कार्रवाई विकास में बाधा बनने के बजाय उसे सक्षम बनाने का माध्यम बन सके।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] स्वच्छ विद्युत उत्पादन, पर्याप्त आधारभूत संरचना और किफायती वित्तपोषण के समर्थन के बिना केवल विद्युतीकरण निम्न-कार्बन ऊर्जा संक्रमण की गारंटी नहीं दे सकता। विश्लेषण कीजिए। 

स्रोत: BS

 

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