पाठ्यक्रम: GS1/सामाजिक मुद्दे
संदर्भ
- बख्तरबंद सेना कोर के एक अधिकारी को व्यभिचार के आरोपों के संबंध में सेना नियम, 1954 के अंतर्गत कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इस नोटिस में प्रशासनिक कार्रवाई के माध्यम से उनकी सेवा समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया।
व्यभिचार क्या है?
- भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497 में व्यभिचार को अपराध के रूप में मान्यता दी गई थी तथा इसके लिए दंड का प्रावधान किया गया था।
- इसके अनुसार, यदि कोई पुरुष किसी अन्य पुरुष की पत्नी के साथ, उस पति की सहमति के बिना, यह जानते हुए या ऐसा विश्वास करने का कारण रखते हुए यौन संबंध स्थापित करता है कि वह महिला किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, तो वह व्यभिचार के अपराध का दोषी माना जाता था।
- इस प्रावधान के अंतर्गत केवल पुरुष को ही व्यभिचार के लिए अभियोजित एवं दंडित किया जा सकता था।
- व्यभिचार के लिए दंडित किए जाने हेतु यह आवश्यक था कि पुरुष ने किसी अन्य पुरुष की पत्नी के साथ उसके पति की सहमति के बिना यौन संबंध स्थापित किए हों।
- दंड: इसके लिए अधिकतम पाँच वर्ष के कारावास और जुर्माने का प्रावधान था।
व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करना
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018) के ऐतिहासिक निर्णय में भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया। न्यायालय ने निम्नलिखित तर्क दिए:
- व्यभिचार एक निजी विषय है और इसके लिए आपराधिक अभियोजन उचित नहीं है।
- यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
- विवाह एक व्यक्तिगत संबंध है तथा राज्य को आपराधिक दायित्व आरोपित करके इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
- हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यभिचार नैतिक रूप से अनुचित आचरण बना रहेगा तथा दीवानी कार्यवाहियों में इसे आधार के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
व्यभिचार के कारण सेना में अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों हो सकती है?
- संविधान का अनुच्छेद 33: यह संसद को सशस्त्र बलों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों में संशोधन करने अथवा उन पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति प्रदान करता है, ताकि वे अपने कर्तव्यों का समुचित निर्वहन कर सकें और अनुशासन बनाए रखा जा सके।
- सेना अधिनियम, 1950 की धारा 45: किसी अधिकारी के पद एवं प्रतिष्ठा के प्रतिकूल आचरण तथा उससे अपेक्षित चरित्र के विरुद्ध व्यवहार के संबंध में कार्रवाई का प्रावधान करती है।
- सेना अधिनियम, 1950 की धारा 63: ऐसे किसी कृत्य या चूक के विरुद्ध कार्रवाई का प्रावधान करती है, जो सैन्य व्यवस्था एवं अनुशासन के लिए प्रतिकूल हो।
- ये प्रावधान ऐसे अनैतिक या व्यभिचारपूर्ण आचरण पर लागू हो सकते हैं, जो सैन्य इकाई की एकजुटता अथवा अनुशासन को प्रभावित करता हो।
- वर्ष 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जोसेफ शाइन निर्णय सेना अधिनियम, नौसेना अधिनियम तथा वायु सेना अधिनियम के अंतर्गत की जाने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को अमान्य नहीं करता और न ही उनमें बाधा उत्पन्न करता है।
भारत में व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के पक्ष में तर्क
- लैंगिक समानता: पूर्ववर्ती कानून के अंतर्गत केवल पुरुषों को अभियोजित किया जा सकता था। व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने से कानून के समक्ष लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलता है।
- व्यक्तिगत स्वायत्तता: व्यभिचार को अपराध मानना संबंधों के संबंध में व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं व्यक्तिगत निर्णय लेने के अधिकार को सीमित करता है।
- स्वस्थ संबंधों को प्रोत्साहन: इसे अपराध की श्रेणी से बाहर करने से ध्यान दंड देने के बजाय वैवाहिक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होता है। इससे व्यक्तियों को कानूनी व्यवस्था का सहारा लेने के बजाय निजी विवादों को आपसी स्तर पर सुलझाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
- न्यायिक व्यवस्था पर भार में कमी: व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने से न्यायालयों पर मुकदमों का भार कम हो सकता है तथा वे अधिक गंभीर आपराधिक मामलों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
भारत में व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के विरुद्ध तर्क
- वैवाहिक संबंधों की पवित्रता की रक्षा: इसे अपराध बनाए रखने के समर्थकों का तर्क है कि इससे वैवाहिक संबंधों की गरिमा एवं स्थिरता की रक्षा की जा सकती है और संबंधों को कमजोर करने वाले आचरण को हतोत्साहित किया जा सकता है।
- निवारक प्रभाव: कानूनी दंड का भय विवाहेतर संबंधों को रोकने में निवारक भूमिका निभा सकता है।
- सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों का संरक्षण: आलोचकों के अनुसार, व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करना ऐसे व्यवहार को प्रोत्साहित करने वाला माना जा सकता है, जो परिवार एवं सामाजिक संरचना की नींव को कमजोर करे।
- महिलाओं पर प्रभाव: पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना वाले समाजों में यह आशंका व्यक्त की जाती है कि व्यभिचार के लिए आपराधिक दंड समाप्त होने से पुरुषों में विवाहेतर संबंधों की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
- मलीमथ समिति: वर्ष 2003 में आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार संबंधी समिति ने सुझाव दिया था कि व्यभिचार को अपराध बनाए रखा जाए, लेकिन इसके प्रावधानों को लैंगिक रूप से तटस्थ बनाया जाए, ताकि पुरुषों एवं महिलाओं के साथ समान व्यवहार हो।
आगे की राह
- सैन्य अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ वैधानिक प्रावधानों, स्थापित प्रक्रियाओं तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप हों।
- न्यायालयों एवं न्यायाधिकरणों को सशस्त्र बलों में अनुशासन बनाए रखने की वैध आवश्यकताओं तथा सैन्यकर्मियों को उपलब्ध प्रक्रियात्मक एवं कानूनी संरक्षणों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए।
स्रोत: IE
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