पाठ्यक्रम: GS2/शासन, GS3/आंतरिक सुरक्षा
संदर्भ
- प्रोफेसर जी. एन. साईबाबा की पुण्यतिथि के अवसर पर एक बार पुनः लंबे समय तक विचाराधीन हिरासत में रखे जाने तथा गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 के अंतर्गत नागरिक स्वतंत्रताओं के संरक्षण से संबंधित चिंताएँ चर्चा में आई हैं।
गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) क्या है?
- UAPA सरकार को आतंकवादी गतिविधियों के लिए व्यक्तियों की जाँच करने और उन पर मुकदमा चलाने तथा किसी संगठन को ‘गैरकानूनी संगठन’ या ‘आतंकवादी संगठन’ और किसी व्यक्ति को ‘आतंकवादी’ घोषित करने की शक्तियाँ प्रदान करता है।
- इस अधिनियम को राष्ट्रीय एकता परिषद की सिफारिश पर अधिनियमित किया गया था। इस परिषद की स्थापना वर्ष 1961 में देश को विभाजित करने वाली समस्याओं का समाधान खोजने के उद्देश्य से की गई थी।
- हालाँकि, अपने मूल स्वरूप में यह अधिनियम मुख्यतः अलगाववादी गतिविधियों से संबंधित था और इसमें आतंकवाद का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
- प्रमुख प्रावधान
- धारा 38 और 39: इन धाराओं के अंतर्गत आतंकवादी संगठनों से विशिष्ट प्रकार का जुड़ाव तथा उन्हें सहायता प्रदान करने से संबंधित कृत्यों को, संबंधित वैधानिक शर्तों के अधीन, अपराध घोषित किया गया है।
- धारा 35: यह धारा केंद्र सरकार को अधिनियम के प्रावधानों के अधीन किसी संगठन या व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार प्रदान करती है।
- धारा 43D(5): यदि न्यायालय पुलिस रिपोर्ट या केस डायरी की जाँच करने के बाद यह मानता है कि आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सत्य प्रतीत होते हैं, तो उसे जमानत देने से मना करना होता है।
अधिनियम में संशोधन
- वर्ष 2004: इस अधिनियम में प्रथम बार संशोधन किया गया तथा इसके शीर्षक में ‘और आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए’ शब्द जोड़े गए।
- वर्ष 2008: 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद किए गए संशोधनों के माध्यम से आतंकवाद की परिभाषा का विस्तार किया गया तथा लंबी अवधि तक हिरासत और जमानत प्राप्त करने के अधिक कठोर प्रावधान लागू किए गए।
- वर्ष 2012: UAPA में संशोधन करके देश की ‘आर्थिक सुरक्षा’ को भी आतंकवाद के दायरे में शामिल किया गया।
- इसके अंतर्गत भारतीय जाली मुद्रा का उत्पादन, तस्करी और वितरण आतंकवादी कृत्य के रूप में शामिल किया गया।
- वर्ष 2019: इस संशोधन के माध्यम से सरकार को किसी व्यक्ति को भी आतंकवादी घोषित करने का अधिकार प्रदान किया गया। इससे पहले केवल संगठनों को आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान था।
- इस संशोधन की आलोचना इस आधार पर की गई कि यह आपराधिक न्याय प्रणाली के उस मूलभूत सिद्धांत को प्रभावित कर सकता है, जिसके अनुसार प्रत्येक आरोपी को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है।
UAPA अधिनियम से संबंधित चिंताएँ
- जमानत संबंधी कठोर प्रावधान: UAPA के अंतर्गत यदि न्यायाधीश पुलिस रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद यह मानता है कि आरोपों के प्रथम दृष्टया सत्य होने के उचित आधार विद्यमान हैं, तो वह जमानत देने से प्रतिबंधित होता है।
- यह प्रावधान जमानत के चरण में ही आपराधिक मुकदमे से संबंधित कुछ पहलुओं को शामिल कर देता है, जिससे निर्दोषता की उपधारणा के सिद्धांत के समक्ष चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
- विस्तारित हिरासत: UAPA औपचारिक आरोपपत्र दाखिल करने से पहले भी लंबे समय तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है तथा विचाराधीन कैद की अवधि को बढ़ा सकता है।
- यह संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।
- अस्पष्ट परिभाषाएँ: UAPA के अंतर्गत ‘गैरकानूनी गतिविधि’ और ‘आतंकवादी कृत्य’ की परिभाषाएँ व्यापक तथा अस्पष्ट मानी जाती हैं। इससे कानून के दुरुपयोग की आशंका उत्पन्न होती है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और विद्यार्थियों के विरुद्ध UAPA के प्रयोग ने असहमति की आवाज़ों को दबाने की आशंकाएँ उत्पन्न की हैं।
- इसे संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रदत्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संभावित उल्लंघन के रूप में देखा जा सकता है।
- व्यापक विवेकाधीन शक्तियाँ: यह अधिनियम सरकार को व्यापक विवेकाधीन शक्तियाँ प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, यह विशेष न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान करता है, जहाँ गोपनीय गवाहों के उपयोग तथा बंद कमरे में सुनवाई जैसी व्यवस्थाएँ अपनाई जा सकती हैं।
प्रमुख न्यायिक हस्तक्षेप
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली (2019): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43D(5) के अंतर्गत जमानत पर विचार करते समय न्यायालयों को यह जाँचना चाहिए कि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य प्रतीत होते हैं या नहीं। इस चरण में विस्तृत सुनवाई अथवा मुकदमे की तरह साक्ष्यों का पूर्ण परीक्षण करना आवश्यक नहीं है।
- भारत संघ बनाम के. ए. नजीब (2021): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि लंबे समय तक कारावास में रखा जाना तथा मुकदमे की सुनवाई में अनुचित विलंब होना, संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जमानत देने का आधार बन सकता है, भले ही UAPA की धारा 43D(5) में कठोर जमानत संबंधी शर्तें निर्धारित की गई हों।
- थवाहा फसल बनाम भारत संघ (2021): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी आतंकवादी संगठन से मात्र जुड़ाव होना, UAPA की धारा 38 और 39 के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। संबंधित प्रावधानों के अनुसार अपेक्षित आशय का स्थापित होना भी आवश्यक है।
आगे की राह
- कानूनी सुधार: UAPA में संशोधन करके अपराधों की परिभाषाओं को अधिक स्पष्ट बनाया जाना चाहिए तथा जमानत संबंधी कठोर प्रतिबंधों को युक्तिसंगत बनाया जाना चाहिए।
- न्यायिक निगरानी: कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए समय-समय पर न्यायिक समीक्षा की प्रभावी व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण: असहमति व्यक्त करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए।
निष्कर्ष
- UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इसके कठोर प्रावधान नागरिक स्वतंत्रताओं और विधिसम्मत प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
- अतः राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकताओं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। इसके लिए विधायी सुधारों, प्रभावी न्यायिक निगरानी और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करते हुए लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं और विधि के शासन को भी सुरक्षित रखा जा सके।
स्रोत: TH
Previous article
संक्षिप्त समाचार 10-10-2026
Next article
निवारक निरोध और विरोध प्रदर्शन का अधिकार