भारत और सऊदी अरब के बीच विद्युत अंतर-संबंध
पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध, GS3/अवसंरचना
संदर्भ
- भारत और सऊदी अरब ने एक आभासी द्विपक्षीय बैठक के दौरान प्रस्तावित विद्युत अंतर-संबंध परियोजना की प्रगति की समीक्षा की तथा विद्युत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के अवसरों पर चर्चा की।
प्रमुख बिंदु
- भारत-सऊदी अरब विद्युत अंतर-संबंध एक प्रस्तावित द्विपक्षीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य समुद्र के अंदर बिछाई जाने वाली लंबी दूरी की उच्च-वोल्टता दिष्ट धारा (HVDC) केबल के माध्यम से दोनों देशों के विद्युत ग्रिडों को जोड़ना है।
- प्रारंभिक समझौता: वर्ष 2023 में रियाद में एक औपचारिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें विद्युत अंतर-संबंध, हरित हाइड्रोजन और आपूर्ति शृंखलाओं से संबंधित सहयोग शामिल है।
- इस परियोजना के अंतर्गत लगभग 1,700 किलोमीटर लंबी समुद्र के अंदर उच्च-वोल्टता विद्युत संपर्क प्रणाली स्थापित करने की योजना है। इसकी अनुमानित लागत लगभग ₹47,000 करोड़ (5.5 अरब अमेरिकी डॉलर) है।
- इस परियोजना का उद्देश्य 2 गीगावाट विद्युत के आदान-प्रदान, आपातकालीन परिस्थितियों में विद्युत सहायता तथा नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण को संभव बनाना है।
स्रोत: DD News
कोलंबो बंदरगाह परियोजना से चीन की कंपनी की वापसी
पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध; GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- चीन की सरकारी कंपनी चाइना मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स ने श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह पर प्रस्तावित 392 मिलियन अमेरिकी डॉलर की रसद केंद्र परियोजना से अपना नाम वापस ले लिया है।
परियोजना के बारे में
- दक्षिण एशिया वाणिज्यिक एवं रसद केंद्र (SACLH) की घोषणा वर्ष 2023 में की गई थी। इस संयुक्त उद्यम में चाइना मर्चेंट्स की 70% हिस्सेदारी प्रस्तावित थी, जबकि श्रीलंका बंदरगाह प्राधिकरण (SLPA) और स्थानीय निर्माण कंपनी एक्सेस इंजीनियरिंग की हिस्सेदारी 15%-15% निर्धारित की गई थी।
- साझेदारों ने बाहरी परिस्थितियों में परिवर्तन, कार्यान्वयन की समय-सीमा और वाणिज्यिक विचारों का हवाला देते हुए परियोजना समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की है।
- हालाँकि, इस वापसी का अर्थ श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र से चीन का व्यापक रूप से पीछे हटना नहीं है।
- चाइना मर्चेंट्स अब भी कोलंबो अंतरराष्ट्रीय कंटेनर टर्मिनल (CICT) का संचालन करती है और हंबनटोटा बंदरगाह के प्रबंधन में भी शामिल है।
भारत की स्थिति
- वर्तमान उपस्थिति: कोलंबो पश्चिम अंतरराष्ट्रीय टर्मिनल में निवेश के माध्यम से भारत की पहले से ही सुदृढ़ उपस्थिति है। अदाणी के नेतृत्व वाला यह टर्मिनल 35 वर्ष की रियायत अवधि के अंतर्गत संचालित होता है, जिसमें जॉन कील्स और श्रीलंका बंदरगाह प्राधिकरण साझेदार हैं।
- पड़ोसी प्रथम नीति तथा सागर/महासागर पहल: भारत का दृष्टिकोण ऋण पर निर्भरता के माध्यम से प्रभाव स्थापित करने के बजाय विकास साझेदारी, संपर्क-सुविधाओं और साझा सुरक्षा पर बल देता है।
- संकट के समय सहायता: भारत ने वर्ष 2022 में श्रीलंका को लगभग 4 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता प्रदान की थी और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रम का समर्थन किया था। इससे दोनों देशों के बीच सद्भावना को बढ़ावा मिला।
- घरेलू बंदरगाह क्षमता: विझिंजम बंदरगाह तथा ग्रेट निकोबार जैसे प्रस्तावित विशाल बंदरगाहों का उद्देश्य विदेशी माल-पुनःलदान केंद्रों पर निर्भरता कम करना है।
स्रोत: TH
अंतरिक्ष विकिरण
पाठ्यक्रम: GS3/अंतरिक्ष
समाचारों में
- मंथली नोटिसेज़ ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक अध्ययन में, SNIFFLES कार्यक्रम के अंतर्गत पाया गया कि स्टारलिंक, वनवेब और चीन के गुओवांग के निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में स्थित उपग्रहों से उत्सर्जित रेडियो संकेत रेडियो खगोल विज्ञान के प्रेक्षणों में हस्तक्षेप करते हैं।
अंतरिक्ष विकिरण क्या है?
- अंतरिक्ष विकिरण उच्च ऊर्जा वाले कणों से बना होता है, जिनमें अधिकांश परमाणु नाभिक होते हैं और जिनसे इलेक्ट्रॉन अलग हो चुके होते हैं। ये कण प्रकाश की गति के लगभग बराबर गति से यात्रा करते हैं।
- अंतरिक्ष विकिरण के प्रकार:
- पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में फँसे हुए कण।
- सौर ज्वालाओं के दौरान अंतरिक्ष में उत्सर्जित कण (सौर कण घटनाएँ)।
- आकाशगंगीय ब्रह्मांडीय किरणें, जिनमें हमारे सौरमंडल के बाहर से आने वाले उच्च ऊर्जा वाले प्रोटॉन और भारी आयन शामिल हैं।
- अंतरिक्ष विकिरण के ये सभी प्रकार आयनकारी विकिरण की श्रेणी में आते हैं।
नवीनतम शोध
- वनवेब से प्राप्त 1,613.19 मेगाहर्ट्ज़ आवृत्ति का संकेत हाइड्रॉक्सिल (OH) आयनों के प्रेक्षणों में हस्तक्षेप कर सकता है।
- कुछ उत्सर्जन सामान्य खगोलीय स्रोतों की तुलना में 100 अरब गुना तक अधिक चमकीले पाए गए। इससे दूरबीनों के प्रेक्षण प्रभावित हो सकते हैं और कमजोर खगोलीय संकेतों का पता लगाना कठिन हो सकता है।
- अध्ययन में उपग्रहों पर वर्तमान अंतरराष्ट्रीय रेडियो-उत्सर्जन नियमों को लागू करने तथा उपग्रह संचालकों, अभिकल्पकों और अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा उत्सर्जनों की निरंतर निगरानी करने की सिफारिश की गई है।
- यह आवश्यकता विशेष रूप से तब महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जब उपग्रहों के माध्यम से सीधे मोबाइल उपकरणों तक संचार सेवाओं का विस्तार हो रहा है।
स्रोत: द हिंदू
आदित्य-एल1 मिशन से नई जानकारियाँ
पाठ्यक्रम: GS3/अंतरिक्ष
संदर्भ
- वैज्ञानिकों ने भारत के प्रथम सौर मिशन आदित्य-एल1 से प्राप्त आँकड़ों का उपयोग करते हुए सूर्य के कोरोना में होने वाली गतिविधियों के डॉप्लर वेग चित्र तैयार किए हैं।
प्रमुख जानकारी
- धनात्मक और ऋणात्मक डॉप्लर वेग क्रमशः प्रेक्षक से दूर जाने वाले और प्रेक्षक की ओर आने वाले सौर प्लाज़्मा की गति को दर्शाते हैं।
- डॉप्लर वेग तरंगों की आवृत्ति में होने वाले परिवर्तन के आधार पर गतिशील वस्तुओं की गति और दिशा मापते हैं। इस घटना को डॉप्लर प्रभाव कहा जाता है।
- इन चित्रों से सूर्य और पृथ्वी की दिशा में कोरोना द्रव्यमान उत्सर्जन (CME) के प्रसार के बारे में जानकारी मिलने की अपेक्षा है। इससे पहले इस प्रकार की जानकारी उपलब्ध नहीं थी।
आदित्य-एल1 के बारे में
- आदित्य-एल1 का प्रक्षेपण वर्ष 2023 में किया गया था। यह सूर्य के अध्ययन के लिए भारत की प्रथम अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला है।
- इसे सूर्य के वर्णमंडल और किरीटमंडल की गतिशीलता का निरीक्षण एवं अध्ययन करने के लिए लैग्रांज बिंदु L1 के निकट स्थापित किया गया है।
- L1 बिंदु अंतरिक्ष में वह स्थान है, जहाँ सूर्य और पृथ्वी जैसे दो खगोलीय पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल संतुलन की स्थिति में होते हैं। इससे वहाँ स्थित किसी वस्तु को अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में बनाए रखने में सहायता मिलती है।
- कुल पाँच लैग्रांज बिंदु होते हैं। इनमें तीन अस्थिर और दो स्थिर होते हैं। अस्थिर लैग्रांज बिंदु L1, L2 और L3 कहलाते हैं, जबकि स्थिर बिंदु L4 और L5 कहलाते हैं।

- निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) की तुलना में L1 बिंदु के निकट आदित्य-एल1 स्थापित करने के लाभ:
- इसकी कक्षा में सूर्य और अंतरिक्ष यान के बीच वेग में परिवर्तन सुचारु रूप से होता है, जो सूर्य के दोलनों के अध्ययन (हेलियोसीस्मोलॉजी) के लिए उपयुक्त है।
- यह पृथ्वी के चुंबकमंडल के बाहर स्थित है, जिससे सौर पवन और सौर कणों के यथास्थान नमूने एकत्र करना संभव होता है।
- यह सूर्य का निर्बाध और निरंतर अवलोकन करने की सुविधा प्रदान करता है। साथ ही, पृथ्वी का दृश्य उपलब्ध होने से भू-आधारित केंद्रों के साथ निरंतर संचार बनाए रखना संभव होता है।
- इसमें सात वैज्ञानिक उपकरण (पेलोड) लगाए गए हैं। इनमें से चार सूर्य का दूरस्थ संवेदन करते हैं, जबकि तीन यथास्थान प्रेक्षण करते हैं।
आदित्य-एल1 के सात वैज्ञानिक उपकरण
- दृश्य उत्सर्जन रेखा किरीटमंडलमापी (VELC): यह सूर्य के किरीटमंडल का अध्ययन, प्रतिबिंबन एवं वर्णक्रमीय विश्लेषण तथा कोरोना द्रव्यमान उत्सर्जन के अध्ययन के लिए उपयोग किया जाता है।
- सौर पराबैंगनी प्रतिबिंबन दूरबीन (SUIT): यह सूर्य के प्रकाशमंडल और वर्णमंडल का संकीर्ण एवं व्यापक वर्णक्रमीय पट्टियों में प्रतिबिंबन करती है। साथ ही, यह सौर विकिरण की तीव्रता में होने वाले परिवर्तनों को मापती है।
- सौर निम्न ऊर्जा एक्स-किरण वर्णक्रममापी (SoLEXS) और उच्च ऊर्जा L1 कक्षा-स्थित एक्स-किरण वर्णक्रममापी (HEL1OS): ये सूर्य से उत्पन्न होने वाली मृदु और कठोर एक्स-किरण ज्वालाओं का व्यापक ऊर्जा परास में अध्ययन करते हैं।
- आदित्य सौर पवन कण प्रयोग (ASPEX) और आदित्य के लिए प्लाज़्मा विश्लेषक उपकरण (PAPA): ये सौर पवन में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों और प्रोटॉनों का विश्लेषण करते हैं तथा उच्च ऊर्जा वाले आयनों का भी अध्ययन करते हैं।
- उन्नत त्रिअक्षीय उच्च-रिज़ॉल्यूशन डिजिटल चुंबकमापी: यह L1 बिंदु पर अंतरग्रहीय चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करती है।
स्रोत: TH
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