पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- राष्ट्रीय राजधानी में बड़े पैमाने पर की गई हिरासतों के बीच, विधि विशेषज्ञों ने इस आधार पर प्रश्न उठाए कि दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली जिले से बाहर के क्षेत्रों में प्रदर्शनकारियों को किस कानूनी आधार पर हिरासत में लिया।
परिचय
- दिल्ली पुलिस का कहना है कि राजधानी में हिरासत की कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के अंतर्गत लागू निषेधाज्ञाओं के उल्लंघन के बाद की गई। ये निषेधाज्ञाएँ अनधिकृत सार्वजनिक सभाओं, प्रदर्शनों और विरोध-प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाती हैं।
- BNSS की धारा 163 किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को ऐसी परिस्थितियों में निषेधाज्ञा जारी करने का अधिकार देती है, जहाँ तत्काल रोकथाम या त्वरित उपचार आवश्यक हो।
- हालाँकि, उन क्षेत्रों से प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के लिए प्रयुक्त कानूनी अधिकार के संबंध में स्पष्टता नहीं थी, जहाँ ऐसी निषेधाज्ञाएँ लागू नहीं थीं।
विरोध प्रदर्शन का अधिकार और प्रतिबंध
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। वहीं, अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- ये प्रावधान नागरिकों को एकत्र होकर अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार प्रदान करते हैं। हालाँकि, इनमें से कोई भी अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है।
- अनुच्छेद 19(2) सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्दिष्ट आधारों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है, जबकि अनुच्छेद 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था के हित में शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर ‘युक्तियुक्त प्रतिबंध’ लगाने का प्रावधान करता है।
- विरोध प्रदर्शनों के संबंध में पुलिस के दिशा-निर्देश: दिल्ली पुलिस के दिशा-निर्देशों में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन आयोजित करने की अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
- प्रस्तावित कार्यक्रम से कम-से-कम 10 दिन पहले सामान्यतः पुलिस उपायुक्त (DCP) के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना आवश्यक है।
- पुलिस उपायुक्त को यह विचार करना होता है कि प्रस्तावित प्रदर्शन से यातायात बाधित होने, मानव सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होने अथवा सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका है या नहीं।
- जंतर-मंतर पर एकत्र होने वाले लोगों की संख्या 1,000 से अधिक नहीं हो सकती। इस सीमा से अधिक लोगों की भागीदारी वाले प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान स्थल हो सकता है।
- अनुमति से मनाही: यदि किसी प्रदर्शन के आयोजक को लगता है कि अनुमति देने से मना करने का निर्णय मनमाना है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है।
- यदि अनुमति से मना किए जाने के बावजूद प्रदर्शन जारी रहता है अथवा निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया जाता है, तो उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। यह धारा लोक सेवक द्वारा विधिपूर्वक जारी आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने से संबंधित है।
- प्रस्तावित कार्यक्रम से कम-से-कम 10 दिन पहले सामान्यतः पुलिस उपायुक्त (DCP) के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना आवश्यक है।
निवारक निरोध क्या है?
- निवारक निरोध का अर्थ किसी व्यक्ति को संभावित अपराध करने से रोकने के उद्देश्य से हिरासत में लेना है। इसका उद्देश्य किसी अपराध के लिए दंड देना नहीं, बल्कि संभावित हानिकारक गतिविधियों को रोकना है।
- निवारक निरोध के आधार: राज्य की सुरक्षा तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना।
- आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति बनाए रखना और रक्षा संबंधी हितों की सुरक्षा करना।
- विदेश संबंधों अथवा भारत की सुरक्षा से संबंधित हितों की रक्षा करना।
- दंडात्मक निरोध: दंडात्मक निरोध का उद्देश्य किसी व्यक्ति द्वारा अपराध किए जाने के बाद, न्यायालय में मुकदमे और दोषसिद्धि के उपरांत उसे दंडित करना है।
- निवारक निरोध के आधार: राज्य की सुरक्षा तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना।
संविधान द्वारा प्रदत्त सुरक्षा उपाय
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और निरोध के संबंध में कुछ महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।
- मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का अधिकार: गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है। यात्रा में लगने वाला समय इस अवधि में शामिल नहीं होता।
- विधिक परामर्श प्राप्त करने का अधिकार: गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के विधि व्यवसायी से परामर्श लेने तथा उसके द्वारा अपना बचाव करवाने का अधिकार प्राप्त है।
- गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी: गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वह अपनी कानूनी स्थिति को समझ सके और उपलब्ध कानूनी उपायों का उपयोग कर सके।
- निरोध की अवधि: संविधान के अनुच्छेद 22(4) के अनुसार, सामान्यतः किसी व्यक्ति को निवारक निरोध के अंतर्गत तीन महीने से अधिक समय तक तब तक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, जब तक संवैधानिक शर्तें पूरी न हों। तीन महीने से अधिक निरोध जारी रखने के लिए, लागू संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, सलाहकार बोर्ड की राय आवश्यक होती है।
निवारक निरोध के पक्ष में तर्क
- राष्ट्रीय सुरक्षा: भारत को आतंकवाद, उग्रवाद और संगठित अपराध सहित विभिन्न आंतरिक एवं बाहरी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- निवारक निरोध इन खतरों से निपटने का एक साधन माना जाता है, क्योंकि इसके माध्यम से कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ उन व्यक्तियों को हिरासत में ले सकती हैं, जिनकी गतिविधियों से राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न होने की आशंका हो और जिनके संबंध में कानूनी शर्तें पूरी होती हों।
- सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना: सामाजिक अशांति, सांप्रदायिक तनाव अथवा सार्वजनिक अव्यवस्था की परिस्थितियों में हिंसा के संभावित विस्तार को रोकने और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए निवारक निरोध का उपयोग किया जा सकता है।
- निवारक प्रभाव: निवारक निरोध संबंधी कानूनों का अस्तित्व तथा उनका कभी-कभी किया जाने वाला उपयोग उन व्यक्तियों या समूहों को गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने से हतोत्साहित कर सकता है, जो ऐसी गतिविधियों पर विचार कर रहे हों।
- संवैधानिक मान्यता: संविधान का अनुच्छेद 22(3) से 22(7) तक निवारक निरोध को मान्यता देता है तथा इसके विनियमन के लिए एक संवैधानिक ढाँचा निर्धारित करता है। यह इस संवैधानिक समझ को दर्शाता है कि कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक हो सकता है।
- सामूहिक कल्याण की सुरक्षा : राज्य का दायित्व है कि वह व्यापक जनसमुदाय के जीवन, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करे। जहाँ विश्वसनीय खतरे इन हितों के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करते हैं, वहाँ कानूनी शर्तों के अधीन निवारक उपायों को उचित ठहराया जा सकता है।
निवारक निरोध के विरुद्ध तर्क
- औपनिवेशिक कानून : निवारक निरोध की व्यवस्था भारत में औपनिवेशिक शासन के दौरान लागू की गई थी और इसका उपयोग बड़े पैमाने पर स्वतंत्रता सेनानियों को निशाना बनाने के लिए किया गया था।
- कानून का दुरुपयोग: यदि जनहित में आवश्यक माना जाए, तो राज्य निरोध के आधारों का प्रकटीकरण करने से मना कर सकता है। राज्य को प्राप्त यह शक्ति अधिकारियों द्वारा मनमानी कार्रवाई की आशंका उत्पन्न करती है।
- संदेह के आधार पर निरोध: निवारक निरोध की व्यवस्था के अंतर्गत संभावित अपराधों की आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की कार्यकारी शक्तियों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है। हालाँकि, केवल संदेह के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तार करने की कोई असीमित शक्ति पुलिस को प्राप्त नहीं है। गिरफ्तारी के लिए लागू कानून की शर्तों का पालन आवश्यक है।
- सामान्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया को दरकिनार करना: निवारक निरोध का उपयोग सामान्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। इससे निष्पक्ष सुनवाई, साक्ष्यों तक पहुँच और स्वयं का बचाव करने के अवसर जैसे स्थापित कानूनी सुरक्षा उपाय प्रभावित होने की आशंका रहती है।
- मौलिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिकूल प्रभाव: निरोध का भय नागरिकों को अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्राप्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा तथा संगठन बनाने के अधिकारों का प्रयोग करने से हतोत्साहित कर सकता है। यह आशंका विशेष रूप से तब बढ़ जाती है, जब अधिकारी असहमति को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में देखते हैं।
निवारक निरोध पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण
- रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य (2011): सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जहाँ सामान्य आपराधिक कानून की आवश्यकताएँ पूरी होती हों, वहाँ निवारक निरोध का उपयोग सामान्य आपराधिक कानून के विकल्प के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
- न्यायालय का व्यापक दृष्टिकोण: यदि निरोध आदेश जारी करने में अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया हो अथवा अन्य स्थापित कानूनी त्रुटियाँ विद्यमान हों, तो ऐसे आदेश को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
आगे की राह
- निवारक निरोध सामूहिक सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती प्रस्तुत करता है।
- यद्यपि असाधारण परिस्थितियों में यह आवश्यक हो सकता है, लेकिन इसका उपयोग सख्ती से सीमित, परिस्थितियों के अनुपात में उचित तथा कठोर न्यायिक समीक्षा के अधीन होना चाहिए।
- मनमाने ढंग से स्वतंत्रता से वंचित किए जाने की घटनाओं को रोकने के लिए अनुच्छेद 22 के अंतर्गत निर्धारित सुरक्षा उपायों का कठोरता से पालन, प्रभावी कानूनी उपचारों तक पहुँच तथा जहाँ सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त हो, वहाँ उसी को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
- इस प्रकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों तथा विधि के शासन की रक्षा करना भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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