पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत विश्व में दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, फिर भी यह दलहन का एक प्रमुख आयातक बना हुआ है।
परिचय
- दलहन भारत के कृषि निर्यात में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं तथा भारतीय आहार का एक अभिन्न हिस्सा हैं। ये देश की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- दलहन के इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने 11 अक्टूबर, 2025 को ‘दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन’ का शुभारंभ किया। इसके लिए वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक की अवधि में ₹11,440 करोड़ का वित्तीय प्रावधान किया गया है।
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन: प्रमुख विशेषताएँ
- उत्पादन लक्ष्य: वर्ष 2030–31 तक दलहन उत्पादन को लगभग 350 लाख टन तथा उत्पादकता को बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुँचाने का लक्ष्य है।
- प्रमुख फसलों पर ध्यान: अरहर (तूर), उड़द और मसूर के उत्पादन को बढ़ावा देना।
- जलवायु-अनुकूल बीज: जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील बीजों तथा बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों को प्रोत्साहित करना।
- बीज वितरण: छह वर्षों में 87.5 लाख निःशुल्क बीज किट तथा 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित करना।
- खेती के क्षेत्रफल में विस्तार: दलहन की खेती के क्षेत्रफल में 35 लाख हेक्टेयर की वृद्धि करके वर्ष 2030–31 तक इसे कुल 310 लाख हेक्टेयर तक पहुँचाना।
- क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण: उत्पादन को बढ़ाने के लिए 489 जिलों को शामिल करते हुए क्लस्टर-आधारित रणनीति अपनाना।
- प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना: 1,000 प्रसंस्करण इकाइयों (दाल मिलों) की स्थापना करना।

प्रौद्योगिकी एवं शासन व्यवस्था
- अनुसरणीयता : SATHI पोर्टल बीजों के उत्पादन से लेकर बिक्री तक उनकी निगरानी करता है, जिससे नकली बीजों की आपूर्ति पर अंकुश लगाने में सहायता मिलती है।
- कृषि स्तर पर आँकड़े : कृषि मैपर प्रदर्शन स्थलों की भौगोलिक टैगिंग करता है, जबकि एग्रीस्टैक और डिजिटल फसल सर्वेक्षण किसान पहचान-पत्रों , मृदा स्वास्थ्य तथा सत्यापित कृषि भूखंडों को जोड़कर सटीक उत्पादन पूर्वानुमान में सहायता करते हैं।
- बाजार से जुड़ाव : ई-समृद्धि और विस्तार के माध्यम से प्रत्यक्ष भुगतान तथा कीमतों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है।
- निगरानी : राष्ट्रीय से जिला स्तर तक मिशन के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए तीन-स्तरीय संचालन समिति की व्यवस्था की गई है।
महत्त्व
- पोषण सुरक्षा: दलहन मुख्यतः शाकाहारी जनसंख्या के लिए सुलभ प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत हैं। घरेलू उत्पादन में वृद्धि से प्रोटीन की कमी को दूर करने में सहायता मिलेगी तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और पीएम पोषण (PM POSHAN) जैसी योजनाओं को समर्थन मिलेगा।
- किसानों की आय: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सुनिश्चित खरीद से किसानों को कीमतों में उतार-चढ़ाव के जोखिम से राहत मिल सकती है। इससे किसानों को गेहूँ और चावल की ओर प्रवृत्त होने करने के बजाय दलहन की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
- इसके अतिरिक्त, दलहनी फसलें मृदा में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं, जिससे उर्वरकों की आवश्यकता और सरकारी सब्सिडी का भार कम हो सकता है।
- बाह्य क्षेत्र में स्थिरता : दलहन के आयात में कमी से विदेशी मुद्रा की बचत होगी तथा भारत को आपूर्तिकर्ता देशों में कीमतों के उतार-चढ़ाव और निर्यात प्रतिबंधों से उत्पन्न जोखिमों से सुरक्षा मिलेगी।
- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण : घरेलू आपूर्ति में वृद्धि से दलहन की कीमतों में बार-बार होने वाली तीव्र वृद्धि को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी। इससे खाद्य मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने में भी सहायता मिल सकती है।
- सतत विकास: धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली भूमि में दलहन की खेती तथा फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने से भूमि का बेहतर उपयोग, मृदा स्वास्थ्य में सुधार और जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि की सहनशीलता बढ़ सकती है।
चुनौतियाँ
- कम उत्पादकता: दलहन की खेती मुख्यतः वर्षा-आधारित और कम उपजाऊ भूमि पर की जाती है। इस कारण भारत में इनकी उत्पादकता कनाडा और म्यांमार जैसे देशों की तुलना में कम रहती है। इसके अतिरिक्त, मानसून में परिवर्तनशीलता के कारण उत्पादन में उतार-चढ़ाव होता है।
- खरीद व्यवस्था में कमियाँ : अब तक पंजीकृत किसानों में से लगभग 60% को ही खरीद व्यवस्था का लाभ मिला है तथा सरकारी खरीद कुछ ही राज्यों में केंद्रित है।
- ऐतिहासिक रूप से MSP आधारित समर्थन का अधिक लाभ गेहूँ और चावल को मिला है। इसके परिणामस्वरूप दलहन के संबंध में किसानों की जागरूकता तथा खरीद से जुड़ी व्यवस्थाएँ अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई हैं।
- असमान मूल्य संकेत: मसूर के न्यूनतम समर्थन मूल्य में सीमित वृद्धि से इसकी खेती करने के प्रति किसानों का उत्साह कम हो सकता है। इससे मिशन के अंतर्गत निर्धारित फसल-विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति प्रभावित होने की आशंका है।
- आयात एवं व्यापार नीति में अनिश्चितता: आयात शुल्क और भंडारण सीमा से संबंधित नीतियों में बार-बार बदलाव होने से किसानों तथा व्यापारियों के लिए अनिश्चितता उत्पन्न होती है। इससे उत्पादन और विपणन संबंधी निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।
- बीज एवं विस्तार सेवाओं की कमजोरियाँ : बीज प्रतिस्थापन की धीमी दर, अधिक उपज देने वाली किस्मों का सीमित प्रसार तथा कमजोर कृषि विस्तार सेवाएँ उत्पादकता में वृद्धि को बाधित करती हैं।
- कटाई के पश्चात होने वाली हानियाँ : पर्याप्त भंडारण सुविधाओं की कमी और प्रसंस्करण इकाइयों के बिखरे हुए स्वरूप के कारण किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
- प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY) के अंतर्गत स्वीकृत 23 दलहन प्रसंस्करण इकाइयों में से केवल 18 का निर्माण पूरा हुआ है।
आगे की राह
- प्रौद्योगिकी एवं बीज अनुसंधान : कम अवधि में पकने वाली, कीट-प्रतिरोधी तथा अधिक तापमान सहन करने वाली दलहनी किस्मों का विकास और प्रसार किया जाना चाहिए। इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसंधान तथा बीज केंद्रों को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- स्थिर नीति व्यवस्था : आयात शुल्क को बुवाई के मौसम के अनुरूप निर्धारित किया जाना चाहिए तथा नीतियों में अचानक बदलाव से बचना चाहिए, ताकि किसानों को कीमतों के संबंध में स्थिर एवं पूर्वानुमेय संकेत मिल सकें।
- खरीद व्यवस्था में सुधार : सरकारी खरीद का दायरा अधिक राज्यों और किसानों तक विस्तारित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, किसानों को मूल्य संबंधी जोखिम से सुरक्षा प्रदान करने के लिए मूल्य-अंतर भुगतान को एक पूरक व्यवस्था के रूप में अपनाने पर विचार किया जा सकता है।
- मूल्य संवर्धन शृंखला : दाल मिलों की स्थापना में तीव्रता लाई जानी चाहिए। साथ ही, गोदामों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से उपज के एकत्रीकरण तथा राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) से जुड़ाव में निवेश किया जाना चाहिए।
- फसल प्रणाली में एकीकरण : दलहन को अंतरवर्ती फसल के रूप में तथा धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली भूमि पर उगाने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए जल और उर्वरक की बचत से संबंधित प्रोत्साहन उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
- माँग पक्ष का सुदृढ़ीकरण: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) तथा पोषण संबंधी कार्यक्रमों में दलहन की उपलब्धता और समावेशन को सुदृढ़ किया जाना चाहिए, ताकि इनके लिए स्थिर बाजार और नियमित माँग विकसित हो सके।
स्रोत: PIB