पाठ्यक्रम: GS2/वैश्विक शासन; GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- अंतरिक्ष प्रशासन पर चीन के हालिया प्रवृति ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष नियमों को लेकर परिचर्चा को पुनः तीव्र कर दिया है। इसके चलते भारत के समक्ष आर्टेमिस समझौतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती उत्पन्न हुई है।
अंतरिक्ष क्षेत्र और वैश्विक अंतरिक्ष प्रशासन की आवश्यकता
- बाह्य अंतरिक्ष वैज्ञानिक अन्वेषण के क्षेत्र से विकसित होकर अब एक रणनीतिक, वाणिज्यिक और भू-राजनीतिक क्षेत्र बन चुका है।
- उपग्रह अब संचार, नौवहन, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, आपदा प्रबंधन, वित्तीय लेन-देन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
- निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी, अंतरिक्ष मलबे में वृद्धि, उपग्रह-आधारित सैन्य गतिविधियों तथा चंद्रमा के संसाधनों के दोहन की संभावनाओं ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियमों की कमियों को उजागर किया है।
वैश्विक अंतरिक्ष प्रशासन की आवश्यकता
- संघर्ष की रोकथाम: बाह्य अंतरिक्ष के सैन्यीकरण और हथियारीकरण को रोकना।
- समानतापूर्ण पहुँच : यह सुनिश्चित करना कि विकासशील देशों को अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों और प्रौद्योगिकियों तक न्यायसंगत पहुँच प्राप्त हो।
- पर्यावरणीय स्थिरता : अंतरिक्ष मलबे को नियंत्रित करना तथा उपग्रहों के कामकाज में हानिकारक हस्तक्षेप को रोकना।
- वाणिज्यिक विनियमन : अंतरिक्ष गतिविधियों में संलग्न निजी कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना।
- विवाद समाधान: चंद्रमा के संसाधनों और कक्षीय गतिविधियों से जुड़े विवादों के समाधान हेतु पारदर्शी तंत्र विकसित करना।
- चीन के हालिया प्रस्तावों का उद्देश्य अंतरिक्ष प्रशासन में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को सुदृढ़ करना तथा विकासशील देशों को अधिक प्रभावी भागीदारी प्रदान करना है।
- हालाँकि, ये प्रस्ताव इस बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को भी दर्शाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष नियमों का निर्धारण किसके द्वारा किया जाएगा।
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचा
- बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 : यह खगोलीय पिंडों पर राष्ट्रीय संप्रभुता के दावे को प्रतिबंधित करती है तथा कक्षा में सामूहिक विनाश के हथियारों की तैनाती पर रोक लगाती है।
- अंतरिक्ष यात्रियों के बचाव संबंधी समझौता, 1968 : यह संकटग्रस्त अंतरिक्ष यात्रियों को सहायता प्रदान करने से संबंधित दायित्व निर्धारित करता है।
- दायित्व अभिसमय, 1972 : यह अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाली क्षति के लिए राज्यों की जिम्मेदारी निर्धारित करता है।
- पंजीकरण अभिसमय, 1975 : यह राज्यों के लिए प्रक्षेपित अंतरिक्ष वस्तुओं से संबंधित जानकारी का अभिलेख रखने और उसे साझा करने की व्यवस्था करता है।
- चंद्रमा समझौता, 1979 : यह चंद्रमा तथा उसके संसाधनों के अन्वेषण और उपयोग से संबंधित प्रावधान करता है।
- हालाँकि, ये ढाँचे उस समय विकसित किए गए थे, जब अंतरिक्ष गतिविधियाँ मुख्यतः सरकारों के नियंत्रण में थीं। इसलिए, वाणिज्यिक अंतरिक्ष खनन, निजी उपग्रह नेटवर्क और उभरते सैन्य अनुप्रयोगों जैसी समकालीन चुनौतियों के संबंध में इनमें पर्याप्त स्पष्टता का अभाव है।
- आर्टेमिस समझौते, 2020: इनका नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका ने किया। इनके अंतर्गत शांतिपूर्ण चंद्र अन्वेषण, पारदर्शिता, अंतर-संचालनीयता और अंतरिक्ष संसाधनों के उत्तरदायी उपयोग से संबंधित अतिरिक्त सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं।
- इसी प्रकार, चीन और रूस ने बाह्य अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ को रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि को बढ़ावा दिया है।
वैश्विक अंतरिक्ष प्रशासन में भारत की स्थिति एवं प्रयास
- भारत एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग, शांतिपूर्ण अन्वेषण और रणनीतिक स्वायत्तता का समन्वय शामिल है।
- प्रमुख पहलें निम्नलिखित हैं:
- आर्टेमिस समझौते (2023): भारत जून 2023 में इसका हस्ताक्षरकर्ता बना। इसके माध्यम से भारत ने शांतिपूर्ण अन्वेषण, पारदर्शिता और अंतरिक्ष संसाधनों के उत्तरदायी उपयोग से संबंधित सिद्धांतों का समर्थन किया।
- भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: यह भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को सुदृढ़ करते हुए निजी क्षेत्र की भागीदारी, वाणिज्यीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करती है।
- ब्रिक्स में भागीदारी (2026) : भारत ने अंतरिक्ष में हथियार नियंत्रण से संबंधित वार्ताओं का समर्थन किया तथा अंतरिक्ष में हथियारों की प्रतिस्पर्धा रोकने के लिए रूस-चीन द्वारा प्रस्तुत मसौदा संधि को महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में स्वीकार किया।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग : भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने उपग्रह प्रक्षेपण, संयुक्त मिशनों, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी सहयोग के माध्यम से अनेक देशों के साथ साझेदारियाँ विकसित की हैं।
- IN-SPACe सुधार : यह संगठन निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करता है तथा भारतीय और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष उद्योगों के बीच सहयोग को सुगम बनाता है।
- भारत का विकासात्मक अनुभव वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ किफायती उपग्रह सेवाओं, आपदा प्रबंधन और कृषि अनुप्रयोगों के माध्यम से सहयोग सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करता है।
भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा : भारत को अमेरिका के नेतृत्व वाले तथा चीन-रूस के नेतृत्व वाले प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा, ताकि वह किसी भी रणनीतिक गुट के कारण अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता से समझौता न करे।
- नियामकीय कमियाँ : वर्तमान अंतरराष्ट्रीय संधियों में वाणिज्यिक अंतरिक्ष खनन, निजी उपग्रह संचालन और उभरते सुरक्षा खतरों के लिए पर्याप्त विस्तृत प्रावधानों का अभाव है।
- अंतरिक्ष का सैन्यीकरण : वर्ष 2007 में चीन के उपग्रह-रोधी परीक्षण से मलबे के हजारों टुकड़े उत्पन्न हुए थे। भारत द्वारा भी अपनी उपग्रह-रोधी क्षमता का प्रदर्शन किए जाने से उत्तरदायी व्यवहार और हथियार नियंत्रण के महत्त्व को रेखांकित किया गया है।
- प्रौद्योगिकी पर निर्भरता : विदेशी प्रौद्योगिकी, उपग्रह अवसंरचना और महत्त्वपूर्ण घटकों पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक कमजोरियाँ उत्पन्न कर सकती है।
- असमान पहुँच : विकासशील देशों के कुछ शक्तिशाली देशों की सरकारों और कंपनियों द्वारा नियंत्रित प्रौद्योगिकियों एवं सेवाओं पर निर्भर होने का जोखिम है।
- रणनीतिक विश्वास का अभाव : चीन के साथ भारत के भू-राजनीतिक मतभेद विशेषकर महत्त्वपूर्ण अवसंरचना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में गहन प्रौद्योगिकीय सहयोग की संभावनाओं को सीमित करते हैं।
आगे की राह: भारत की रणनीतिक प्राथमिकताएँ
- बहुपक्षीय कूटनीति को सुदृढ़ करना : समावेशी, पारदर्शी और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य नियमों को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र की बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग संबंधी समिति (UNCOPUOS) का प्रभावी उपयोग करना।
- रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना : अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में लचीलापन बनाए रखना तथा परस्पर विरोधी प्रतिबद्धताओं से बचना।
- स्वदेशी क्षमताओं का विकास : प्रक्षेपण यानों, उपग्रह निर्माण, प्रणोदन प्रणालियों, नौवहन और उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों में निवेश करना।
- उत्तरदायी अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देना : अंतरिक्ष मलबे को कम करने, टकराव की पूर्व चेतावनी देने वाली प्रणालियों, पारदर्शिता और सत्यापन योग्य हथियार नियंत्रण व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करना।
- वैश्विक दक्षिण का सशक्तीकरण : कृषि, स्वास्थ्य सेवा, जलवायु निगरानी और आपदा प्रबंधन में उपग्रह-आधारित सहयोग का विस्तार करना।
- घरेलू विनियमन को सुदृढ़ करना : सार्वजनिक और निजी अंतरिक्ष संचालकों की जिम्मेदारियों एवं दायित्वों को परिभाषित करने वाला व्यापक कानूनी ढाँचा स्थापित करना।
- प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना: प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, घरेलू क्षमता निर्माण और स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता के आधार पर अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का मूल्यांकन करना।
निष्कर्ष
- बाह्य अंतरिक्ष एक साझा क्षेत्र बना रहना चाहिए, जिसका संचालन भू-राजनीतिक प्रभुत्व के बजाय सहयोग के सिद्धांत पर आधारित हो।
- भारत को न तो अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को अस्वीकार करना चाहिए और न ही उन पर निर्भर होना चाहिए। उसका दीर्घकालिक उद्देश्य स्वतंत्र रूप से कार्य करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकीय एवं संस्थागत क्षमताओं का विकास करते हुए समावेशी वैश्विक नियमों के निर्माण में योगदान देना होना चाहिए।
- अंततः, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वह कौन-सी साझेदारियाँ स्थापित करता है, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगी कि उन साझेदारियों की अनुपलब्धता की स्थिति में वह स्वतंत्र रूप से क्या प्राप्त कर सकता है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न: एक समावेशी वैश्विक अंतरिक्ष प्रशासन ढाँचे की स्थापना में विद्यमान प्रमुख चुनौतियों की चर्चा कीजिए तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने के प्रति भारत के दृष्टिकोण का परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: TH