पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2 / राजव्यवस्था
संदर्भ
- भारतीय राजनीति में चुनाव के बाद बार-बार होने वाले दलबदल तथा राजनीतिक दलों के पुनर्संरेखण ने लोकतांत्रिक नैतिकता, मतदाताओं के विश्वास तथा जनादेश की पवित्रता के क्षरण को लेकर चिंताओं को पुनः बढ़ा दिया है।
राजनीतिक दलबदल क्या है?
- राजनीतिक दलबदल से तात्पर्य किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा एक राजनीतिक दल के टिकट पर निर्वाचित होने के बाद किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने से है।
- 1960 और 1970 के दशक के उत्तरार्ध में संसद तथा राज्य विधानमंडलों में दलबदल की घटनाएँ इतनी अधिक हो गई थीं कि इसके लिए “आया राम, गया राम” शब्द प्रचलित हुआ।
दलबदल लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों है?
- जनादेश का उल्लंघन: मतदाता किसी प्रत्याशी का चयन उसके राजनीतिक दल की विचारधारा, घोषणा-पत्र तथा नेतृत्व के आधार पर करते हैं। चुनाव के बाद दल बदलना मतदाताओं द्वारा दिए गए जनादेश के साथ विश्वासघात है।
- अवसरवादी राजनीति को बढ़ावा: बार-बार होने वाला दलबदल विचारधारा एवं जनसेवा की अपेक्षा राजनीतिक अस्तित्व को अधिक महत्त्व देता है, जिससे सिद्धांत-आधारित राजनीति के स्थान पर लेन-देन आधारित राजनीति को प्रोत्साहन मिलता है।
- लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का कमजोर होना: संसदीय लोकतंत्र के लिए एक सशक्त सरकार के साथ-साथ प्रभावी विपक्ष भी आवश्यक है। किंतु बड़े पैमाने पर होने वाला दलबदल विपक्ष की कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करने की क्षमता को कमजोर करता है।
दल-बदल विरोधी कानून
- दल-बदल विरोधी कानून को वर्ष 1985 में संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़कर लागू किया गया।
- इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल बदलने के आधार पर संसद तथा राज्य विधानमंडलों के सदस्यों को अयोग्य घोषित करना था।
- यदि सदन का कोई निर्दलीय सदस्य निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है।
- यदि सदन का कोई मनोनीत सदस्य सदन में अपना स्थान ग्रहण करने की तिथि से छह माह की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह भी सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है।
- संविधान (इक्यानबेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 द्वारा इस कानून को और अधिक कठोर बनाया गया। इसके अंतर्गत विधानमंडल दल के कम-से-कम एक-तिहाई सदस्यों के समूह को प्राप्त अयोग्यता से छूट समाप्त कर दी गई।
- इसके बाद केवल वही विलय (Merger) अयोग्यता से छूट का पात्र माना गया, जिसे संबंधित विधानमंडल दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो।
मुख्य चिंताएँ
- दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सदनों के पीठासीन अधिकारियों को प्राप्त है—लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में अध्यक्ष (Speaker) तथा राज्यसभा एवं विधान परिषदों में सभापति (Chairman)।
- जहाँ राज्यसभा के सभापति के लिए अपने मूल राजनीतिक दल से त्यागपत्र देना अनिवार्य है, वहीं लोकसभा एवं विधानसभाओं के अध्यक्षों के लिए ऐसा कोई प्रावधान अनिवार्य नहीं है।
- यह व्यवस्था संस्थागत निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। कई मामलों में पीठासीन अधिकारियों ने अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय महीनों, वर्षों अथवा पूरे सदन के कार्यकाल तक लंबित रखा है।
उच्चतम न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- किहोतो होल्लोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992): उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा तथा यह निर्णय दिया कि अयोग्यता के संबंध में अध्यक्ष का निर्णय अंतिम नहीं है और न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन रहेगा।
- केइशाम मेघचंद्र सिंह बनाम अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020): उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दलबदल संबंधी मामलों का निर्णय उचित समय के भीतर किया जाना चाहिए तथा इसके लिए तीन माह की अधिकतम समय-सीमा की अनुशंसा की।
आगे की राह
- संस्थागत सुधार: अयोग्यता संबंधी याचिकाओं के निस्तारण हेतु समयबद्ध व्यवस्था स्थापित की जाए तथा निर्णय का अधिकार किसी स्वतंत्र न्यायाधिकरण को सौंपने पर विचार किया जाए।
- राजनीतिक सुधार: राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को सुदृढ़ किया जाए तथा प्रत्याशी चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी एवं विचारधारा-आधारित बनाया जाए।
- निर्वाचन सुधार: चुनाव के बाद होने वाले राजनीतिक पुनर्संरेखण की निगरानी में निर्वाचन आयोग की भूमिका को और अधिक सशक्त बनाया जाए।
स्रोत: TH