पाठ्यक्रम: GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था; औद्योगिक नीति और आर्थिक विकास
संदर्भ
- वर्ष 2026 में, जब ‘मेक इन इंडिया’ पहल अपने 12वें वर्ष में प्रवेश कर रही है, तब विनिर्माण, निर्यात और रोजगार पर इसके प्रभावों का आकलन एक बार पुनः भारत के औद्योगिक रूपांतरण को लेकर चर्चा का विषय बन गया है।
मेक इन इंडिया और इसके 12 वर्षों का प्रदर्शन
- ‘मेक इन इंडिया’ पहल का उद्देश्य निवेश आकर्षित करके, नवाचार को प्रोत्साहित करके, कारोबार करने में सुगमता बढ़ाकर तथा रोजगार सृजित करके भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र में परिवर्तित करना है।
- इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं:
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विनिर्माण क्षेत्र के योगदान को बढ़ाना।
- निर्यात और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देना।
- रोजगार सृजित करना तथा औद्योगिक कौशल में सुधार करना।
- आयात पर निर्भरता कम करना और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना।
- विगत 12 वर्षों में मेक इन इंडिया की उपलब्धियाँ:
- विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर वर्ष 2014 में 2.4% से बढ़कर वर्ष 2025 में 3% हो गई।
- उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के माध्यम से लगभग ₹2.4 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ है।
- वर्ष 2025–26 के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का मूल्य 47.96 अरब डॉलर रहा।
- सौर मॉड्यूल की विनिर्माण क्षमता वर्ष 2014 में 2.3 गीगावाट से बढ़कर लगभग 192 गीगावाट हो गई।
- देश में पेनिसिलिन-G का उत्पादन पुनः शुरू हुआ है, जिससे चीन से इसके आयात की आवश्यकता कम हो रही है।
- हालाँकि, GDP में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान अब भी सरकार के लंबे समय से निर्धारित 25% के लक्ष्य से कम है। इसके अतिरिक्त, घरेलू मूल्यवर्धन और रोजगार सृजन के लाभों का वितरण भी असमान बना हुआ है।
भारत के विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन
- विनिर्माण क्षेत्र के योगदान में वृद्धि: स्थिर कीमतों पर सकल मूल्यवर्धन (GVA) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी वर्ष 2022–23 के 14.7% से बढ़कर वर्ष 2025–26 में 16.1% हो गई।
- निवेश एवं औद्योगिक विस्तार: विनिर्माण क्षेत्र में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की हिस्सेदारी 48% से बढ़कर 55% हो गई।
- PLI योजनाओं का प्रमुख ध्यान इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधि, ऑटोमोबाइल, सौर मॉड्यूल और विशेष इस्पात जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर रहा है।
- रोजगार का औपचारिकीकरण: वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2024–25 में पंजीकृत कारखानों में दर्ज श्रमिकों की संख्या लगभग 2.10 करोड़ रही, जो विगत वर्ष की तुलना में 14 लाख अधिक है।
- विनिर्माण क्षेत्र में कुल रोजगार अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है, जबकि औपचारिक औद्योगिक रोजगार में वृद्धि दिखाई दे रही है।
वैश्विक संदर्भ: तुलनाएँ क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
- विभिन्न विकास परिस्थितियाँ: वैश्विक वस्तु निर्यात वर्ष 2002 के 6.2 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2013 में 18.8 ट्रिलियन डॉलर हो गया, अर्थात इसमें लगभग तीन गुना वृद्धि हुई। इसके विपरीत, वर्ष 2014 से 2025 के बीच इसमें 40% से भी कम वृद्धि हुई और यह 26.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचा।
- वैश्विक व्यवधान: कोविड-19 महामारी, देशों के बीच शुल्क संबंधी विवादों और आपूर्ति शृंखला की समस्याओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की गति को कमजोर किया।
- चीन से प्रतिस्पर्धा: प्रतिस्पर्धात्मक परिदृश्य में चीन का विनिर्माण मूल्यवर्धन लगभग 4.8 ट्रिलियन डॉलर रहा, जो भारत की तुलना में लगभग नौ गुना है। इससे बड़े पैमाने पर उत्पादन और कम कीमतों पर निर्यात करने की चीन की क्षमता के कारण प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ा है।
- तुलनात्मक प्रदर्शन: वर्ष 2014 से 2025 के बीच भारत के विनिर्माण मूल्यवर्धन में डॉलर के संदर्भ में 73% की वृद्धि हुई, जबकि चीन में यह वृद्धि 51% और वैश्विक स्तर पर 36% रही।
औद्योगीकरण को समर्थन देने वाले संरचनात्मक सुधार
- कई सुधारों ने विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ किया है:
- वस्तु एवं सेवा कर (GST): इसने अधिक एकीकृत घरेलू बाजार के निर्माण में सहायता की।
- दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC): इसने वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे व्यवसायों से निपटने की व्यवस्था को बेहतर बनाया।
- कॉरपोरेट कर में कटौती: वर्ष 2019 में कंपनियों पर कर का भार कम करने के लिए कॉरपोरेट कर दर में कटौती की गई।
- जन विश्वास अधिनियम: इसने कारोबार से संबंधित अनेक छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाया।
- श्रम संहिताएँ: इनका उद्देश्य श्रम संबंधी नियमों को सरल बनाना और व्यवसायों के विकास को सुगम बनाना है।
- लॉजिस्टिक्स लागत में कमी: लॉजिस्टिक्स लागत GDP के लगभग 13–14% से घटकर करीब 8% होने का अनुमान है।
- उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ: इन योजनाओं से रणनीतिक औद्योगिक नीति की ओर बढ़ने का संकेत मिलता है, क्योंकि प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ अब घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए सब्सिडी प्रदान कर रही हैं।
निरंतर बनी हुई चुनौतियाँ एवं समस्याएँ
- कम घरेलू मूल्यवर्धन: घरेलू मूल्यवर्धन अब भी लगभग 18–23% है, जो आयातित घटकों पर देश की निरंतर निर्भरता को दर्शाता है।
- रोजगार की कमी: पूँजी-प्रधान विनिर्माण गतिविधियाँ आवश्यक संख्या में रोजगार सृजित नहीं कर पाई हैं, जिससे रोजगार की मांग और उपलब्ध अवसरों के बीच अंतर बना हुआ है।
- श्रम-प्रधान निर्यात का कमजोर प्रदर्शन: वस्त्र क्षेत्र में PLI उपायों के अंतर्गत निवेश अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा है। इसके अतिरिक्त, चीन अब भी कई श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों में अग्रणी स्थान रखता है।
- असमान औद्योगिक विकास: औद्योगिक विकास असमान है, क्योंकि विनिर्माण क्षमताएँ और निवेश अब भी कुछ विशेष क्षेत्रों एवं भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं।
- व्यापार एवं लागत संबंधी दबाव: उच्च इनपुट लागत, आयात से प्रतिस्पर्धा, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक मांग में अनिश्चितता निजी निवेश को कम आकर्षक बनाते हैं।
- कार्यान्वयन संबंधी कमियाँ: भूमि अधिग्रहण की समस्याएँ, नियामकीय जटिलताएँ, कुशल श्रमिकों की कमी तथा अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों का सीमित स्तर प्रमुख कार्यान्वयन संबंधी बाधाएँ हैं।
आगे की राह
- घरेलू मूल्यवर्धन को बढ़ाना: घटक विनिर्माण, अर्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र, औद्योगिक अनुसंधान और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सुदृढ़ करके घरेलू मूल्यवर्धन को बढ़ावा देना चाहिए।
- श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रोत्साहन: बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए वस्त्र, जूते, चमड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और फर्नीचर जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों के विकास पर ध्यान देना चाहिए।
- कारोबारी वातावरण में सुधार: नीतियों की पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करते हुए भूमि अधिग्रहण, अनुमतियाँ प्राप्त करने और नियामकीय आवश्यकताओं के अनुपालन को सरल बनाया जाना चाहिए।
- व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना: प्रतिलोम शुल्क संरचना को कम करके तथा मध्यवर्ती वस्तुओं, घटकों और पूँजीगत उपकरणों पर लागू शुल्कों को सुव्यवस्थित करके व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार किया जाना चाहिए।
- वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से एकीकरण: निवेश आकर्षित करने, निर्यात का विस्तार करने और महत्त्वपूर्ण इनपुट प्राप्त करने के लिए व्यापार समझौतों का उपयोग करते हुए वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जुड़ना चाहिए।
- MSME को सुदृढ़ करना: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए किफायती ऋण, आधुनिक प्रौद्योगिकी, कुशल श्रमिकों और निर्यात बाजारों तक पहुँच में सुधार किया जाना चाहिए।
- परिणामों का आकलन: निवेश प्रतिबद्धताओं के साथ-साथ घरेलू मूल्यवर्धन, उत्पादकता, औपचारिक रोजगार, निर्यात विविधीकरण और नवाचार की नियमित निगरानी की जानी चाहिए।
निष्कर्ष
- ‘मेक इन इंडिया’ पहल के 12 वर्षों के दौरान विनिर्माण क्षमता, निवेश और रणनीतिक उत्पादन के क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति हुई है, लेकिन इसके लाभ असमान रहे हैं।
- अगले चरण में केवल उत्पादन को प्रोत्साहन देने के बजाय ऐसे विनिर्माण तंत्र की स्थापना पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, रोजगार-प्रधान और प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उन्नत हो।
- भारत एक प्रमुख वैश्विक विनिर्माण शक्ति बनने की अपनी आकांक्षा को किस सीमा तक प्राप्त कर पाएगा, यह निरंतर सुधारों, निर्यात के साथ प्रभावी एकीकरण और घरेलू क्षमताओं को सुदृढ़ करने पर निर्भर करेगा।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: परिवर्तित वैश्विक आर्थिक परिवेश में भारत के विनिर्माण क्षेत्र के प्रदर्शन, उपलब्धियों और निरंतर बनी हुई चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: BL
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