भारत का सीमेंट क्षेत्र शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य की राह में एक बड़ी चुनौती

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  • भारत का लक्ष्य वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था बनना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत सरकार को निर्माण क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में कमी लाने की आवश्यकता है।

परिचय

  • भारत की योजना वर्ष 2047 तक एक आर्थिक रूप से विकसित देश बनने तथा वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था बनने की है।
    • इन दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भारत सरकार को उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में से एक, अर्थात् निर्माण क्षेत्र, से निपटना होगा।
  • यह क्षेत्र इस्पात और सीमेंट सहित विभिन्न निर्माण सामग्रियों का उपयोग करता है। विश्वभर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में निर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 35% से 40% है।
    • इस उत्सर्जन का अधिकांश हिस्सा इस्पात और सीमेंट उद्योगों में औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक अत्यधिक उच्च तापमान प्राप्त करने हेतु ऊर्जा के उपयोग के कारण होता है।
    • हालाँकि, इन दोनों क्षेत्रों में सीमेंट उद्योग चूना पत्थर के कैल्सीनीकरण की प्रक्रिया के दौरान भी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है।

भारतीय सीमेंट क्षेत्र

  • भारत, चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक देश है और वैश्विक वार्षिक सीमेंट उत्पादन में इसका योगदान लगभग 13% है।
  • भारत में सीमेंट निर्माण की कुल 333 इकाइयाँ हैं, जिनमें शामिल हैं—
    • 159 एकीकृत बड़े सीमेंट संयंत्र।
    • 116 सीमेंट पीसने वाली इकाइयाँ।
    • 62 लघु सीमेंट संयंत्र।
    • 5 क्लिंकर निर्माण इकाइयाँ।
  • भारत में लगभग 391 मिलियन टन (Mt) सीमेंट के उत्पादन से करीब 246 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (MtCO₂e) उत्सर्जन होता है, जो देश के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 6% है।
  • चूना पत्थर का निष्कर्षण: चूना पत्थर सीमेंट निर्माण का प्रमुख कच्चा माल है। इसका निर्माण सीप और प्रवाल जैसे कैल्शियम-समृद्ध समुद्री जीवों के अवशेषों के लाखों वर्षों तक जीवाश्मीकरण और संपीड़न के परिणामस्वरूप होता है।
    • चूना पत्थर तक पहुँचने के लिए खननकर्ताओं को संबंधित क्षेत्रों में सबसे पहले वनों तथा उपजाऊ मृदा की विभिन्न परतों को हटाना पड़ता है, ताकि तलछटी चट्टानों की परत तक पहुँचा जा सके।
    • कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में चूना पत्थर ऊपरी मृदा के नीचे लगभग 30–60 मीटर की गहराई पर पाया जा सकता है, जबकि राजस्थान में यह अपेक्षाकृत कम गहराई पर उपलब्ध है।
  • कैल्सीनीकरण : सीमेंट निर्माण के दौरान चूना पत्थर को मृदा के साथ मिलाकर लगभग 1,450°C तापमान पर गर्म किया जाता है।
    • इस प्रक्रिया में प्रयुक्त तापीय ऊर्जा सीमेंट निर्माण से होने वाले उत्सर्जन का लगभग 35% से 40% हिस्सा उत्पन्न करती है, जबकि शेष उत्सर्जन मुख्यतः चूना पत्थर के रासायनिक अपघटन के कारण होता है।
    • इस प्रक्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड उप-उत्पाद के रूप में निकलती है तथा छोटे पत्थरनुमा कण बनते हैं, जिन्हें क्लिंकर कहा जाता है।
    • इन क्लिंकरों को पीसकर महीन पाउडर बनाया जाता है तथा जिप्सम और फ्लाई ऐश के साथ विभिन्न अनुपातों में मिलाया जाता है। इसके बाद बाजार में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के सीमेंट का निर्माण और विक्रय किया जाता है।

सुझाव

  • पारंपरिक निर्माण सामग्रियों का उपयोग: ताजमहल जैसी संरचनाओं में प्रयुक्त चूने का गारा तथा प्राचीन रोमन इमारतों में ज्वालामुखीय पदार्थों के साथ उपयोग किए गए चूना-आधारित बंधक पदार्थ पारंपरिक निर्माण विकल्पों की संभावनाओं को प्रदर्शित करते हैं।
  • अपशिष्ट-व्युत्पन्न ईंधन: प्रसंस्कृत ज्वलनशील अपशिष्ट का उपयोग सीमेंट भट्टियों में कोयले और पेट्रोलियम कोक के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।
    • नीति आयोग ने वर्ष 2030 तक 20% तापीय प्रतिस्थापन दर प्राप्त करने की सिफारिश की है। इससे संचयी रूप से लगभग 80 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है।
  • क्लिंकर की मात्रा में कमी: क्लिंकर के स्थान पर फ्लाई ऐश और ब्लास्ट फर्नेस स्लैग जैसे औद्योगिक उप-उत्पादों का उपयोग करने से उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है।
    • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, एक टन क्लिंकर के प्रतिस्थापन से लगभग 0.83 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से बचा जा सकता है।
  • मिश्रित सीमेंट को बढ़ावा देना: पोर्टलैंड पॉज़ोलाना सीमेंट (PPC) और पोर्टलैंड स्लैग सीमेंट (PSC) में साधारण पोर्टलैंड सीमेंट (OPC) की तुलना में क्लिंकर की मात्रा कम होती है। इस कारण ये अपेक्षाकृत कम कार्बन उत्सर्जन वाले विकल्प हैं।
  • कार्बन अभिग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS): चूँकि चूना पत्थर के कैल्सीनीकरण के दौरान रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, इसलिए केवल स्वच्छ ईंधनों के उपयोग से उत्सर्जन को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
    • अतः शेष उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए कार्बन अभिग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) एक महत्त्वपूर्ण विकल्प है।

हरित सीमेंट को अपनाने में चुनौतियाँ

  • संरचनात्मक प्रदर्शन एवं सुदृढ़ता: निर्माणकर्ता प्रायः साधारण पोर्टलैंड सीमेंट (OPC) को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि इसमें अपेक्षाकृत तीव्रता से सुदृढ़ता विकसित होती है। इसके विपरीत, कुछ मिश्रित सीमेंट को आवश्यक सुदृढ़ता प्राप्त करने में अधिक समय लगता है।
  • उद्योग की प्राथमिकता: निर्माण उद्योग पारंपरिक सीमेंट के उपयोग का अभ्यस्त है, क्योंकि इसके लिए स्थापित मानक, आपूर्ति शृंखलाएँ, व्यावसायिक उपलब्धता और व्यापक उपयोग पहले से विद्यमान हैं।
  • अपशिष्ट प्रबंधन: नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट का उचित पृथक्करण न होने के कारण औद्योगिक उपयोग के लिए अपशिष्ट-व्युत्पन्न ईंधन (RDF) की उपलब्धता और गुणवत्ता सीमित रहती है।
  • प्रतिस्थापन की सीमाएँ: क्लिंकर या पारंपरिक ईंधनों के अत्यधिक प्रतिस्थापन से प्रयुक्त सामग्रियों और उत्पादन प्रक्रिया के आधार पर सीमेंट के प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए प्रतिस्थापन तकनीकी एवं सुरक्षा मानकों के अनुरूप होना चाहिए।
  • व्यावसायिक अवसंरचना का अभाव: पारंपरिक निर्माण सामग्रियों और वैकल्पिक बंधक पदार्थों के लिए मानकीकरण, आपूर्ति नेटवर्क तथा बड़े पैमाने पर विनिर्माण क्षमता का अभाव है, जबकि सीमेंट उद्योग में ये व्यवस्थाएँ अपेक्षाकृत विकसित हैं।

आगे की राह

  • सरकारी खरीद को बढ़ावा देना: सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं में प्रमाणित कम-कार्बन सीमेंट की खरीद बढ़ाई जानी चाहिए। इससे प्रारंभिक माँग उत्पन्न होगी और इन विकल्पों को व्यापक स्तर पर अपनाने को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • अपशिष्ट पृथक्करण में सुधार: सीमेंट संयंत्रों में अपशिष्ट-आधारित ईंधनों के अधिक उपयोग को सक्षम बनाने के लिए स्रोत स्तर पर अपशिष्ट पृथक्करण, अपशिष्ट प्रसंस्करण तथा RDF की आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहन: कार्बन अभिग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS), वैकल्पिक बंधक पदार्थों, ऊर्जा-कुशल भट्टियों तथा कम-कार्बन निर्माण सामग्रियों के विकास में निवेश किया जाना चाहिए।
  • निर्माण संबंधी प्रथाओं में सुधार: वास्तुकारों, अभियंताओं और निर्माणकर्ताओं को तकनीकी रूप से उपयुक्त परिस्थितियों में वैकल्पिक सामग्रियों एवं निर्माण डिजाइनों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए विश्वसनीय परीक्षण प्रणालियों और उपयुक्त मानकों की व्यवस्था भी आवश्यक है।

Source: TH

 

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