पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- हाल ही में नई दिल्ली में जलवायु-लचीले जल प्रबंधन पर केंद्रित 9वें भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह (IIWW) का आयोजन किया गया, जिसमें भारत के जल तक पहुँच के विस्तार से आगे बढ़कर सतत, दक्ष और लचीली जल प्रणालियाँ सुनिश्चित करने की दिशा में हुए संक्रमण को रेखांकित किया गया।
भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह (IIWW)
- आयोजक: भारत सरकार का जल शक्ति मंत्रालय।
- उद्देश्य: उभरती जल संबंधी चुनौतियों और उनके समाधानों पर चर्चा करने के लिए सरकारों, नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, जल विशेषज्ञों, उद्योग, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को एक मंच पर लाना।
- प्रमुख क्षेत्र: जल सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, नदी प्रबंधन, भूजल, सिंचाई, स्वच्छता, अपशिष्ट जल प्रबंधन, जल उपयोग दक्षता और सामुदायिक भागीदारी।
- अंतरराष्ट्रीय आयाम: यह ज्ञान के आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए एक मंच प्रदान करता है, विशेष रूप से विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण के लिए प्रासंगिक समाधानों पर।
- 9वें भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह की विषय-वस्तु: जलवायु-लचीला जल प्रबंधन
जल शासन के बारे में
- जल शासन से आशय उन राजनीतिक, संस्थागत, प्रशासनिक और सहभागी व्यवस्थाओं से है, जिनके माध्यम से जल संसाधनों और जल सेवाओं की योजना बनाई जाती है, उनका आवंटन, विनियमन एवं प्रबंधन किया जाता है।
- यह केवल बाँधों, नहरों और पाइपलाइनों के निर्माण तक सीमित नहीं है। प्रभावी जल शासन में जल की उपलब्धता, गुणवत्ता, मांग प्रबंधन, भूजल, स्वच्छता, अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग, जलवायु जोखिम और सामुदायिक भागीदारी को एकीकृत किया जाता है।
- भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि जल राज्य का विषय है, जबकि नदियाँ, भूजल, कृषि, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन जैसे कई आयाम प्रशासनिक सीमाओं से परे प्रभाव डालते हैं।
वर्तमान परिदृश्य में जल शासन की आवश्यकता
- भारत एक जटिल जल-सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है:
- जलवायु परिवर्तन बाढ़, सूखा, लू और अनियमित वर्षा की आवृत्ति तथा तीव्रता को बढ़ा रहा है।
- तीव्र शहरीकरण और औद्योगीकरण से जल की मांग बढ़ रही है।
- भूजल का ह्रास कई क्षेत्रों में कृषि और पेयजल सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है।
- जल प्रदूषण और अपर्याप्त अपशिष्ट जल उपचार से उपयोग योग्य जल भंडार में कमी आ रही है।
- कृषि अभी भी मीठे जल की सबसे बड़ी उपभोक्ता है, जिससे जल उपयोग दक्षता महत्वपूर्ण हो जाती है।
- वैश्विक स्तर पर विश्व वर्ष 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता सुनिश्चित करने वाले सतत विकास लक्ष्य-6 की दिशा में निर्धारित प्रगति से पीछे चल रहा है और निवेश की कमी को पूरा करने के लिए प्रतिवर्ष अनुमानित 500 अरब डॉलर अतिरिक्त आवश्यकता है।
- अतः जल सुरक्षा अब केवल अभियांत्रिकी की चुनौती नहीं, बल्कि बढ़ती हुई शासन और संस्थागत चुनौती भी है।
भारत की जल शासन यात्रा
- भारत की हालिया जल शासन यात्रा में राजनीतिक प्राथमिकता, सार्वजनिक वित्तपोषण, संस्थागत सुधार और सामुदायिक भागीदारी का समन्वय देखने को मिलता है।
- वर्ष 2001–2014 के दौरान गुजरात का अनुभव एक महत्वपूर्ण नीतिगत प्रयोगशाला के रूप में सामने आया, जिसमें जल अवसंरचना, विकेंद्रीकृत योजना और हितधारकों की भागीदारी पर बल दिया गया।
- इसके बाद अनेक दृष्टिकोणों ने राष्ट्रीय पहलों को दिशा देने में योगदान दिया।
प्रमुख राष्ट्रीय हस्तक्षेप
- स्वच्छ भारत मिशन: इसने स्वच्छता को सार्वजनिक स्वास्थ्य और जल गुणवत्ता से जोड़ा।
- जल जीवन मिशन (JJM): इसका उद्देश्य कार्यशील नल-जल कनेक्शन और सतत ग्रामीण पेयजल सेवाएँ सुनिश्चित करना है।
- नमामि गंगे: यह प्रदूषण में कमी, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और संस्थागत समन्वय को एक साथ जोड़ते हुए नदी-घाटी आधारित दृष्टिकोण अपनाता है।
- अटल भूजल योजना: यह जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में समुदाय के नेतृत्व वाले भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देती है।
- जल शक्ति अभियान: कैच द रेन: यह वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण को बढ़ावा देता है।
- प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी): यह सूक्ष्म सिंचाई और कृषि क्षेत्र में अधिक जल उपयोग दक्षता को प्रोत्साहित करता है।
- व्यापक जल शासन रूपरेखा को ‘4 पी’ के माध्यम से समझा जा सकता है, अर्थात् राजनीतिक नेतृत्व → सार्वजनिक वित्तपोषण → साझेदारियाँ → जनभागीदारी।
- इसका उद्देश्य केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों को समुदायों, नागरिक समाज, ज्ञान संस्थानों और विकास साझेदारों के साथ जोड़ना है।
जलवायु-लचीले जल प्रबंधन के लिए सीख
- शासन को प्राथमिकता दें: जब तक संस्थाएँ जल आपूर्ति प्रणालियों और उपचार संयंत्रों का संचालन एवं रखरखाव प्रभावी ढंग से नहीं कर सकतीं, तब तक केवल पाइपलाइनों और उपचार संयंत्रों का निर्माण जल सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता।
- इसलिए दीर्घकालिक राजनीतिक प्रतिबद्धता, पूर्वानुमेय वित्तपोषण, आँकड़ा प्रणालियाँ और संस्थागत क्षमता आवश्यक हैं।
- संसाधन और सेवा का एक साथ प्रबंधन: नल तभी उपयोगी है जब जल उपलब्ध, सुरक्षित और विश्वसनीय रूप से आपूर्ति किया जा रहा हो। भविष्य की योजना में जल स्रोतों की स्थिरता को सेवा वितरण के साथ एकीकृत करना आवश्यक है।
- यह वैश्विक दक्षिण के तीव्रता से शहरीकरण वाले क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जल संसाधनों और अवसंरचना की संयुक्त योजना भविष्य में होने वाले पुनर्गठन की लागत को कम कर सकती है।
- अपशिष्ट जल को संसाधन के रूप में देखना: भारत को ‘उपयोग करो और त्याग दो’ मॉडल से आगे बढ़कर चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
- उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग उद्योग, भू-दृश्य विकास और कुछ नगरपालिका कार्यों जैसी गैर-पेय आवश्यकताओं के लिए किया जा सकता है।
- अध्ययन के अनुसार, वर्तमान कीमतों पर भारत में उपचारित प्रयुक्त जल से वार्षिक बाजार राजस्व वर्ष 2047 तक लगभग ₹73,000 करोड़ तक पहुँच सकता है।
- समुदायों में जल संबंधी कार्रवाई की जड़ें मजबूत करना: जल समितियों, ग्राम जल-सुरक्षा योजना और सहभागी भूजल प्रबंधन जैसी संस्थाएँ दर्शाती हैं कि स्थानीय स्वामित्व से स्थिरता में सुधार किया जा सकता है।
- गुजरात में आयोजित चिंतन शिविरों का अनुभव दर्शाता है कि संरचित हितधारक परामर्श राजनीतिक प्राथमिकताओं को कार्यान्वयन योग्य नीतियों में बदल सकता है।
- व्यापक दृष्टिकोण अपनाएँ और बड़े पैमाने पर निर्माण करें: जल जीवन मिशन के साथ भारत का अनुभव दर्शाता है कि राजनीतिक नेतृत्व, वित्तपोषण, संस्थागत तंत्र और विकेंद्रीकृत कार्यान्वयन के माध्यम से बड़े पैमाने के सार्वजनिक कार्यक्रमों को लागू करना संभव है।
- वैश्विक दक्षिण के लिए सीख यह है कि भारतीय योजनाओं की यांत्रिक रूप से नकल करने के बजाय स्थानीय पारिस्थितिक, संस्थागत तथा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप शासन के सिद्धांतों को अपनाया जाए।
आगे की राह: भारत की जल नीति का आगामी चरण
- भारत की जल नीति के अगले चरण में निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए:
- पहुँच से सुनिश्चित सेवा वितरण की ओर — गुणवत्ता, मात्रा, नियमितता और वहनीयता सुनिश्चित करना।
- विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में जल बजट और मांग प्रबंधन को बढ़ावा देना।
- जलभृत स्तर के आँकड़ों और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित भूजल शासन को सुदृढ़ करना।
- वर्षा जल संचयन, बाढ़ प्रबंधन और अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग सहित जलवायु-लचीली शहरी जल प्रणालियों का विकास करना।
- विखंडित प्रशासनिक योजना के बजाय एकीकृत नदी-घाटी प्रबंधन को बढ़ावा देना।
- पूर्वानुमान और जल आवंटन के लिए दूरसंवेदी तकनीक, वास्तविक समय निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं जल-मौसम विज्ञान संबंधी आँकड़ों का अधिक उपयोग करना।
- जल गुणवत्ता की निगरानी और प्रदूषण संबंधी मानकों के प्रवर्तन को सुदृढ़ करना।
- सार्वजनिक व्यय, निजी निवेश और बहुपक्षीय विकास संस्थानों को शामिल करते हुए नवीन वित्तपोषण व्यवस्था विकसित करना।
निष्कर्ष
- भारत की जल यात्रा दर्शाती है कि जल सुरक्षा के लिए अवसंरचना, संस्थाओं, वित्त, प्रौद्योगिकी और सामुदायिक स्वामित्व का अभिसरण आवश्यक है।
- जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन जल संबंधी जोखिमों को बढ़ा रहा है, सुधारों की आगामी पीढ़ी को केवल जल उपलब्ध कराने से आगे बढ़कर लचीली, दक्ष, न्यायसंगत और चक्रीय जल प्रणालियाँ सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
- इस प्रकार भारत वैश्विक दक्षिण के लिए ऐसी जल शासन रूपरेखा प्रस्तुत कर सकता है, जिसे किसी निश्चित मॉडल के रूप में थोपने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलित किया जा सके।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत के जलवायु-लचीले जल शासन के अनुभव का परीक्षण कीजिए तथा चर्चा कीजिए कि वैश्विक दक्षिण में जल संबंधी चुनौतियों का समाधान करने के लिए इससे प्राप्त सीखों को किस प्रकार अपनाया जा सकता है। |
स्रोत: IE
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