लोथल में राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर
पाठ्यक्रम:सामान्य अध्ययन –1 / इतिहास
चर्चा में क्यों ?
- भारत, गुजरात के लोथल में राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर (NMHC) की स्थापना कर रहा है, जिसका उद्देश्य देश के 4,500 वर्ष पुराने समुद्री इतिहास तथा सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilisation) की विरासत का प्रदर्शन करना है।
लोथल
- लोथल लगभग 2400 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख नगर था।
- गुजराती भाषा में “लोथल” का अर्थ “मृतकों का टीला” है।
- इस स्थल का उत्खनन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 1955 से 1960 के मध्य किया गया, जिसमें एक अत्यंत विकसित नगरीय बस्ती एवं व्यापारिक केंद्र के प्रमाण प्राप्त हुए।
- पुरातत्वविदों का मानना है कि लोथल एक प्रमुख नदी तंत्र के किनारे रणनीतिक रूप से स्थित था, जो सिंध से गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र को जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्ग का हिस्सा था।
- यहाँ की सबसे महत्त्वपूर्ण खोज विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञात मानव-निर्मित गोदी (Dockyard) है। इसके अतिरिक्त यहाँ दुर्ग क्षेत्र (Acropolis), निचला नगर, मनका निर्माण कारखाना, गोदाम, बाज़ार तथा उन्नत जल निकासी प्रणाली के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
- हड़प्पावासियों की अभियांत्रिकी दक्षता का परिचय नगर की सुव्यवस्थित नहरों तथा गोदी सुविधाओं से मिलता है।
- लोथल प्राचीन विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाहों में से एक था।
- पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि लोथल के मेसोपोटामिया, मिस्र तथा फारस जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के साथ भी व्यापारिक संबंध थे।
यूनेस्को नामांकन
- वर्ष 2014 में लोथल को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए नामांकित किया गया था और इसका आवेदन वर्तमान में यूनेस्को की अस्थायी सूची (Tentative List) में लंबित है।
राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर (NMHC)
- यह 4,000 करोड़ रुपये की परियोजना है, जिसे वर्ष 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई।
- यह अहमदाबाद से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
- इस परिसर में हड़प्पाकालीन सड़कों, बाज़ारों, गोदियों तथा नागरिक संरचनाओं का पुनर्निर्माण किया जाएगा, जिससे आगंतुक पारंपरिक संग्रहालय प्रदर्शन से आगे बढ़कर प्राचीन नगरीय जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त कर सकेंगे।
- संग्रहालय का अभिकल्प हड़प्पा स्थापत्य शैली पर आधारित है, जिसमें बाढ़-प्रतिरोधी ऊँची संरचनाएँ तथा जहाज़ जैसी आकृतियाँ शामिल की गई हैं।
- इस परियोजना का उद्देश्य भारत की प्राचीन समुद्री क्षमता तथा हड़प्पा सभ्यता की तकनीकी उन्नति को प्रदर्शित करते हुए इसे वैश्विक सांस्कृतिक एवं शैक्षिक गंतव्य के रूप में विकसित करना है।
स्रोत :IE
बलूचिस्तान
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–1 / भूगोल, सामान्य अध्ययन–2 / अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
- हाल ही में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में पुलिसकर्मियों एवं नागरिकों की हत्या करने वाले हमलों के बाद ऑपरेशन शाबान प्रारंभ किया, जिससे लंबे समय से जारी बलूच विद्रोह पुनः चर्चा में आ गया है।
संघर्ष की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कलात का पाकिस्तान में विलय
- कलात, ब्रिटिश भारत के समय वर्तमान बलूचिस्तान का सबसे बड़ा रियासती राज्य था। भारत के विभाजन के समय कलात ने प्रारंभ में स्वतंत्र रहने का प्रयास किया।
- राजनीतिक एवं सैन्य दबाव के बीच वर्ष 1948 में कलात के ख़ान ने पाकिस्तान के साथ विलय स्वीकार कर लिया।
- बलूच राष्ट्रवादी इस विलय को दबाव में कराया गया मानते हैं, जबकि पाकिस्तान इसे वैध एवं अंतिम मानता है।
सुई गैस से जुड़ी असंतोष की भावना
- स्थानीय लोगों में यह धारणा बनी कि बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ स्थानीय समुदायों की अपेक्षा केंद्र सरकार को अधिक प्राप्त हुआ, जिससे असंतोष बढ़ा।
बलूचिस्तान का परिचय
- बलूचिस्तान, क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है तथा यह देश के कुल भू-भाग का लगभग 44% भाग घेरता है।
- राजधानी: क्वेटा
- सीमाएँ: इसके पश्चिम में ईरान, उत्तर में अफगानिस्तान तथा दक्षिण में अरब सागर स्थित है।
- प्राकृतिक संसाधन: यह प्राकृतिक गैस, ताँबा, सोना, कोयला तथा अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध है।
- रेको डिक (Reko Diq): विश्व के सबसे बड़े अविकसित ताँबा–सोना भंडारों में से एक।
- सैंदक (Saindak): चीनी भागीदारी के साथ संचालित एक प्रमुख ताँबा–सोना खनन परियोजना।
- महत्त्व: बलूचिस्तान में स्थित ग्वादर बंदरगाह चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एक प्रमुख केंद्र है।
स्रोत: IE
ओलिम्पस पर्वत
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–1 / भूगोल
चर्चा में क्यों?
- ओलिम्पस पर्वत, जिसे ज़्यूस तथा प्राचीन यूनानी देवताओं का पौराणिक निवास स्थान माना जाता है, को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा देने पर विचार किया जा रहा है। ग्रीस अपने सबसे ऊँचे पर्वत के संरक्षण के लिए यह प्रयास कर रहा है।
- वर्ष 2014 में प्रारंभ किया गया इसका नामांकन वर्तमान में यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति द्वारा मूल्यांकनाधीन है।
ओलिम्पस पर्वत
स्थिति
- ओलिम्पस पर्वत (2,918 मीटर) ग्रीस का सबसे ऊँचा पर्वत है, जो मेसिडोनिया और थेसाली के बीच स्थित है।
- यह अपने विशिष्ट सूक्ष्म जलवायु (Microclimate), असाधारण जैव विविधता तथा मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है।
पौराणिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व
- प्राचीन यूनानी पौराणिक कथाओं में इसे ज़्यूस तथा बारह ओलिम्पियन देवताओं का निवास स्थान माना जाता था।
- होमर तथा हेसियड ने इसका वर्णन उस दिव्य स्थान के रूप में किया है, जहाँ ज़्यूस ने टाइटनों को पराजित किया और देवताओं तथा मनुष्यों पर शासन किया।
- एगियोस एंटोनियोस शिखर पर स्थित ओलिम्पियन ज़्यूस का मंदिर तथा आसपास प्राप्त प्राचीन बस्तियों के पुरातात्त्विक अवशेष इसके दीर्घकालीन धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व की पुष्टि करते हैं।
- ओलिम्पस का ईसाई धार्मिक महत्त्व भी है। यहाँ 16वीं शताब्दी का पैगंबर एलियास का प्रार्थना-गृह, जो सबसे ऊँचा ऑर्थोडॉक्स प्रार्थना-गृह माना जाता है, तथा होसियोस डायोनिसियोस का प्राचीन मठ स्थित है।
प्राकृतिक विरासत
- वर्ष 1938 में इसे ग्रीस का पहला राष्ट्रीय वन घोषित किया गया था।
- यह अपने समृद्ध पारितंत्रों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ चार विशिष्ट वनस्पति क्षेत्र पाए जाते हैं, जो भूमध्यसागरीय वनों से लेकर बाल्कन क्षेत्र की सर्वोच्च वृक्ष-रेखा के ऊपर स्थित अल्पाइन घासभूमियों तक विस्तृत हैं। यहाँ अनेक दुर्लभ एवं स्थानिक (Endemic) पादप प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं।
स्रोत: TOI
ऑपरेशन वज्र
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2 / शासन
सन्दर्भ
- केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) ने ऑपरेशन वज्र के अंतर्गत उच्च शक्ति वाली ट्रामाडोल हाइड्रोक्लोराइड (250 मि.ग्रा.) गोलियों की अवैध तस्करी को रोकने में सफलता प्राप्त की।
यह जब्ती विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण क्यों है?
- ट्रामाडोल एक कृत्रिम ओपिऑयड दर्दनाशक दवा है, जिसे लोकप्रिय रूप से “फाइटर ड्रग” कहा जाता है। बताया जाता है कि आईएसआईएस (ISIS) के आतंकवादियों सहित कई लड़ाकों द्वारा दर्द एवं थकान को दबाने के लिए इसका दुरुपयोग किया गया है।
- यद्यपि ट्रामाडोल के वैध चिकित्सीय उपयोग हैं, किंतु इसका अवैध उपयोग एवं अवैध तस्करी नशे की लत को बढ़ावा दे सकती है तथा जनस्वास्थ्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती है।
- वर्ष 2018 में भारत ने ट्रामाडोल को स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के अंतर्गत शामिल कर दिया। इसके बाद केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की अनुमति के बिना इसका उत्पादन एवं बिक्री अवैध हो गया।
- यह जब्ती एशिया में मादक पदार्थों की तस्करी की व्यापक चुनौती को भी रेखांकित करती है, क्योंकि यहाँ दो प्रमुख अवैध मादक पदार्थ उत्पादन क्षेत्र स्थित हैं—
- गोल्डन क्रेसेंट (Golden Crescent)
- गोल्डन ट्रायंगल (Golden Triangle)
केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN)
- प्रशासनिक मंत्रालय: राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय।
- मुख्यालय: ग्वालियर, मध्य प्रदेश (वर्ष 1960 में शिमला से स्थानांतरित किया गया)।
केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो के प्रमुख दायित्व
- भारत में अफीम पोस्ता (Opium Poppy) की वैध खेती का पर्यवेक्षण।
- स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के अंतर्गत मामलों की जाँच करना तथा न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत करना।
- अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों का पता लगाना एवं उन्हें जब्त (Freeze) करने की कार्रवाई करना।
- कृत्रिम मादक औषधियों के निर्माण हेतु लाइसेंस जारी करना।
- स्वापक औषधियों एवं मनःप्रभावी पदार्थों के निर्यात हेतु प्राधिकरण तथा आयात प्रमाण-पत्र जारी करना।
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ
भारत निम्नलिखित संयुक्त राष्ट्र अभिसमयों का हस्ताक्षरकर्ता है—
- स्वापक औषधियों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1961
- मनःप्रभावी पदार्थों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1971
- स्वापक औषधियों एवं मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1988
- इन अभिसमयों के अनुसार सदस्य देशों का दायित्व है कि वे संयुक्त राष्ट्र की मादक पदार्थ नियंत्रण संधियों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी सुनिश्चित करें।
स्रोत: PIB
नमस्ते योजना
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2 / शासन
सन्दर्भ
- नमस्ते योजना के अंतर्गत अब तक 89,915 सीवर एवं सेप्टिक टैंक कर्मियों तथा 2,81,117 अपशिष्ट संग्राहकों (Waste Pickers) का सत्यापन किया जा चुका है।
परिचय
- राष्ट्रीय यंत्रीकृत स्वच्छता पारितंत्र कार्ययोजना (National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem – NAMASTE) स्वच्छता कर्मियों की सुरक्षा, गरिमा एवं सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एक प्रमुख सरकारी पहल है।
- इस योजना का उद्देश्य सीवरों एवं सेप्टिक टैंकों की जोखिमपूर्ण हाथ से सफाई को समाप्त करना तथा यंत्रीकृत सफाई व्यवस्था को बढ़ावा देना है।
- इसका संयुक्त रूप से कार्यान्वयन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
- स्वच्छता कर्मियों को प्रदान किए जाने वाले प्रमुख लाभ:
- व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) उपलब्ध कराना।
- स्वास्थ्य बीमा तथा आयुष्मान भारत योजना का लाभ प्रदान करना।
- व्यावसायिक सुरक्षा प्रशिक्षण उपलब्ध कराना।
- कौशल विकास के अवसर प्रदान करना।
- स्व-रोज़गार के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।
- आधुनिक यंत्रीकृत स्वच्छता उपकरणों तक पहुँच सुनिश्चित करना।
योजना के उद्देश्य
- स्वच्छता कार्यों में शून्य मृत्यु (Zero Fatalities) सुनिश्चित करना।
- जोखिमपूर्ण अपशिष्ट के साथ प्रत्यक्ष मानवीय संपर्क को पूर्णतः समाप्त करना।
- कुशल स्वच्छता कार्यबल का निर्माण करना।
- स्वयं सहायता समूहों (SHGs) तथा अन्य आजीविका के अवसरों के माध्यम से स्वच्छता कर्मियों में उद्यमिता को बढ़ावा देना।
स्रोत: PIB
चुंबकीय उत्तोलन (Magnetic Levitation)
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
चर्चा में क्यों?
- जापान ने अपनी पहली 500 किलोमीटर लंबी सुपरकन्डक्टिंग मैग्लेव (SCMAGLEV) रेल परियोजना को स्वीकृति प्रदान की है, जो टोक्यो को ओसाका से नागानो, नागोया तथा क्योटो के माध्यम से जोड़ेगी।
मैग्लेव (Magnetic Levitation)
- मैग्लेव (Magnetic Levitation) का अर्थ है स्थायी चुंबकों अथवा विद्युत्-चुंबकों द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की सहायता से किसी वाहन को बिना किसी यांत्रिक सहारे के ऊपर उठाना।
- मैग्लेव रेलगाड़ियाँ पहियों के स्थान पर शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके रेलगाड़ी को ऊपर उठाती एवं आगे बढ़ाती हैं। इससे घूर्णन घर्षण (Rolling Friction) समाप्त हो जाता है और 400 किमी/घंटा से अधिक की गति पर भी अत्यंत सुगम यात्रा संभव होती है।
प्रयुक्त प्रौद्योगिकियाँ
- विद्युत्-चुंबकीय निलंबन (Electromagnetic Suspension – EMS)
- इस प्रणाली में रेलगाड़ी पर लगे विद्युत्-चुंबक उसे पथ (Guideway) की ओर आकर्षित करते हैं तथा संवेदकों (Sensors) की सहायता से लगभग 10 मि.मी. ऊपर स्थिर बनाए रखते हैं।
- विद्युत्-गतिकीय निलंबन (Electrodynamic Suspension – EDS)
- इस प्रणाली में अतिचालक चुंबक पथ में लगी कुंडलियों (Coils) में विद्युत् धारा प्रेरित करते हैं, जिससे प्रतिकर्षण बल उत्पन्न होता है।
- लगभग 100 किमी/घंटा की गति प्राप्त होने के बाद यह प्रणाली रेलगाड़ी को पथ से लगभग 100 मि.मी. ऊपर तैरते हुए चलने में सक्षम बनाती है।
रेलगाड़ी आगे कैसे बढ़ती है?
- रेलगाड़ी की गति रैखिक मोटरों (Linear Motors) के माध्यम से प्राप्त होती है, जिनमें पथ पर लगी कुंडलियों में प्रवाहित प्रत्यावर्ती धारा (AC) एक गतिशील चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है, जो रेलगाड़ी को आगे की ओर खींचती तथा पीछे से धक्का देती है।
- सुरक्षित गति कम करने तथा आपातकालीन स्थिति में रोकने के लिए पुनर्योजी ब्रेक (Regenerative Braking) तथा घर्षण ब्रेक का उपयोग किया जाता है।
मैग्लेव (चुंबकीय उत्तोलन) के लाभ
- 400–600 किमी/घंटा तक की अत्यधिक उच्च गति।
- अत्यंत सुगम एवं शांत यात्रा।
- घूर्णन घर्षण का अभाव, जिससे घिसावट एवं रखरखाव की आवश्यकता कम होती है।
- प्रतिकूल मौसम की परिस्थितियों में भी उच्च विश्वसनीयता।
अन्य अनुप्रयोग
- चुंबकीय उत्तोलन प्रौद्योगिकी का उपयोग केवल उच्च गति वाली रेलगाड़ियों तक सीमित नहीं है।
- इसका उपयोग चुंबकीय बेयरिंग में टरबाइन एवं संपीडक (Compressor) के शाफ्ट को निलंबित रखने के लिए किया जाता है, जिससे घर्षण कम होता है और अधिक गति से घूर्णन संभव होता है।
- इसी रैखिक मोटर प्रौद्योगिकी का उपयोग विमानवाहक पोतों के रनवे से विमानों को प्रक्षेपित करने में भी किया जाता है।
- उद्योगों में मैग्लेव प्रणालियाँ अर्धचालक निर्माण, पैकेजिंग, सीएनसी मशीनिंग, लेज़र/एक्स-किरण निरीक्षण तथा डीएनए अनुक्रमण जैसे कार्यों में तीव्र एवं सटीक गति प्रदान करती हैं।
- वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए जैविक नमूनों, द्रवों, पिघली हुई धातुओं तथा छोटे जीवों को भी चुंबकीय क्षेत्र की सहायता से उत्तोलित किया जाता है।
- वर्ष 1997 में भौतिक वैज्ञानिक आंद्रे गीम और माइकल बेरी ने 10 टेस्ला क्षमता वाले शक्तिशाली चुंबक की सहायता से प्रतिचुंबकत्व (Diamagnetism) का उपयोग करते हुए एक मेंढक को चुंबकीय रूप से उत्तोलित किया था।
- वर्ष 2000 में इस अनूठे प्रयोग के लिए उन्हें इग नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। बाद में आंद्रे गीम ऐसे एकमात्र वैज्ञानिक बने जिन्हें इग नोबेल पुरस्कार और नोबेल पुरस्कार दोनों प्राप्त हुए।
सीमाएँ
- इसके लिए विशेष रूप से निर्मित पटरियों एवं स्टेशनों की आवश्यकता होती है; मौजूदा रेल अवसंरचना का उपयोग नहीं किया जा सकता।
- निर्माण एवं रखरखाव की लागत अत्यधिक अधिक होती है।
- आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य होने के लिए उच्च यात्री संख्या आवश्यक है।
- 300 किमी/घंटा से अधिक गति पर वायुगतिकीय प्रतिरोध (Aerodynamic Drag) एक बड़ी चुनौती बन जाता है, जिसके लिए अत्याधुनिक सुव्यवस्थित (Streamlined) डिजाइन की आवश्यकता होती है।
स्रोत: TH
Previous article
छत्तीसगढ़ के नदी संरक्षण उपाय: एक अध्ययन
Next article
संक्षिप्त समाचार 21-07-2026