पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- भारत में डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ एक महत्त्वपूर्ण आधारभूत अवसंरचना के रूप में विकसित हो चुकी हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता देश की अगली आधारभूत सार्वजनिक उपयोगिता बनने की दिशा में अग्रसर है।
पृष्ठभूमि
- भारत ने आधार (डिजिटल पहचान), यूपीआई (डिजिटल भुगतान) तथा डीईपीए/अकाउंट एग्रीगेटर (डेटा साझाकरण) को एक एकीकृत एवं अंतरसंचालनीय पारिस्थितिकी तंत्र में समेकित कर विश्व का सर्वाधिक व्यापक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना विकसित किया है।
- एस्टोनिया, ब्राज़ील, सिंगापुर तथा अनेक यूरोपीय देशों ने इस प्रणाली के विभिन्न घटकों का विकास किया है, किंतु भारत के समान व्यापक स्तर पर इन तीनों को एकीकृत करने वाला कोई अन्य देश नहीं है।
- वर्ष 2016 में प्रति गीगाबाइट (GB) मोबाइल डेटा की कीमत लगभग 4 अमेरिकी डॉलर थी, जिसे भारत ने घटाकर 0.30 अमेरिकी डॉलर से भी कम कर दिया। परिणामस्वरूप लगभग 50 करोड़ लोग इंटरनेट से जुड़े।
- अब भारत कंप्यूटिंग क्षमता , मुक्त डेटा समुच्चयों तथा स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडलों तक लोकतांत्रिक पहुँच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एआई को डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के रूप में विकसित कर रहा है, ताकि नागरिकों, व्यवसायों तथा सार्वजनिक संस्थानों को एआई तक सुलभ, किफायती एवं समावेशी पहुँच उपलब्ध हो सके।
आधारभूत सार्वजनिक उपयोगिता के रूप में कृत्रिम बुद्धिमत्ता
- इसका आशय कंप्यूटिंग क्षमता, आधारभूत एल्गोरिदम, डेटा भंडार तथा बुद्धिमत्तापूर्ण निष्कर्षण को सभी नागरिकों, स्टार्टअप्स एवं सार्वजनिक संस्थानों के लिए सुलभ, किफायती तथा अंतरसंचालनीय बनाना है।
- यह दृष्टिकोण भारत की “सभी के लिए एआई “ की अवधारणा का आधार है तथा विकसित भारत @2047 के रणनीतिक लक्ष्य के अनुरूप है।
आधारभूत सार्वजनिक उपयोगिता के रूप में एआई का महत्त्व
- आर्थिक विकास का प्रेरक: कृत्रिम बुद्धिमत्ता कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, विनिर्माण, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था में उत्पादकता एवं नवाचार को गति प्रदान करती है।
- आईबीएम तथा इंडियाएआई (इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की एक पहल) के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2030 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत की अर्थव्यवस्था में 500 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹47.81 लाख करोड़) से अधिक का योगदान दे सकती है।
- सुशासन: एआई डेटा-आधारित एवं साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को सक्षम बनाती है तथा कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, शिकायत निवारण, कर प्रशासन एवं न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक दक्ष बनाती है।
- राष्ट्रीय संप्रभुता: स्वदेशी आधारभूत एआई मॉडलों का विकास विदेशी प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र पर भारत की निर्भरता को कम करता है तथा एआई प्रणालियों के निष्कर्षों में डेटा संप्रभुता एवं भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ सुनिश्चित करता है।
- सामाजिक समावेशन: एआई आधारित उपकरण भाषा एवं साक्षरता संबंधी बाधाओं को कम करने में सहायक हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के तकनीकी रूप से कम सक्षम नागरिक स्थानीय भाषाओं एवं बोलियों में वॉयस कमांड के माध्यम से बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं तथा सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
- बेहतर सेवा वितरण: एआई-सक्षम निदान प्रणालियाँ दूरस्थ क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) को मधुमेहजनित रेटिनोपैथी तथा तपेदिक जैसी बीमारियों की प्रारंभिक पहचान करने में सहायता प्रदान करती हैं।
- एआई मॉडल लघु एवं सीमांत किसानों को वास्तविक समय में फसल संबंधी परामर्श, मौसम पूर्वानुमान तथा मृदा स्वास्थ्य विश्लेषण उपलब्ध कराते हैं।
- अनुकूली अधिगम उपकरण बहुभाषी कक्षाओं में विद्यार्थियों को व्यक्तिकृत शिक्षा प्रदान करते हैं तथा शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात में कमी के प्रभाव को कम करते हैं।
प्रगति
- भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा संचालित विकास के एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जहाँ एआई का लाभ अनुसंधान प्रयोगशालाओं एवं बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहकर समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँच रहा है।
- एआई स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, शहरी प्रबंधन तथा सार्वजनिक सेवाओं में अधिक स्मार्ट, तीव्र एवं डेटा-आधारित समाधान उपलब्ध करा रही है।
- भारत का दृष्टिकोण खुली , किफायती एवं समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित है, जिससे यह प्रौद्योगिकी समाज के सभी वर्गों के लिए लाभकारी बन सके।
- नीति आयोग की रिपोर्ट “समावेशी सामाजिक विकास हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता (अक्टूबर 2025) के अनुसार, एआई स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास तथा वित्तीय सेवाओं तक पहुँच में सुधार करके लगभग 49 करोड़ असंगठित श्रमिकों को सशक्त बना सकती है।
- यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि एआई उत्पादकता बढ़ाने, लचीलापन सुदृढ़ करने तथा सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, बशर्ते तकनीकी प्रगति समावेशी हो तथा समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचे।
| भारत में वर्तमान एआई पारिस्थितिकी तंत्रभारत का प्रौद्योगिकी क्षेत्र तीव्र गति से विस्तार कर रहा है तथा इस वर्ष इसका वार्षिक राजस्व 280 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने का अनुमान है।देश के प्रौद्योगिकी एवं एआई पारिस्थितिकी तंत्र में 60 लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं।भारत में 1,800 से अधिक वैश्विक क्षमता केंद्र (GCCs) स्थापित हैं, जिनमें 500 से अधिक विशेष रूप से एआई पर केंद्रित हैं।देश में लगभग 1.8 लाख स्टार्टअप कार्यरत हैं तथा विगत वर्ष स्थापित लगभग 89% नए स्टार्टअप्स ने अपने उत्पादों अथवा सेवाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग किया।स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी टूल, 2025 रिपोर्ट के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रतिस्पर्धात्मकता के क्षेत्र में भारत को विश्व स्तर पर तीसरा स्थान प्राप्त हुआ है। |
प्रमुख पहलें
- इंडियाएआई मिशन: मार्च 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹10,371.92 करोड़ के बजट के साथ पाँच वर्षों के लिए इंडियाएआई मिशन को स्वीकृति प्रदान की।
- इसका उद्देश्य “भारत में एआई का विकास तथा भारत के लिए एआई का उपयोग” के दृष्टिकोण को साकार करना है।
- यह मिशन कंप्यूटिंग संसाधनों तक पहुँच बढ़ाने, नवाचार को प्रोत्साहित करने, उच्च गुणवत्ता वाले डेटा समुच्चयों का विकास, एआई कौशल संवर्द्धन तथा सुरक्षित एआई अपनाने के माध्यम से समावेशी एवं उत्तरदायी एआई पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना चाहता है।
- एआई उत्कृष्टता केंद्र: स्वास्थ्य, कृषि एवं सतत शहरों जैसे प्रमुख क्षेत्रों में एआई उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं।
- केंद्रीय बजट 2025 में शिक्षा क्षेत्र के लिए चौथे उत्कृष्टता केंद्र की घोषणा की गई।
- ये केंद्र शिक्षा जगत, उद्योग एवं सरकार को एक साथ लाकर विस्तार योग्य एआई समाधान विकसित करते हैं।
- एआई कौशल रूपरेखा: यह रूपरेखा सरकारी अधिकारियों को एआई के प्रभावी उपयोग हेतु संरचित प्रशिक्षण प्रदान करती है, जिससे वे नीति-निर्माण एवं प्रशासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभावी उपयोग कर सकें।
- इसका उद्देश्य वैश्विक मानकों के अनुरूप एआई-सक्षम सार्वजनिक प्रशासन का निर्माण करना है।
- सर्वम एआई : सुशासन के लिए एआई: बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप सर्वम एआई जनरेटिव एआई का उपयोग कर सार्वजनिक सेवाओं में सुधार कर रहा है।
- यह भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) के साथ मिलकर आधार संबंधी सेवाओं को अधिक स्मार्ट एवं सुरक्षित बनाने पर कार्य कर रहा है।
- इसे भारत के सॉवरेन लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) पारिस्थितिकी तंत्र के विकास की भी स्वीकृति प्रदान की गई है, जिससे मुक्त स्रोत एआई एवं डिजिटल विश्वास को बढ़ावा मिलेगा।
- भाषिणी (Bhashini): सभी के लिए डिजिटल समावेशन: भाषिणी एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित भाषा मंच है, जो भारतीय भाषाओं में अनुवाद एवं वाक् सेवाएँ उपलब्ध कराता है।
- इसके माध्यम से नागरिक भाषा संबंधी बाधाओं के बिना डिजिटल सेवाओं तक पहुँच प्राप्त कर सकते हैं।
- भारतजेन एआई : स्वदेशी बहुभाषी एआई मॉडल: जून 2025 में भारतजेन एआई का शुभारंभ किया गया, जो भारत का पहला सरकारी वित्तपोषित स्वदेशी बहु-माध्यम विशाल भाषा मॉडल है।
- यह 22 भारतीय भाषाओं का समर्थन करता है तथा भारतीय डेटा समुच्चयों के आधार पर पाठ , वाक् एवं चित्र क्षमताओं को एकीकृत कर भारत की सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधता के अनुरूप एआई समाधान विकसित करता है।
- इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026: 16–21 फरवरी, 2026 के दौरान आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने वैश्विक स्तर पर भारत के उभरते एआई नेतृत्व को प्रदर्शित किया।
- इस सम्मेलन में 100 से अधिक देशों तथा 20 अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भाग लिया।
- कार्यक्रम में लगभग 6 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से तथा 9 लाख लोग ऑनलाइन सहभागी बने।
- भारत ने एआई उत्तरदायित्व प्रतिज्ञाओं के लिए 2.5 लाख से अधिक प्रतिबद्धताओं के साथ गिनीज विश्व रिकॉर्ड भी स्थापित किया।
- सम्मेलन में इंडियाएआई मिशन के अंतर्गत पहले से उपलब्ध 38,000 से अधिक जीपीयू के अतिरिक्त 20,000 नए जीपीयू जोड़कर भारत की सॉवरेन एआई कंप्यूटिंग क्षमता का विस्तार करने की घोषणा की गई।
चुनौतियाँ
- अवसंरचना संबंधी चुनौतियाँ: उच्च-प्रदर्शन जीपीयू , एआई कंप्यूटिंग अवसंरचना तथा आयातित अर्धचालक प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता।
- कुशल मानव संसाधन का अभाव: एआई शोधकर्ताओं, अर्धचालक विशेषज्ञों, डेटा वैज्ञानिकों तथा अन्य कुशल एआई पेशेवरों की संख्या अपर्याप्त है।
- आयातित एआई पर निर्भरता: वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा विकसित स्वामित्वाधीन एआई मॉडल एवं एपीआई पर निर्भरता भारत की तकनीकी संप्रभुता को सीमित करती है।
- डेटा संबंधी चुनौतियाँ: भारतीय भाषाओं एवं स्थानीय संदर्भों में उच्च गुणवत्ता वाले डेटा समुच्चयों की अपर्याप्त उपलब्धता एआई समाधानों की प्रभावशीलता को सीमित करती है।
- डिजिटल विभाजन: इंटरनेट, डिजिटल अवसंरचना, एआई उपकरणों एवं डिजिटल साक्षरता तक पहुँच में विद्यमान असमानताएँ, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों एवं सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (MSEs) में, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को बढ़ा सकती हैं।
- नैतिक एवं साइबर सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ: डीपफेक तथा एआई-जनित दुष्प्रचार सार्वजनिक विश्वास, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
- पर्यावरणीय सततता: एआई डेटा केंद्र अत्यधिक ऊर्जा-गहन होते हैं, जिससे ऊर्जा सुरक्षा एवं पर्यावरणीय सततता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
सुझाव
- किफायती कंप्यूटिंग क्षमता: उच्च-प्रदर्शन जीपीयू की उपलब्धता में वृद्धि की जाए तथा किफायती कंप्यूटिंग संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ।
- एआई अवसंरचना को राष्ट्रीय योजना का अभिन्न अंग बनाया जाए तथा इसके लिए समर्पित नवीकरणीय ऊर्जा एवं परमाणु ऊर्जा स्रोतों की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अनुसंधान एवं नवाचार को सुदृढ़ किया जाए।
- सरकार, शिक्षा जगत, स्टार्टअप्स तथा उद्योगों के बीच अधिक प्रभावी सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
- मुक्त-स्रोत आधारभूत मॉडल: स्टार्टअप्स को मुक्त-भार भारतीय एआई मॉडलों के विकास हेतु प्रोत्साहित किया जाए।
- इसके लिए अनामिकृत सार्वजनिक डेटा समुच्चयों तथा सरकार द्वारा समर्थित कंप्यूटिंग संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
- साथ ही, स्वामित्वाधीन विदेशी एआई प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता को समाप्त करने की दिशा में प्रयास किए जाएँ।
- एकीकृत बुद्धिमत्ता इंटरफेस: यूपीआई की तर्ज पर एक अंतरसंचालनीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता मंच विकसित किया जाए।
- यह मंच नागरिकों, स्टार्टअप्स, शैक्षणिक संस्थानों तथा सरकारी एजेंसियों को पहचान, सहमति, बिलिंग एवं सुरक्षा के समान मानकों पर आधारित एक साझा इंटरफेस के माध्यम से विभिन्न एआई मॉडलों तक पहुँच प्रदान करे।
- एआई टोकन : सरकार विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप्स, विद्यालयों एवं सार्वजनिक संस्थानों को निःशुल्क अथवा रियायती एआई टोकन उपलब्ध करा सकती है, जिससे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का व्यापक उपयोग सुनिश्चित हो सके।
- समय के साथ वाणिज्यिक उपयोगकर्ताओं को सशुल्क सेवाओं की ओर स्थानांतरित किया जा सकता है।
- सुलभ एवं कम-लागत वाली एआई: अत्यंत कम लागत वाली अथवा लगभग निःशुल्क एआई, भारतीय भाषाओं में एआई-आधारित सेवाएँ उपलब्ध कराकर स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सुशासन एवं लघु उद्यमों जैसे क्षेत्रों में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकती है।
- इससे उत्पादकता में वृद्धि, लागत में कमी तथा ज्ञान तक व्यापक पहुँच सुनिश्चित होगी।
- उत्तरदायी एआई हेतु नियामकीय ढाँचा: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के गोपनीयता, सुरक्षा, पारदर्शिता, जवाबदेही तथा नैतिक उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए समुचित नीतिगत एवं नियामकीय ढाँचे विकसित किए जाएँ।
निष्कर्ष
- भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) की सफलता के आधार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता देश की अगली आधारभूत सार्वजनिक उपयोगिता बनने की क्षमता रखती है।
- जिस प्रकार किफायती इंटरनेट एवं डिजिटल पहचान ने डिजिटल अर्थव्यवस्था में व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित की है, उसी प्रकार सुलभ एवं कम-लागत वाली एआई ज्ञान, नवाचार तथा अवसरों का लोकतंत्रीकरण कर सकती है।
- तथापि, इसके लिए कंप्यूटिंग अवसंरचना, अर्धचालकों, स्वदेशी डेटा समुच्चयों, कुशल मानव संसाधन तथा उत्तरदायी शासन व्यवस्था में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होगी।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता को सुलभ, किफायती, विश्वसनीय एवं समावेशी बनाकर भारत आर्थिक विकास को गति दे सकता है, सार्वजनिक सेवाओं में सुधार कर सकता है, नागरिकों को सशक्त बना सकता है तथा विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति कर सकता है।
| मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत के डिजिटल सशक्तीकरण को सुदृढ़ करने, आर्थिक विकास को गति प्रदान करने तथा विकसित भारत @2047 के लक्ष्यों की प्राप्ति में एक समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पारिस्थितिकी तंत्र की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए। |
स्रोत: TH