पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध; GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) के समक्ष एक मूलभूत चुनौती है—भू-राजनीतिक तनावों और बढ़ते संरक्षणवाद के बीच बदलती आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालना, साथ ही अपने सबसे कमजोर सदस्य देशों के हितों को प्रभावित होने से बचाना।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बारे में
- इसकी स्थापना 1 जनवरी 1995 को माराकेश समझौते के परिणामस्वरूप हुई थी। इस समझौते का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विनियमन करना था।
- यह एक साझा मंच प्रदान करता है, जहाँ व्यापार संबंधी नियमों पर बातचीत की जा सकती है और विवादों का समाधान किया जा सकता है।
- वर्तमान में इसके 166 सदस्य हैं।
प्रमुख सिद्धांत
- मोस्ट फेवर्ड नेशन : किसी एक सदस्य को दिए जाने वाले व्यापारिक लाभ अन्य सदस्य देशों को भी प्रदान किए जाते हैं, हालाँकि इसके अंतर्गत कुछ अपवादों की अनुमति है।
- राष्ट्रीय उपचार : इसका अर्थ है कि आयातित उत्पादों के घरेलू बाजार में प्रवेश करने के बाद उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
- विशेष एवं विभेदक व्यवहार (S&DT): इसके अंतर्गत विकासशील देशों और अल्पविकसित देशों (LDCs) को अधिक लचीली व्यवस्थाओं तथा नियमों के कार्यान्वयन के लिए अतिरिक्त समय की सुविधा प्रदान की जाती है।
- सर्वसम्मति-आधारित निर्णय-निर्माण : इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सहमति स्थापित करना है, साथ ही उनके संप्रभु हितों की रक्षा सुनिश्चित करना भी है।
WTO के मूलभूत सिद्धांतों की पुनर्समीक्षा
- WTO की रूपरेखा का उद्देश्य विकासशील देशों को वैश्विक व्यापार में सम्मिलित करना था। इसके साथ ही, विभिन्न आर्थिक परिस्थितियों में उनकी स्थिति के कारण उत्पन्न विकास संबंधी सीमाओं को भी ध्यान में रखा गया था।
- दूसरी ओर, नई आर्थिक शक्तियों के उदय, अनेक विकासशील देशों में निरंतर बनी निर्धनता और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने इस रूपरेखा को अधिक जटिल बना दिया है।
- एकतरफा शुल्कों और व्यापार प्रतिबंधों के बावजूद, वैश्विक व्यापार का लगभग 72% हिस्सा अब भी मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) की शर्तों के अंतर्गत संचालित होता है। यह दर्शाता है कि बहुपक्षीय व्यापार के नियम आज भी प्रासंगिक हैं।
प्रमुख सुधार एजेंडे
- उभरती अर्थव्यवस्थाओं की दुविधा : WTO के वैश्विक व्यापार परिदृश्य , 2026 के अनुसार, वर्ष 2025 में वस्तु व्यापार की मात्रा में 4.2% की वृद्धि हुई, जो वर्ष 2024 में दर्ज 2.8% की वृद्धि से अधिक थी।
- रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में लगभग 30 प्रमुख उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं (EMEs) का वैश्विक वस्तु निर्यात में लगभग 6.7 ट्रिलियन डॉलर का योगदान था, जबकि वैश्विक वस्तु निर्यात का कुल मूल्य 26.26 ट्रिलियन डॉलर था।
- विशेष एवं विभेदक व्यवहार (S&DT) के लिए अधिक विभेदित दृष्टिकोण अपनाने से निष्पक्षता बढ़ सकती है। हालाँकि, कठोर श्रेणियाँ निर्धारित करने से वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच विभाजन बढ़ सकता है और उनकी सामूहिक वार्तागत शक्ति कमजोर हो सकती है।
- सर्वसम्मति-आधारित निर्णय-निर्माण में सुधार: सर्वसम्मति-आधारित निर्णय प्रणाली छोटी अर्थव्यवस्थाओं को अधिक शक्तिशाली सदस्य देशों के प्रभुत्व से बचाती है। हालाँकि, लंबे समय तक बने रहने वाले मतभेदों के कारण वार्ताएँ ठोस परिणामों तक पहुँचने में विफल हो सकती हैं।
- WTO का व्यापार सुविधा समझौता (TFA) इसका एक उपयोगी उदाहरण है। इसके अंतर्गत कार्यान्वयन संबंधी प्रतिबद्धताएँ विभिन्न सदस्य देशों की क्षमताओं से जुड़ी होती हैं, जबकि अधिक विकसित देश अपने दायित्वों का निर्वहन तत्काल प्रारंभ करते हैं।
- MFN की रक्षा और बहुपक्षीय सदस्यता वाले समझौतों का समाधान : एकतरफा शुल्कों, भेदभावपूर्ण व्यापार उपायों तथा द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौतों के विस्तार से WTO के नियमों की सार्वभौमिकता को चुनौती मिल रही है।
- इसके साथ ही, निवेश सुविधा, ई-कॉमर्स, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा लैंगिक आधार पर उत्पन्न व्यापार बाधाओं से संबंधित पहलों का महत्त्व बढ़ा है।
- विवाद निपटान तंत्र का पुनरुद्धार : दिसंबर 2019 से WTO का विवाद निपटान तंत्र प्रभावित रहा है, क्योंकि अमेरिका द्वारा नियुक्तियों को अवरुद्ध किए जाने के कारण WTO के अपीलीय निकाय में रिक्त पद नहीं भरे जा सके थे।
- इसके परिणामस्वरूप व्यापार नियमों के प्रवर्तन में कमी आई है। यह स्थिति विशेष रूप से उन देशों के लिए चुनौतीपूर्ण है, जिनके पास द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से नियमों का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए पर्याप्त आर्थिक शक्ति नहीं है।
भारत के लिए अवसर
- कृषि एवं मत्स्य पालन सब्सिडी : भारत को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और लोगों की आजीविका की रक्षा करने की आवश्यकताओं तथा टिकाऊ कृषि एवं मत्स्य पालन नीतियों की जरूरतों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
- कृषि समझौते (AoA) के अंतर्गत पात्र ग्रीन बॉक्स उपायों को सब्सिडी में कटौती संबंधी प्रतिबद्धताओं से छूट प्राप्त है।
- भारत के पास संवेदनशील किसानों के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए लक्षित आय सहायता को बेहतर बनाने और कृषि अवसंरचना में निवेश बढ़ाने का अवसर है।
- मत्स्य पालन उद्योग के लिए वित्तपोषण का उद्देश्य केवल मछली पकड़ने की क्षमता बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि मछुआरों की आजीविका को समर्थन देना, मत्स्य संसाधनों का संरक्षण करना और टिकाऊ पद्धतियों को प्रोत्साहित करना भी होना चाहिए।
- निर्णय-निर्माण में सुधार : भारत ऐसी वार्ता प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकता है, जो सर्वसम्मति पर आधारित होने के साथ-साथ अधिक प्रभावी भी हो। इसमें कार्यान्वयन के लिए अलग-अलग समय-सीमाएँ निर्धारित करना और विकासशील देशों को तकनीकी सहायता प्रदान करना शामिल हो सकता है।
- किसी भी सुधार के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाएँ छोटे सदस्य देशों की पर्याप्त भागीदारी के बिना उन पर नियम न थोपें।
- बहुपक्षीय सदस्यता वाले समझौतों में सहभागिता : भारत को ऐसे समझौतों से संबंधित पहलों में रचनात्मक रूप से भाग लेना चाहिए, जिनका उसके आर्थिक हितों पर प्रभाव पड़ता है। इसमें विशेष रूप से ई-कॉमर्स, MSMEs और निवेश सुविधा के क्षेत्र शामिल हैं।
- इस प्रकार की सहभागिता भारत को अन्यत्र विकसित मानकों के अनुरूप स्वयं को ढालने तक सीमित रहने के बजाय उभरते नियमों को आकार देने में भूमिका निभाने का अवसर प्रदान करेगी।
- इस सहभागिता के दौरान घरेलू नीतिगत स्वतंत्रता, डिजिटल संप्रभुता और विकास संबंधी प्राथमिकताओं की रक्षा करना आवश्यक है।
- विवाद निपटान तंत्र की पुनर्स्थापना: भारत यूरोपीय संघ और अन्य मध्यम शक्तियों के साथ सहयोग करके ऐसा अपीलीय तंत्र स्थापित करने की दिशा में कार्य कर सकता है, जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो। इस प्रक्रिया में बहुपक्षीय अंतरिम अपील मध्यस्थता व्यवस्था (MPIA) जैसी अंतरिम व्यवस्थाओं से सीख ली जा सकती है।
- सुधारों में न्यायिक स्वतंत्रता, प्रक्रियागत निष्पक्षता, निर्णयों का प्रभावी प्रवर्तन तथा विकासशील देशों के लिए किफायती पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
भारत के लिए भावी रणनीति
- भारत को पाँच प्राथमिकताओं पर आधारित व्यावहारिक, समावेशी और सुधारोन्मुख व्यापार कूटनीति अपनानी चाहिए:
- विभेदित विशेष एवं विभेदक व्यवहार : S&DT के अंतर्गत मिलने वाली छूटों और लचीलेपन को देशों की स्पष्ट विकास संबंधी आवश्यकताओं से जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही, विकासशील देशों के बीच मनमाने भेद स्थापित करने से बचना चाहिए।
- गठबंधन निर्माण : वार्ताओं के दौरान उत्पन्न मतभेदों को दूर करने के लिए यूरोपीय संघ, अफ्रीकी देशों, ब्राज़ील और अन्य मध्यम शक्तियों के साथ मिलकर गठबंधन बनाए जाने चाहिए।
- सतत सब्सिडी : पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ सहायता उपायों को बढ़ावा देते हुए खाद्य सुरक्षा और लोगों की आजीविका की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- नियम-निर्माण में सहभागिता: राष्ट्रीय हितों की रक्षा सुनिश्चित करते हुए बहुपक्षीय सदस्यता वाले समझौतों से संबंधित वार्ताओं में चयनात्मक और रचनात्मक भागीदारी की जानी चाहिए।
- संस्थागत पुनरुद्धार : विवाद निपटान तंत्र में सुधार, पारदर्शिता बढ़ाने और वार्ता प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- WTO का संकट केवल व्यापार में गिरावट का संकट नहीं है, बल्कि यह विश्वास, प्रतिनिधित्व और संस्थागत प्रभावशीलता से जुड़ा संकट भी है।
- भारत रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षवाद में सक्रिय भागीदारी के बीच संतुलन स्थापित करके अपनी विश्वसनीयता पुनः प्राप्त कर सकता है।
- उद्देश्य न तो सभी वर्तमान नियमों को अपरिवर्तित बनाए रखना होना चाहिए और न ही बहुपक्षवाद को त्यागना। इसके बजाय, एक ऐसी वैश्विक व्यापार व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए, जो अधिक न्यायसंगत, अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और विकास-केंद्रित हो।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) की वर्तमान रूपरेखा की सीमाओं को उजागर किया है। WTO के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियों की चर्चा कीजिए तथा परीक्षण कीजिए कि भारत इसके सुधार में किस प्रकार योगदान दे सकता है। |
स्रोत: BS
Previous article
वन अधिकार अधिनियम (FRA) के अंतर्गत भूमि की कृषि क्षमता का दोहन