पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
समाचारों में
- उड़ान योजना के दस वर्ष पूर्ण हो गए हैं। इस योजना ने देश के उन क्षेत्रों को हवाई संपर्क प्रदान करके भारत के क्षेत्रीय विमानन नेटवर्क का उल्लेखनीय विस्तार किया है, जहाँ हवाई सेवाएँ उपलब्ध नहीं थीं या अपर्याप्त थीं।
उड़ान योजना
- शुभारंभ: भारत के प्रधानमंत्री ने वर्ष 2016 में क्षेत्रीय संपर्क योजना (RCS) — उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) का शुभारंभ किया।
- पृष्ठभूमि: इसकी परिकल्पना राष्ट्रीय नागर विमानन नीति, 2016 के अंतर्गत की गई थी। इसका उद्देश्य बाजार-आधारित दृष्टिकोण तथा वित्तीय सहायता के माध्यम से दूसरे और तीसरे स्तर के शहरों को हवाई संपर्क से जोड़ना था। इसके लिए दस वर्षों का दृष्टिकोण निर्धारित किया गया।
- संचालन की शुरुआत: अप्रैल 2017 में शिमला से दिल्ली के बीच प्रथम क्षेत्रीय संपर्क योजना (RCS-UDAN) उड़ान के उद्घाटन के साथ इसका परिचालन आरंभ हुआ।
- प्रोत्साहन व्यवस्था: इस योजना के अंतर्गत विमानन कंपनियों को रियायतें तथा व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) प्रदान किया गया, ताकि वे कम किराए पर क्षेत्रीय एवं दूरस्थ मार्गों पर हवाई सेवाएँ संचालित कर सकें और हवाई यात्रा की सुलभता बढ़ा सकें।

प्रगति
- संचालित हवाई मार्ग: योजना के अंतर्गत भारत में 687 क्षेत्रीय हवाई मार्गों पर परिचालन आरंभ किया गया है।
- परिचालित हवाई अड्डे: कुल 95 हवाई अड्डों, जिनमें 17 हेलीपोर्ट तथा 2 जल हवाई अड्डे शामिल हैं, को परिचालन योग्य बनाया गया है।
- संचालित उड़ानें: इस योजना के अंतर्गत 3.68 लाख से अधिक उड़ानें संचालित की गई हैं।
- लाभान्वित यात्री: इस पहल के माध्यम से 1.72 करोड़ यात्रियों को हवाई यात्रा की सुविधा प्राप्त हुई है।
नवीनतम घटनाक्रम
- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वित्त वर्ष 2026-27 से वित्त वर्ष 2035-36 तक दस वर्षों की अवधि के लिए क्षेत्रीय संपर्क योजना — संशोधित उड़ान के शुभारंभ एवं कार्यान्वयन को स्वीकृति दी है। इसके लिए कुल ₹28,840 करोड़ का व्यय निर्धारित किया गया है।
संशोधित उड़ान योजना के प्रमुख घटक
- 100 हवाई अड्डों का विकास: आगामी आठ वर्षों में मौजूदा, लेकिन अनुपयोगी हवाई पट्टियों को विकसित करके 100 हवाई अड्डे बनाए जाएँगे। इसके लिए ₹12,159 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
- 200 आधुनिक हेलीपैड का निर्माण: दूरस्थ, पहाड़ी, द्वीपीय तथा आकांक्षी क्षेत्रों में 200 आधुनिक हेलीपैड बनाए जाएँगे। इनकी अनुमानित लागत ₹3,661 करोड़ है।
- व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण: क्षेत्रीय हवाई मार्गों पर सेवाएँ संचालित करने के लिए विमानन कंपनियों को दस वर्षों में ₹10,043 करोड़ की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।
योजना का महत्त्व
- समावेशी विकास: दूसरे और तीसरे स्तर के शहर अब राष्ट्रीय बाजार से अधिक प्रभावी ढंग से जुड़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, विजयवाड़ा से कडप्पा तक की यात्रा, जिसमें पहले सड़क मार्ग से 8–10 घंटे लगते थे, अब कम समय में हवाई यात्रा द्वारा पूरी की जा सकती है।
- अवसंरचना का विस्तार: वर्ष 2014 में परिचालित हवाई अड्डों की संख्या 74 थी, जो जुलाई 2026 तक बढ़कर 165 हो गई।
- सामरिक एवं क्षेत्रीय संतुलन: पूर्वोत्तर, पहाड़ी तथा द्वीपीय क्षेत्रों तक हवाई संपर्क बढ़ने से सीमावर्ती क्षेत्रों का राष्ट्रीय एकीकरण मजबूत होता है।
- आर्थिक प्रभाव: क्षेत्रीय हवाई अड्डे पर्यटन, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों तथा शीघ्र खराब होने वाली वस्तुओं के निर्यात को प्रोत्साहित करते हैं।
- विमानन उद्योग में माँग: इस योजना ने एटीआर तथा छोटे विमानों, विमानों के रखरखाव, मरम्मत एवं जीर्णोद्धार (MRO) सेवाओं और विमान चालक प्रशिक्षण की माँग बढ़ाई है। इससे विमानन क्षेत्र में रोजगार के अवसरों को समर्थन मिलता है।
चुनौतियाँ एवं चिंताएँ
- मार्गों की दीर्घकालिक व्यवहार्यता: तीन वर्ष बाद व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण समाप्त होने पर अनेक हवाई मार्गों का परिचालन बंद हो जाता है। कम यात्री संख्या तथा अपर्याप्त माँग के कारण विमानन कंपनियों को इन मार्गों पर सेवाएँ जारी रखने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिलता।
- निष्क्रिय हवाई अड्डे: माँग का समुचित आकलन किए बिना कई हवाई अड्डों का निर्माण या पुनरुद्धार किया गया। संसदीय एवं लेखा-परीक्षा संबंधी रिपोर्टों में अवसंरचना के अपर्याप्त उपयोग तथा हवाई अड्डों तक पहुँचने के लिए अंतिम चरण के परिवहन संपर्क की कमी पर चिंता जताई गई है।
- राजकोषीय भार: सब्सिडी पर निर्भरता से योजना की दीर्घकालिक व्यवहार्यता तथा सार्वजनिक धन के विवेकपूर्ण उपयोग को लेकर प्रश्न उठते हैं।
- विमानन कंपनियों की वित्तीय अस्थिरता: छोटी क्षेत्रीय विमानन कंपनियों को विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) की ऊँची लागत, विभिन्न राज्यों में अलग-अलग मूल्यवर्धित कर (VAT), विमानों को पट्टे पर लेने की लागत तथा विमानों की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके कारण कई संचालकों ने बाजार से अपना परिचालन समेट लिया है।
- परिचालन एवं सुरक्षा संबंधी समस्याएँ: पहाड़ी भूभाग, छोटी हवाई पट्टियाँ, प्रतिकूल मौसम तथा रखरखाव एवं मरम्मत सुविधाओं की सीमित उपलब्धता से परिचालन जोखिम और उड़ानें रद्द होने की समस्या बढ़ती है।
आगे की राह
- माँग-आधारित योजना निर्माण: हवाई मार्ग आवंटित करने से पहले संबंधित क्षेत्र में संभावित यात्रियों एवं आर्थिक गतिविधियों का आकलन किया जाना चाहिए। साथ ही, हवाई अड्डों को रेल, सड़क तथा स्थानीय परिवहन नेटवर्क से जोड़ा जाना चाहिए।
- करों का युक्तिसंगत निर्धारण: परिचालन लागत कम करने के लिए विमानन टरबाइन ईंधन को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाने अथवा विभिन्न राज्यों में मूल्यवर्धित कर की दरों में सामंजस्य स्थापित करने पर विचार किया जाना चाहिए।
- विमानन कंपनियों को सहायता: संरचनात्मक लागत कम करने के लिए विमान पट्टे पर लेने की सुविधाओं, भारत में रखरखाव, मरम्मत एवं जीर्णोद्धार केंद्रों तथा विमान चालक प्रशिक्षण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण को चरणबद्ध रूप से समाप्त करना: सब्सिडी पर निर्भरता कम करके बाजार-आधारित व्यवहार्यता की ओर बढ़ना चाहिए। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रीय मार्गों को एक साथ जोड़ने, लाभकारी मार्गों से प्राप्त आय द्वारा कम लाभकारी मार्गों को सहायता देने तथा क्षेत्रीय मार्गों को व्यावसायिक मार्गों के साथ जोड़ने जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।
स्रोत: PIB
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