पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव करता है। इससे संघवाद, जवाबदेही और चुनावी व्यय जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर पुनः परिचर्चा शुरू हुई है।
एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE)
- एक राष्ट्र, एक चुनाव का प्रस्ताव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने से संबंधित है, ताकि मतदाता एक ही निर्वाचन चक्र के अंतर्गत दोनों स्तरों की सरकारों के लिए मतदान कर सकें।
- यह प्रस्ताव केवल चुनाव प्रबंधन में परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए विधायिकाओं के कार्यकाल और उनके विघटन से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं कानूनी परिवर्तन आवश्यक होंगे।
- भारत में वर्ष 1951-52 से 1967 तक वास्तव में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। इसके बाद राज्य विधानसभाओं एवं लोकसभा के समय से पहले विघटन के कारण यह निर्वाचन चक्र बाधित हो गया।
पृष्ठभूमि
- संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 को दिसंबर 2024 में संसद में प्रस्तुत किया गया। इसमें एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था के लिए अनुच्छेद 82A को शामिल करने तथा अनुच्छेद 83, 172 और 327 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।
- इसके बाद विधेयक को परीक्षण के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया।
- संविधान के अनुच्छेद 75(3) और 164(2) के अंतर्गत केंद्र और राज्यों की मंत्रिपरिषदें क्रमशः अपनी-अपनी विधायिकाओं के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी रहती हैं।
- इसलिए यदि कोई सरकार विधायिका का विश्वास खो देती है, तो वह पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने से पहले भी गिर सकती है।
प्रमुख समितियाँ एवं उनकी सिफारिशें
- विधि आयोग, 170वीं रिपोर्ट (1999): इसने एक साथ चुनाव की व्यवस्था को पुनः लागू करने का समर्थन किया, साथ ही संवैधानिक और संस्थागत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता को स्वीकार किया।
- संसद की विभाग-संबंधित स्थायी समिति, 79वीं रिपोर्ट (2015): इसने एक साथ चुनाव की व्यवहार्यता का परीक्षण किया और चरणबद्ध तरीके से इसे लागू करने का सुझाव दिया।
- एक साथ चुनाव पर उच्चस्तरीय समिति (रामनाथ कोविंद समिति, 2024): इसने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने तथा उसके बाद 100 दिनों के अंदर स्थानीय निकायों के चुनाव कराने की सिफारिश की। साथ ही, एक सामान्य मतदाता सूची की भी अनुशंसा की गई।
- भारत निर्वाचन आयोग ने भी पर्याप्त संवैधानिक, तार्किक और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाएँ सुनिश्चित किए जाने की शर्त पर ऐतिहासिक रूप से इस विचार का समर्थन किया है।
एक राष्ट्र, एक चुनाव के पक्ष में तर्क
- कम चुनावी व्यय: बार-बार होने वाले चुनावों के कारण निर्वाचन आयोग, सुरक्षा बलों, प्रशासन और राजनीतिक दलों पर लगातार व्यय का भार पड़ता है।
- नीतिगत निरंतरता: समर्थकों का तर्क है कि बार-बार होने वाले चुनाव और आदर्श आचार संहिता (MCC) नई योजनाओं और नीतिगत निर्णयों की घोषणा को प्रभावित कर सकते हैं।
- प्रशासनिक दक्षता: चुनावों का समन्वय होने से शिक्षकों, सरकारी अधिकारियों, पुलिस तथा सुरक्षा कर्मियों की बार-बार चुनावी ड्यूटी में तैनाती की आवश्यकता कम हो सकती है।
- बेहतर शासन की दीर्घकालिक दृष्टि: सरकारें बार-बार चुनावी तैयारी में जाने के बजाय दीर्घकालिक नीतियों और कार्यक्रमों को अधिक निरंतरता के साथ लागू कर सकती हैं।
एक राष्ट्र, एक चुनाव के विरोध में तर्क
- संसदीय जवाबदेही के साथ तनाव: एक निश्चित निर्वाचन कैलेंडर ऐसी व्यवस्था के साथ सहज रूप से सामजस्यशील नहीं है, जिसमें सरकार तभी तक सत्ता में बनी रहती है, जब तक उसे विधायिका का विश्वास प्राप्त हो।
- यदि किसी राज्य विधानसभा का कार्यकाल निर्वाचन चक्र के बीच में समाप्त हो जाता है, तो या तो अल्पकालिक सरकार के लिए चुनाव कराना होगा या राष्ट्रपति शासन जैसे संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेना पड़ सकता है। दोनों ही स्थितियाँ लोकतांत्रिक जनादेश को लेकर प्रश्न उत्पन्न करती हैं।
- संघवाद के लिए चुनौती: भारत की संघीय व्यवस्था विभिन्न क्षेत्रीय पहचानों और राजनीतिक प्राथमिकताओं को समायोजित करती है।
- एक साथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दों और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का राज्य स्तरीय चुनावों पर अधिक प्रभाव पड़ सकता है। इससे क्षेत्रीय दलों तथा राज्य-विशिष्ट मुद्दों के लिए उपलब्ध राजनीतिक स्थान कमजोर होने की आशंका है।
- असमान निर्वाचन जनादेश: यदि निर्वाचन चक्र के बीच किसी सरकार का पतन हो जाता है, तो उसके बाद चुनी गई सरकार को मूल कार्यकाल की केवल शेष अवधि के लिए ही कार्य करना पड़ सकता है।
- फिर भी उसके जनादेश को पूर्ण कार्यकाल के लिए चुनी गई सरकार के समान संवैधानिक अधिकार प्राप्त होंगे। इससे लोकतांत्रिक वैधता से संबंधित प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं।
- समय से पूर्व विघटन का जोखिम: यदि लोकसभा समय से पहले भंग हो जाती है, तो एक साथ चुनाव की व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थिर राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल में भी बदलाव करना पड़ सकता है।
- इसके विपरीत, यदि किसी राज्य में समय से पहले चुनाव होता है, तो इससे राष्ट्रीय निर्वाचन चक्र प्रभावित हो सकता है।
- इस प्रकार, यह सुधार मूलतः एक ऐसी संसदीय व्यवस्था पर कठोर निर्वाचन कैलेंडर लागू करने का प्रयास करता है, जो स्वभावतः लचीली है।
- चुनावी व्यय संबंधी तर्क का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक: चुनावी व्यय केवल सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रशासनिक व्यय तक सीमित नहीं है।
- अधिक बड़ा व्यय राजनीतिक दलों के प्रचार अभियानों और निजी खर्च के रूप में होता है।
- इसलिए एक साथ चुनाव कराने से होने वाली वित्तीय बचत का आकलन निर्वाचन चक्र के पुनर्गठन से जुड़ी संवैधानिक और प्रशासनिक लागतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
आगे की राह: सुदृढ़ीकरण के उपाय
- एक राष्ट्र, एक चुनाव को केवल प्रशासनिक सुविधा के उपाय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसी भी सुधार में संघवाद, प्रतिनिधि सरकार और विधायी जवाबदेही के संवैधानिक सिद्धांतों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
- एक व्यावहारिक दृष्टिकोण में निम्नलिखित उपाय शामिल हो सकते हैं:
- देशभर में अचानक एक साथ बदलाव करने के बजाय चरणबद्ध निर्वाचन समन्वय किया जाए।
- त्रिशंकु सदन, अविश्वास प्रस्ताव और समय से पूर्व विघटन की स्थितियों के लिए स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान किए जाएँ।
- ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जिससे मध्यावधि चुनाव स्थायी रूप से सीमित कार्यकाल वाले लोकतांत्रिक जनादेश का स्वरूप न ले लें।
- निर्वाचन आयोग की प्रशासनिक, तकनीकी और वित्तीय क्षमता को मजबूत किया जाए।
- राजनीतिक वित्तपोषण, दलों के आंतरिक लोकतंत्र और आदर्श आचार संहिता के क्रियान्वयन में भी समानांतर सुधार किए जाएँ।
- संवैधानिक संशोधनों से पहले राज्यों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के साथ व्यापक परामर्श किया जाए।
निष्कर्ष
- मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि भारत तकनीकी रूप से एक साथ चुनाव कराने में सक्षम है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या ऐसा करते समय राज्य स्तर के लोकतांत्रिक विकल्पों को राष्ट्रीय निर्वाचन कैलेंडर के अधीन किए बिना यह व्यवस्था लागू की जा सकती है।
- प्रशासनिक दक्षता एक उचित उद्देश्य है, लेकिन संसदीय संघीय व्यवस्था में लोकतांत्रिक जवाबदेही और संघीय स्वायत्तता को मार्गदर्शक सिद्धांत बनाए रखना आवश्यक है।
- एक राष्ट्र, एक चुनाव पर तभी विचार किया जाना चाहिए, जब संस्थागत निर्वाचन समन्वय मतदाता की आवाज को सुदृढ़ करे, उसे कमजोर नहीं।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत में एक साथ चुनाव कराने से संघवाद, मतदाता जवाबदेही, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और शासन की दक्षता किस प्रकार प्रभावित हो सकती है? विवेचना कीजिए। |
स्रोत: TH
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