पाठ्यक्रम: GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में, भारतीय रिज़र्व बैंक ने सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने तथा मुद्रा बाजार को स्थिर करने के उद्देश्य से विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न लेन-देन संबंधी नियमों को सख्त किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य लगभग 97 रुपये प्रति डॉलर तक पहुँच रहा है तथा कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई हैं।
प्रमुख आर्थिक संकेतक
- विदेशी मुद्रा भंडार: भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 12.95 अरब डॉलर घटकर 734.60 अरब डॉलर रह गया।
- मुद्रास्फीति का अनुमान: वित्त वर्ष 2026–27 में खुदरा मुद्रास्फीति 5.2% रहने का अनुमान है।
- मौद्रिक नीति: भारतीय रिज़र्व बैंक ने रेपो दर में 25 आधार अंक की वृद्धि करके इसे 5.50% कर दिया।
- अनिवासी विदेशी मुद्रा जमा: विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा योजना के अंतर्गत बैंकों में अनिवासियों द्वारा जमा की गई विदेशी मुद्रा की राशि 143 अरब डॉलर से अधिक होने के बावजूद रुपये के अवमूल्यन का दबाव समाप्त नहीं हुआ है।
भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा किए गए प्रमुख नियामकीय परिवर्तन
- जोखिम सीमा में कमी: अंतर्निहित जोखिम के प्रमाण के बिना निर्धारित विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न लेन-देन करने की सीमा को 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर कर दिया गया है।
- इस प्रकार, सीमा में 95% की कमी की गई है।
- मान्यता प्राप्त शेयर बाजारों में रुपये से संबंधित विनिमय-व्यापारित व्युत्पन्न लेन-देन के लिए भी संबंधित सीमा घटाकर 50 लाख डॉलर कर दी गई है।
- अनुबंधों की पुनर्बुकिंग पर प्रतिबंध: नए निर्देश प्रभावी होने के बाद, रद्द किए गए रुपये से संबंधित व्युत्पन्न अनुबंधों को अधिकृत व्यापारी बैंकों के माध्यम से दोबारा बुक नहीं किया जा सकेगा।
- हालाँकि, वर्तमान नियमों के अधीन परिपक्वता के समय अनुबंधों को आगे बढ़ाने की अनुमति बनी रहेगी।
- दोहरे जोखिम-प्रतिरक्षण की रोकथाम: बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए ग्राहकों से लिखित घोषणा प्राप्त करनी होगी और उसे सुरक्षित रखना होगा कि एक ही अंतर्निहित जोखिम का किसी अन्य अधिकृत व्यापारी बैंक के माध्यम से जोखिम-प्रतिरक्षण नहीं किया गया है।
- विदेशी मुद्रा जोखिम आरक्षित निधि: अधिकृत व्यापारी बैंकों को निर्धारित संरक्षित व्युत्पन्न अनुबंधों की 20 लाख डॉलर से अधिक की काल्पनिक मूल राशि के रुपये में समतुल्य मूल्य का 20% नकद आरक्षित निधि के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक के पास रखना होगा।
- यह प्रावधान बैंकों पर लागू आरक्षित निधि की आवश्यकता है, न कि ग्राहकों पर लगाया गया प्रत्यक्ष 20% शुल्क।
भारतीय रिज़र्व बैंक ने ये उपाय क्यों किए?
- सट्टेबाजी पर अंकुश:– अत्यधिक व्युत्पन्न लेन-देन की स्थितियों को रोकना, जिनसे रुपये के अवमूल्यन का दबाव बढ़ सकता है।
- मुद्रा बाजार में अस्थिरता कम करना:– बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का लाभ उठाने के लिए अनुबंधों को बार-बार रद्द करने और दोबारा बुक करने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना।
- बाह्य आर्थिक स्थिरता की रक्षा:– प्रतिकूल पूँजी प्रवाह, मुद्रा जोखिम-प्रतिरक्षण की बढ़ती माँग तथा कच्चे तेल के आयात की लागत से उत्पन्न दबावों का सामना करके बाह्य आर्थिक स्थिरता बनाए रखना।
- पारदर्शिता को सुदृढ़ करना:– यह सुनिश्चित करना कि विदेशी मुद्रा व्युत्पन्न लेन-देन वास्तविक आर्थिक जोखिमों से अधिक निकटता से जुड़े हों।
- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण:– मुद्रा विनिमय दर में अस्थिरता उत्पन्न करने वाले उतार-चढ़ाव को सीमित करना, जिससे आयातित वस्तुओं, विशेषकर पेट्रोलियम उत्पादों, की रुपये में लागत बढ़ने पर अंकुश लगाया जा सके।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- सकारात्मक प्रभाव: विदेशी मुद्रा बाजार में अनुशासन एवं पारदर्शिता बढ़ेगी।
- सट्टा गतिविधियों तथा अनावश्यक जोखिम-प्रतिरक्षण की संभावनाएँ कम होंगी।
- जोखिम प्रबंधन में सुधार होगा और विनिमय दर में अस्थिरता घट सकती है।
- वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा तथा नियामकीय निगरानी अधिक प्रभावी होगी।
- संभावित चुनौतियाँ: बैंकों एवं व्यवसायों के लिए नियामकीय अनुपालन तथा जोखिम-प्रतिरक्षण की लागत बढ़ सकती है।
- निर्यातकों, आयातकों तथा अन्य वास्तविक बाजार सहभागियों के लिए लेन-देन में लचीलापन कम हो सकता है।
- बाजार की तरलता पर दबाव पड़ सकता है तथा व्युत्पन्न वित्तीय साधनों के मूल्य निर्धारण पर प्रभाव पड़ सकता है।
- रुपये के अवमूल्यन का जोखिम बना रह सकता है, क्योंकि केवल नियामकीय उपाय प्रतिकूल वैश्विक पूँजी प्रवाह अथवा कच्चे तेल की ऊँची कीमतों का प्रतिकार नहीं कर सकते।
आगे की राह
- भारतीय रिज़र्व बैंक को वास्तविक जोखिम-प्रतिरक्षण एवं अत्यधिक सट्टेबाजी के बीच अंतर करते हुए संतुलित और आँकड़ा-आधारित नियामकीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
- बाजार की तरलता, लेन-देन की लागत तथा निर्यातकों एवं आयातकों पर पड़ने वाले प्रभावों की निरंतर निगरानी की जानी चाहिए।
- निगरानी व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के साथ समन्वय बढ़ाया जाना चाहिए।
- ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाना, निर्यात को बढ़ावा देना, स्थिर पूँजी प्रवाह आकर्षित करना तथा पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखना भी आवश्यक है।
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