चीनी आयात में वृद्धि के बीच भारत के वस्त्र उद्योग का सुदृढ़ीकरण

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • क्लॉथ मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI) के सर्वेक्षण में वस्त्र उद्योग में 52% की वृद्धि की संभावना व्यक्त की गई है। साथ ही, चीन से होने वाले आयात को लेकर चिंताएँ भी व्यक्त की गई हैं।

भारत का वस्त्र क्षेत्र

  • घरेलू व्यापार में योगदान: भारत का घरेलू परिधान एवं वस्त्र उद्योग देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 2.3%, औद्योगिक उत्पादन में 13% तथा निर्यात में 12% का योगदान देता है।
    • वर्ष 2025–26 तक इसका आकार बढ़कर लगभग 190 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है।
  • वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी: वैश्विक वस्त्र एवं परिधान व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 4% है।
  • निर्यात: भारत विश्व में वस्त्र एवं परिधान का छठा सबसे बड़ा निर्यातक है।
    • वर्ष 2023–24 में हस्तशिल्प सहित वस्त्र एवं परिधान (T&A) का भारत के कुल निर्यात में 8.21% का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
  • कच्चे माल का उत्पादन: भारत विश्व में कपास और जूट के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है।
    • भारत विश्व में रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक भी है। विश्व के लगभग 95% हस्तनिर्मित वस्त्रों का उत्पादन भारत में होता है।
  • रोजगार सृजन: वस्त्र उद्योग भारत में रोजगार प्रदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है। यह लगभग 4.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष तथा संबद्ध क्षेत्रों में लगभग 10 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
  • प्रमुख क्षेत्र एवं राज्य: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, झारखंड और गुजरात भारत के प्रमुख वस्त्र एवं परिधान विनिर्माण राज्य हैं।

भारत के वस्त्र क्षेत्र की चुनौतियाँ

  • विखंडित औद्योगिक संरचना: यह क्षेत्र अत्यधिक विखंडित है तथा इसमें छोटे और अनौपचारिक उद्यमों की प्रधानता है। इन उद्यमों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने, प्रौद्योगिकी अपनाने और औपचारिक वित्त तक पहुँच प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • कम श्रम उत्पादकता एवं कौशल का अभाव: पुरानी उत्पादन पद्धतियों, औपचारिक प्रशिक्षण की सीमित उपलब्धता तथा उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच अपर्याप्त समन्वय के कारण श्रम उत्पादकता कम बनी हुई है।
  • उच्च लॉजिस्टिक्स लागत: भारत में परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स की लागत अधिक है। सीमा शुल्क निकासी में होने वाली देरी भी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को कम करती है।
  • किफायती ऋण तक सीमित पहुँच: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा हथकरघा इकाइयों के लिए किफायती ऋण की उपलब्धता एक प्रमुख चुनौती है।

चीन का वस्त्र विनिर्माण मॉडल सफल क्यों है?

  • एकीकृत आपूर्ति शृंखलाएँ: चीन के वस्त्र औद्योगिक क्लस्टर कताई, बुनाई, रंगाई, परिधान निर्माण और सहायक सामग्री के उत्पादन को एक ही औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में समाहित करते हैं।
    • उदाहरण के लिए, झेजियांग प्रांत का शाओक्सिंग वस्त्र एवं कपड़ा व्यापार का एक प्रमुख केंद्र है।
  • प्रौद्योगिकी-आधारित विनिर्माण: चीन की वस्त्र मिलें उत्पादकता और गुणवत्ता में एकरूपता बढ़ाने के लिए स्वचालित कताई, डिजिटल गुणवत्ता निरीक्षण तथा स्मार्ट विनिर्माण प्रणालियों का तेजी से उपयोग कर रही हैं।
  • सुदृढ़ अवसंरचना एवं लॉजिस्टिक्स: औद्योगिक क्लस्टरों को बंदरगाहों, राजमार्गों, भंडारण सुविधाओं और निर्यात नेटवर्क का समर्थन प्राप्त है।
    • निंगबो–झौशान बंदरगाह वस्त्र उत्पादों तथा अन्य विनिर्मित वस्तुओं को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ: बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता से कंपनियाँ प्रति इकाई लागत कम कर सकती हैं और थोक ऑर्डर समय पर पूरा कर सकती हैं।
    • उदाहरण के लिए, ग्वांगझोउ तथा इसके आसपास का पर्ल रिवर डेल्टा विनिर्माण क्षेत्र परिधान निर्माण और व्यापार के व्यापक नेटवर्क के लिए जाना जाता है, जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों की आवश्यकताओं को पूरा करता है।

वस्त्र क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए पहलें

  • प्रधानमंत्री मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल (PM MITRA) पार्क योजना: इसका उद्देश्य भारत में सात मेगा एकीकृत वस्त्र पार्क विकसित करना है। ये तमिलनाडु, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में स्थापित किए जाने हैं।
    • इस योजना का लक्ष्य आधुनिक, एकीकृत और विश्वस्तरीय ‘प्लग-एंड-प्ले’ वस्त्र अवसंरचना विकसित करना है, जिससे उद्यमों को तैयार औद्योगिक सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): जापानी निवेश भारत की ‘मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड’ तथा ‘चाइना-प्लस-वन’ विनिर्माण रणनीतियों के उद्देश्यों के अनुरूप है।
  • उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: वस्त्र क्षेत्र के लिए इस योजना को मानव-निर्मित रेशा (MMF) आधारित परिधान, MMF कपड़ों तथा तकनीकी वस्त्रों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से स्वीकृति दी गई। इसका लक्ष्य वस्त्र क्षेत्र में उत्पादन क्षमता एवं औद्योगिक पैमाने का विस्तार करना और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना है।
  • निर्यात संवर्धन परिषदें (EPCs): भारत में 11 निर्यात संवर्धन परिषदें कार्यरत हैं। ये रेशे से लेकर तैयार उत्पादों तक वस्त्र एवं परिधान मूल्य शृंखला के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनमें हथकरघा, हस्तशिल्प और कालीन जैसे पारंपरिक क्षेत्र भी शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (NTTM): वर्ष 2020 में शुरू किए गए इस मिशन का उद्देश्य भारत में तकनीकी वस्त्रों के उत्पादन, नवाचार और निर्यात को बढ़ावा देना है।
  • राष्ट्रीय रेशा मिशन: इसका उद्देश्य प्राकृतिक और मानव-निर्मित रेशों की उत्पादकता, गुणवत्ता तथा सततता में सुधार करना है।
  • हथकरघा एवं हस्तशिल्प क्षेत्र: राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग ₹2,000 करोड़ का निवेश किया गया है।
    • सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM), इंडिया हैंडमेड पोर्टल, भौगोलिक संकेतक (GI) टैगिंग, मेगा हथकरघा क्लस्टर और बुनकर मुद्रा योजना जैसी पहलों ने बाजार के अवसरों का विस्तार किया है तथा कारीगरों की आय को सुदृढ़ करने में योगदान दिया है।

आगे की राह

  • प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए सहायता: स्वचालित करघे और ऊर्जा-कुशल मशीनें खरीदने वाले MSMEs को समयबद्ध ब्याज सब्सिडी अथवा ऋण गारंटी प्रदान की जानी चाहिए, ताकि वे आधुनिक तकनीक अपना सकें।
  • मानव-निर्मित रेशों तक बेहतर पहुँच: जहाँ प्रतिलोम शुल्क संरचना विद्यमान है, वहाँ उसे तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए। साथ ही, प्रतिस्पर्धी कीमतों पर पॉलिएस्टर और विस्कोस जैसे कच्चे माल की घरेलू उपलब्धता बढ़ाई जानी चाहिए, जिससे भारतीय कंपनियाँ वैश्विक सिंथेटिक परिधान बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकें।
  • वस्त्र आपूर्तिकर्ता नेटवर्क का विकास: ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए जाने चाहिए, जो परिधान निर्यातकों को घरेलू धागा, कपड़ा, रंगाई, सहायक सामग्री और पैकेजिंग आपूर्तिकर्ताओं से जोड़ें। इससे कच्चे माल की खरीद में होने वाली देरी कम होगी तथा आपूर्ति शृंखला अधिक कुशल बनेगी।
  • श्रमिक उत्पादकता में सुधार: उन्नत मशीनों के संचालन, परिधान गुणवत्ता नियंत्रण तथा डिजिटल विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में उद्योग से संबद्ध प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • चीन का अनुभव दर्शाता है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए एकीकृत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र, तकनीकी उन्नति और कुशल आपूर्ति शृंखलाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • भारत के लिए ‘चाइना-प्लस-वन’ रणनीति घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को सुदृढ़ करने तथा वैश्विक निवेश आकर्षित करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करती है।
  • उत्पादकता, नवाचार और सतत विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करके भारत वैश्विक वस्त्र मूल्य शृंखला में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर सकता है। इसके लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी को अपनाना, कौशल विकास को बढ़ावा देना, लॉजिस्टिक्स लागत कम करना और घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं को एकीकृत करना आवश्यक होगा।

स्रोत: TH

 

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