पाठ्यक्रम: GS2/ सामाजिक न्याय
संदर्भ
- अगस्त 2026 में उत्तराखंड में आयोजित शुद्धिकरण समारोह ने संवैधानिक एवं कानूनी संरक्षण के बावजूद अस्पृश्यता की प्रथा के बने रहने को लेकर एक बार फिर परिचर्चा को तीव्र कर दिया है।
अस्पृश्यता क्या है?
- अस्पृश्यता जाति-आधारित बहिष्कार का एक ऐतिहासिक रूप से स्थापित स्वरूप है, जो शुद्धता और अशुद्धता की पारंपरिक अवधारणाओं पर आधारित है।
- इसके अंतर्गत व्यक्तियों को उनकी जातिगत पहचान के कारण सामाजिक स्थलों, संसाधनों और अवसरों तक समान पहुँच से वंचित किया जाता है।
अस्पृश्यता के विरुद्ध संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान
- संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 15: इसके अनुसार, किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान अथवा इनमें से किसी आधार पर निम्नलिखित मामलों में कोई निर्योग्यता, दायित्व, प्रतिबंध या शर्त नहीं लगाई जाएगी—
- दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थलों में प्रवेश के संबंध में।
- राज्य निधि से पूर्णतः या आंशिक रूप से संचालित अथवा आम जनता के उपयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक उपयोग के स्थानों के उपयोग के संबंध में।
- अनुच्छेद 17: इसके अंतर्गत अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है तथा किसी भी रूप में इसके आचरण को निषिद्ध किया गया है।
- अनुच्छेद 15: इसके अनुसार, किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान अथवा इनमें से किसी आधार पर निम्नलिखित मामलों में कोई निर्योग्यता, दायित्व, प्रतिबंध या शर्त नहीं लगाई जाएगी—
- कानूनी ढाँचा:
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: यह अधिनियम अस्पृश्यता के आचरण तथा उससे संबंधित निर्योग्यताओं को लागू करने की प्रथा को दंडनीय बनाता है।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: इसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के विरुद्ध अत्याचार संबंधी अपराधों को रोकना, ऐसे अपराधों के विचारण की व्यवस्था करना तथा पीड़ितों को राहत एवं पुनर्वास प्रदान करना है।
अस्पृश्यता के बने रहने के प्रमुख कारण
- सामाजिक कारक: शुद्धता एवं अशुद्धता की अवधारणा: कुछ जातियों को पारंपरिक रूप से अशुद्ध मानने वाली धारणाएँ आज भी सामाजिक बहिष्कार को बढ़ावा देती हैं।
- सामाजिक पुनरुत्पादन की व्यवस्था के रूप में जाति: पारिवारिक संरचनाएँ, नातेदारी के संबंध और सामाजिक रीति-रिवाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी जातिगत पदानुक्रम को बनाए रखते हैं।
- अंतर्विवाह (Endogamy): अपनी ही जाति के अंदर विवाह करने की बाध्यताएँ जातिगत पहचान और सामाजिक विभाजनों को सुदृढ़ करती हैं।
- सांस्कृतिक कारक: भेदभाव का सामान्यीकरण: अलग-अलग बर्तनों का उपयोग, बैठने की पृथक व्यवस्था तथा मंदिरों में प्रवेश पर प्रतिबंध जैसी प्रथाओं को कभी-कभी परंपरा और प्रथागत मान्यताओं के नाम पर उचित ठहराया जाता है।
- आर्थिक कारक: जाति एवं वर्ग का अंतर्संबंध: भूमिहीनता, असुरक्षित रोजगार और प्रभुत्वशाली जातियों पर आर्थिक निर्भरता पीड़ितों को भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाने से हतोत्साहित करती है।
- व्यावसायिक पृथक्करण: हाथ से मैला उठाने की प्रथा तथा जोखिमपूर्ण स्वच्छता संबंधी कार्यों में जाति-आधारित संलग्नता यह दर्शाती है कि कानूनी निषेधों और पुनर्वास उपायों के बावजूद जाति-आधारित व्यावसायिक बहिष्करण बना रह सकता है।
प्रमुख न्यायिक हस्तक्षेप
- देवराजैया बनाम बी. पद्मन्ना (1957): मैसूर उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 17 में प्रयुक्त ‘अस्पृश्यता’ शब्द की व्याख्या उसके शाब्दिक या व्याकरणिक अर्थ में नहीं की जा सकती।
- इसके बजाय, यह शब्द विशेष रूप से जन्म के आधार पर व्यक्तियों पर अधिरोपित की गई ऐतिहासिक जाति-आधारित सामाजिक निर्योग्यताओं की व्यवस्था को संदर्भित करता है।
- कर्नाटक राज्य बनाम अप्पा बालू इंगले (1992): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लोकतंत्र और मानवीय गरिमा की स्थापना के लिए जाति व्यवस्था का पूर्ण उन्मूलन आवश्यक है। न्यायालय ने नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के प्रभावी एवं कठोर क्रियान्वयन पर बल दिया।
- सूर्य नारायण चौधरी बनाम राजस्थान राज्य (1988): राजस्थान उच्च न्यायालय ने मंदिर में प्रवेश के लिए जाति-विशिष्ट अनुष्ठानिक शर्तें लागू करने को अस्पृश्यता का प्रत्यक्ष स्वरूप माना।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि समाज के किसी एक वर्ग पर ऐसी शर्तें नहीं अधिरोपित की जा सकतीं, जो अन्य वर्गों पर लागू नहीं होती हैं।
- सुकन्या शांता बनाम भारत संघ (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 17 का दायरा केवल भौतिक बहिष्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्पर्श या उपस्थिति के आधार पर किए जाने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार को भी इसमें सम्मिलित किया जा सकता है।
कानूनी निषेध से आगे आवश्यक उपाय
- शिक्षा में सुधार: पाठ्यक्रमों में समानता, गरिमा और जाति-विरोधी सामाजिक सुधार आंदोलनों से संबंधित विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, शिक्षकों को भेदभावपूर्ण व्यवहार के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए।
- सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा: साझा सार्वजनिक सुविधाओं, समावेशी आवासीय क्षेत्रों और विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक मेल-जोल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि दैनिक जीवन में विद्यमान जातिगत विभाजनों को कमजोर किया जा सके।
- सुलभ नागरिक उपचार की व्यवस्था: आपराधिक अभियोजन के अतिरिक्त, भेदभाव के मामलों में प्रभावी शिकायत निवारण तथा पीड़ितों को उचित उपचार उपलब्ध कराने के लिए सुलभ और प्रभावी तंत्र विकसित किए जाने चाहिए।
- कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन: शिकायतों का शीघ्र पंजीकरण, निष्पक्ष जाँच, समयबद्ध सुनवाई तथा पीड़ितों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
Source: TH
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