वैश्विक महामारी समझौते में भारत के हित 

पाठ्यक्रम: GS2/वैश्विक संस्थान; GS3/स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे

संदर्भ

  • हाल ही में, न्यूयॉर्क में आयोजित महामारी की रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया (PPPR) पर संयुक्त राष्ट्र की उच्चस्तरीय बैठक (HLM) में भारत ने वैश्विक समन्वय को सुदृढ़ करने का समर्थन किया। साथ ही, भारत ने समानता, राष्ट्रीय संप्रभुता और सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणालियों पर बल दिया।

वैश्विक महामारी शासन व्यवस्था के बारे में

  • कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य शासन की कई प्रमुख खामियों को उजागर किया। इनमें टीकों और उपचार संबंधी साधनों तक असमान पहुँच, कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियाँ, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता तथा रोग निगरानी की अपर्याप्त व्यवस्था शामिल हैं।
  • उभरती हुई वैश्विक व्यवस्था का उद्देश्य कोविड-19 से प्राप्त अनुभवों और सीख को दो परस्पर संबद्ध स्तंभों के माध्यम से संस्थागत रूप देना है:
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन का महामारी समझौता (PA): यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के संविधान के अंतर्गत वार्ता द्वारा तैयार किया गया एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
    • महामारी की रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया पर संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक घोषणा (PPPR): यह राजनीतिक प्रतिबद्धता व्यक्त करती है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में विकसित कानूनी ढाँचे को पूरक सहयोग प्रदान करती है।
  • इस व्यवस्था के समक्ष केंद्रीय चुनौती वैश्विक एकजुटता और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संतुलन स्थापित करना है। यह चुनौती विशेष रूप से वैश्विक उत्तर एवं वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच महत्त्वपूर्ण है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का महामारी समझौता (PA)

  • इस समझौते को मई 2025 में विश्व स्वास्थ्य सभा द्वारा अपनाया गया। मतदान में 124 देशों ने इसके पक्ष में मत दिया, किसी देश ने विरोध में मत नहीं दिया और 11 देश मतदान से अनुपस्थित रहे।
  • यह महामारी की रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से तैयार किया गया पहला प्रमुख वैश्विक कानूनी ढाँचा है।
  • प्रमुख प्रावधान:
    • एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण (One Health): मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एकीकृत करना।
    • रोग निगरानी प्रणालियों, प्रयोगशालाओं और स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता को सुदृढ़ करना।
    • प्रौद्योगिकी, विनिर्माण और आपूर्ति शृंखलाओं के क्षेत्र में अधिक सहयोग को बढ़ावा देना।
    • टीकों, रोग-निदान साधनों और उपचारों तक समान एवं न्यायसंगत पहुँच सुनिश्चित करना।
    • रोगजनक तक पहुँच एवं लाभ-साझाकरण (PABS) व्यवस्था की स्थापना करना।
  • हालाँकि, इस समझौते का प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी PABS से संबंधित परिशिष्ट पर चल रही वार्ताओं से जुड़ा हुआ है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रोगजनकों और आनुवंशिक जानकारी को साझा करने वाले देशों को भी टीकों, दवाओं और रोग-निदान साधनों जैसे लाभ समय पर तथा न्यायसंगत रूप से प्राप्त हों।
  • वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण के बीच प्रमुख मतभेद स्पष्ट हैं। विकासशील देश प्रौद्योगिकी, वित्तपोषण और संसाधनों तक समान पहुँच की माँग करते हैं। इसके विपरीत, अनेक विकसित देश बौद्धिक संपदा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और राष्ट्रीय नियामक स्वायत्तता को प्रभावित करने वाले बाध्यकारी दायित्वों के प्रति सतर्क हैं।

महामारी की रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया पर संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक घोषणा

  • संयुक्त राष्ट्र की यह घोषणा महामारी की रोकथाम और तैयारी के प्रति व्यापक राजनीतिक प्रतिबद्धता व्यक्त करके विश्व स्वास्थ्य संगठन के समझौते को पूरक बनाती है।
  • इसका महत्त्व निम्नलिखित क्षेत्रों को सुदृढ़ करने में निहित है:
    • सुदृढ़ और न्यायसंगत स्वास्थ्य प्रणालियाँ।
    • अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रोग निगरानी।
    • स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता तथा प्रयोगशाला संबंधी सुविधाएँ।
    • एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण।
    • चिकित्सा संबंधी आवश्यक साधनों तक पहुँच।
    • महामारी के लिए वित्तपोषण और वैश्विक समन्वय।
  • इस प्रकार, उभरती हुई व्यवस्था महामारी प्रबंधन को तदर्थ संकट-प्रतिक्रिया से आगे बढ़ाकर संस्थागत तैयारी की दिशा में ले जाने का प्रयास करती है।

भारत का दृष्टिकोण: राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ वैश्विक एकजुटता

  • भारत अंतरराष्ट्रीय समन्वय का समर्थन करता है, लेकिन उसका मानना है कि सदस्य देशों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप नीतियाँ बनाने का प्राथमिक अधिकार प्राप्त रहना चाहिए।
  • भारत ने इस बात पर बल दिया है कि ‘वैश्विक एकजुटता का प्रमाण ठोस कार्रवाई के माध्यम से दिया जाना चाहिए।’ यह विशेष रूप से टीकों, दवाओं और उपचार संबंधी साधनों तक न्यायसंगत पहुँच सुनिश्चित करने के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है।
  • भारत ने डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना, प्रयोगशाला नेटवर्क और एक स्वास्थ्य संबंधी क्षमताओं सहित वैश्विक सार्वजनिक हित की वस्तुओं एवं सेवाओं के महत्त्व को भी रेखांकित किया है।
  • भारत का यह दृष्टिकोण वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण के बीच के अंतर को समाप्त करने का प्रयास करता है:
    • विकासशील देश: एक स्वास्थ्य के अंतर्गत व्यापक निगरानी जैसी महँगी प्रतिबद्धताओं को स्वीकार करने से पहले वित्तपोषण की माँग करते हैं।
    • विकसित देश: प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा से संबंधित बाध्यकारी दायित्वों के प्रति सतर्क रहते हैं।
    • भारत: राष्ट्रीय नीतिगत स्वतंत्रता को कम किए बिना व्यापक सहमति विकसित करना चाहता है।
  • PABS व्यवस्था और विश्व स्वास्थ्य संगठन की भूमिका से संबंधित चिंताओं के कारण अमेरिका द्वारा घोषणा को अस्वीकार करना राष्ट्रीय संप्रभुता और वैश्विक शासन के बीच जारी परिचर्चा को दर्शाता है।

वैश्विक महामारी शासन में भारत क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • भारत की स्थिति विशिष्ट है, क्योंकि वह एक प्रमुख औषधि निर्माता होने के साथ-साथ एक विकासशील देश भी है।
  • भारत उत्पादन की मात्रा के आधार पर विश्व के सबसे बड़े टीका निर्माताओं में शामिल है और कोविड-19 के दौरान टीकों की आपूर्ति में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
  • हालाँकि, टीकों से संबंधित अनेक प्रौद्योगिकियों और पेटेंट पर बहुराष्ट्रीय औषधि कंपनियों का नियंत्रण बना हुआ है।
  • भारत सक्रिय औषधि संघटकों (APIs) के आयात पर अभी भी अत्यंत सीमा तक निर्भर है।
  • उच्च गुणवत्ता वाले व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (PPE), चिकित्सा उपकरणों और जैव-प्रौद्योगिकी के लिए भारत को उन्नत तकनीकों की आवश्यकता है।
  • इसलिए, भारत को वैश्विक उत्तर के देशों से प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण के देशों को तकनीकी सहायता प्रदान करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।
  • भारत की विशाल स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण डिजिटल स्वास्थ्य, प्रयोगशाला नेटवर्क और एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण के क्षेत्र में उसका अनुभव वैश्विक सार्वजनिक हित की महत्त्वपूर्ण संपत्ति बन सकता है।

भारत से संबंधित प्रयास एवं पहल

  • वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य पहल (GIDH): भारत की वर्ष 2023 की जी-20 अध्यक्षता के दौरान शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य परस्पर अनुकूल डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों को बढ़ावा देना है।
  • राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य कार्यक्रम: यह मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य की एकीकृत निगरानी को प्रोत्साहित करता है।
  • प्रेट पहल (PRET Initiative): भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की उभरते खतरों के लिए तैयारी और प्रत्यास्थता (PRET) पहल में भाग लिया। इसका उद्देश्य भविष्य की महामारियों के लिए तैयारी को सुदृढ़ करना है।
  • टीका कूटनीति: ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल ने विकासशील देशों को टीकों की आपूर्ति करने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया।
  • जी-20 स्वास्थ्य कूटनीति: भारत ने जी-20 के एजेंडे में स्वास्थ्य आपात स्थितियों की तैयारी, डिजिटल स्वास्थ्य और सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणालियों को प्रमुख स्थान दिया।

भारत के लिए आगे की राह

  • दक्षिण-दक्षिण सहयोग का नेतृत्व: भारत को वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ रोग निगरानी, एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण, प्रयोगशालाओं और स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता बढ़ाने के लिए साझेदारियाँ विकसित करनी चाहिए। इससे राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ी चिंताओं के व्यावहारिक समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
  • बहुपक्षीय मंचों का प्रभावी उपयोग: भारत को जी-20, बहुपक्षवाद के लिए साझेदारों तथा अन्य गठबंधनों का उपयोग करके न्यायसंगत वैश्विक महामारी शासन के संबंध में सहमति विकसित करनी चाहिए।
  • घरेलू क्षमता को सुदृढ़ करना: वैश्विक नेतृत्व का आधार घरेलू स्तर पर सुदृढ़ता होनी चाहिए। भारत को सक्रिय औषधि संघटकों पर निर्भरता कम करनी चाहिए, जैव-प्रौद्योगिकी और चिकित्सा उपकरणों के विनिर्माण का विस्तार करना चाहिए, जीनोम निगरानी को सुदृढ़ करना चाहिए तथा नियामक क्षमता में सुधार करना चाहिए।
  • न्यायसंगत PABS व्यवस्था को बढ़ावा देना: भारत को PABS ढाँचे के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि रोगजनकों को साझा करने के साथ उनसे विकसित टीकों, रोग-निदान साधनों और उपचारों तक समयबद्ध एवं किफायती पहुँच भी सुनिश्चित हो।
  • वैश्विक सार्वजनिक हित की वस्तुओं एवं सेवाओं को संस्थागत रूप देना: भारत की डिजिटल स्वास्थ्य संरचना, प्रयोगशाला नेटवर्क और एक स्वास्थ्य संबंधी क्षमताओं को ऐसे विस्तार योग्य मॉडल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिन्हें अन्य विकासशील देश भी अपना सकें।

निष्कर्ष

  • उभरती हुई वैश्विक महामारी व्यवस्था तभी सफल हो सकती है, जब राष्ट्रीय संप्रभुता अलगाव का रूप न ले और वैश्विक एकजुटता बिना वित्तपोषण वाले दायित्वों में न बदल जाए।
  • इसलिए, भारत की रणनीतिक भूमिका वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण के बीच सेतु बनाने तथा अपनी घरेलू स्वास्थ्य क्षमताओं को वैश्विक सार्वजनिक हित की संपत्ति में परिवर्तित करने की है।
  • एक न्यायसंगत महामारी समझौता केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह भारत की अपनी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: विश्व स्वास्थ्य संगठन के महामारी समझौते में भारत के हित जनस्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें रणनीतिक स्वायत्तता, टीकों तक समान पहुँच, औषधि सुरक्षा तथा वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व जैसे व्यापक आयाम भी शामिल हैं। चर्चा कीजिए। 

स्रोत: TH

 

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